Oct ३०, २०२० १०:३९ Asia/Kolkata
  • चर्च में हमला निंदनीय जिसका कोई तर्क नहीं...दया के पैग़म्बर की रक्षा गले काट कर नहीं की जा सकती...सबसे बड़े दोषी मैक्रां...अब समझौते की शुरुआत होनी चाहिए!

आतंकी हमला जिसने फ़्रांस के नीस शहर के मशहूर चर्च में उपासकों को निशाना बनाया निंदनीय है और यह हक़ीक़त में पैग़म्बर और इस्लामी आस्थाओं व मान्यताओं का अपमान भी है। हम यह बात बिना किसी संकोच के कह रहे हैं, इसमें कोई अगर मगर नहीं लगाना चाहते क्योंकि यह सरासर आतंकी कार्यवाही है जिसका हरगिज़ बचाव नहीं किया जाना चाहिए।

पैग़म्बरे इस्लाम का बचाव चर्च पर हमला करके और उपासकों के गले काट कर नहीं किया जाता। यह न तो पैग़म्बरे का तरीक़ा था और न उनके मानने वालों की शैली थी। उनकी विरासत तो दया और सहनशीलता है। पैग़म्बर के अनेक कथन हैं जिनमें ज़ोर दिया गया है कि युद्ध चल रहा हो तब भी चर्च और वहां इबादत करने वालों को हरगिज़ निशाना न बनाया जाए, शांति के ज़माने की तो ख़ैर बात ही अलग है।

हम यह बात मानते हैं कि नीस के आतंकी हमले की ख़बर सुनकर हमें ताज्जुब नहीं हुआ बल्कि मुसलमानों और ईसाइयों के बीच रक्तपात की आग भड़काने के लिए सोशल मीडिया पर जिस तरह का भड़काऊ अभियान चल रहा था उसे देखते हुए हमें पहले ही इस प्रकार के हमले की आशंका हो चली थी।

हिंसा का वातावरण पैदा करने के सबसे बड़े दोषी फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां हैं जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम का अपमान किए जाने की घटिया हरकत का बढ़ चढ़ कर और उत्तेजक रूप में बचाव किया था। हालांकि उन्हें पता था कि शांतिपूर्ण और भाईचारे के माहौल में वह क्या ज़हर घोल रहे हैं?

फ़्रांस में हाई एलर्ट का एलान और उपासना स्थलों व स्कूलों की सुरक्षा बढ़ा देने का फ़ैसला हालात को कंट्रैल करने का उपाय है लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। मैक्रां ने जो आग भड़काई है वह सुरक्षा कड़ी करने से शांत होने वाली नहीं है। इसलिए बुनियादी क़दम उठाने होंगे और वर्तमान स्थिति का कारण बनने वाली नीतियों और गतिविधियों पर पुनरविचार करना होगा। ख़ास तौर पर इस्लामी आतंकवाद जैसे शब्दों के प्रयोग को तत्काल रोकना होगा।

फ़्रांसीसी सरकारों का इतिहास आतंकवाद से पाक नहीं है बल्कि आतंकी गतिविधियों का उसका लंबा रिकार्ड है। अगर चेचनी हमलावर ने पैग़म्बरे इस्लाम के निर्वस्त्र कार्टून दिखाने वाले टीचर का सिर काट दिया और ट्यूनीशियाई मूल के व्यक्ति ने चाक़ू से तीन फ्रांसीसियों की हत्या कर दी तो अतीत में फ्रांस की सरकारों ने लाखों बेगुनाहों को क़त्ल किया है। अगर कोई अतीत में नहीं जाना चाहता तो हम आज के ज़माने में सीरिया की मिसाल पेश करेंगे जहां फ़्रांस ने चरमपंथियों की जमकर मदद की कि वह इस देश में हज़ारों की संख्या में लोगों को क़त्ल करें। फ़्रांस ने हज़ारों की संख्या में चरमपंथियों को सीरिया भिजवाया और अब उन्हें फ़्रांस वापस लौटने की अनुमति देने से इंकार कर रहा है।

सिर काटना आतंकी हरकत है जिसकी निंदा की जानी चाहिए लेकिन आप फ़्रांस के बारे में क्या कहेंगे जिसने लीबिया जैसे अरब देश के शासक को आक्रोश में भरे युवाओं के हवाले कर दिया जिन्होंने क़ज़्ज़ाफ़ी की पीट पीट कर हत्या कर दी और फिर उनके शव का भयानक रूप में अपमान किया।

राष्ट्रपति मैक्रां अपने द्वेष पर अड़े हुए हैं और बार बार कहे जा रहे हैं कि हम फ़्रांस के मूल्यों को हरगिज़ नज़रअंदाज़ नहीं करेंगे जो चाहे आस्तिक रहे और जो चाहे आस्तिक न रहे ! सवाल यह है कि उनसे किसने कहा कि आप मूल्यों को नज़रअंदाज़ करें? क्या इस अज्ञानी व्यक्ति को मालूम है कि इस्लाम 1400 साल पहले क़ुरआन में कह चुका है कि हक़ तो तुम्हारे पालनहार के पास है जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे ईमान न लाए।

समस्या आस्तिक और नास्तिक की नहीं है बल्कि बहस यहां पर है कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी को दो अरब मुसलमानों की आस्थाओं और भावनाओं से खिलवाड़ की अनुमति दी जा सकती है।

किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना उचित नहीं है। अगर हम वर्तमान अशांति और उपद्रव का समाधान चाहते हैं तो ज़रूरी है कि वार्ता के लिए एक साथ बैठें हर पक्ष अपनी ग़लतियों को स्वीकार करे और वर्तमान आपराधिक घटनाओं का सिलसिला यहीं पर बंद किया जाए। ताकि बेगुनाहों की जानें बचाई जा सकें।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के प्रख्यात लेखक व टीकाकार

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