Dec ०३, २०२० २३:०१ Asia/Kolkata
  • इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी का दावा कितना सही?

रिपोर्ट है कि वाॅशिंग्टन ने इराक़ से अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी का फ़ैसला कर लिया लेकिन क्षेत्र के लोगों के लिए जो चीज़ अहम है वह अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी नहीं बल्कि उनका पूरी तरह से इलाक़े से निकल जाना है।

इराक़ के कुछ जानकार सूत्रों ने गुरुवार को बताया है कि बग़दाद में अमरीकी दूतावास ने इस बात की पुष्टि की है कि वह अपने कर्मचारियों की संख्या में कमी कर रहा है। इन सूत्रों का कहना है कि वाइट हाउस ने इराक़ में अमरीकी दूतावास के कर्मचारियों की संख्या में कमी का आदेश दे दिया है और उसके आदेश के अनुसार सिर्फ़ राजदूत और दूतावास के मुख्य कर्मचारी ही दूतावास में बाक़ी रहेंगे। इराक़ से अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी की वजह इराक़ी गुटों की ओर से पड़ रहा भारी दबाव और इस देश में अमरीकी दूतावास व छावनियों पर होने वाले हमले हैं। विशेष कर इस लिए कि शहीद जनरल सुलैमानी और शहीद अबू महदी की शहादत की बरसी भी क़रीब है और साथ ही शहीद मोहसिन फ़ख़्रीज़ादे की हत्या पर ईरान की प्रतिक्रिया की तरफ़ से डर भी बढ़ गया है। इस लिए स्वाभाविक है कि इराक़ और क्षेत्र में अमरीकी लक्ष्यों पर हमलों का भय बढ़ गया है।

 

कहा जा रहा है कि वाइट हाउस के आदेश पर डोनल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति काल की समाप्ति तक या फिर जनरल सुलैमानी व अबू महदी की शहादत की बरसी के दो-तीन हफ़्तों बाद ज़रूर अमल किया जाएगा। अलबत्ता यह बात बहुत अप्रत्याशित है कि अमरीका, इराक़ में अपने सैनिकों की संख्या इस हद तक कम कर दे या अगर कम भी करे तब भी उसने नैटो के परिप्रेक्ष्य में इराक़ में अपने सैनिक पहले ही बढ़ा दिए हैं या और भी बढ़ा देगा। इसी के साथ अमरीका के एक अत्यंत वरिष्ठ सैन्य कमांडर ने बुधवार को कहा कि रक्षामंत्रालय ने अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी का एक कार्यक्रम पास कर दिया है जिसके आधार पर इस देश में दो बड़ी अमरीकी छावनियां बाक़ी रहेंगी।

 

रोएटर्ज़ न्यूज़ एजेंसी ने अमरीकी रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से बताया है कि उन्होंने यह कार्यक्रम अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के इस आदेश के आधार पर बनाया है कि 15 जनवरी से पहले तक अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की संख्या घटा कर ढाई हज़ार कर दी  जाए। अमरीका के ज्वाइंट चीफ़ आफ़ आर्मी स्टाफ़ जनरल मार्क मिली ने ब्रोकिंग्ज़ इंस्टीट्यूट में इस कार्यक्रम का आरंभिक ब्योरा दिया। उन्होंने कहा कि अमरीका इन दो छावनियों के अलावा कुछ सेटेलाइट केंद्रों को भी बाक़ी रखेगा। उनका कहना था कि अमरीकी सेना अपने दो अभियानों यानी तालेबान के साथ लड़ाई में अफ़ग़ान सेना की मदद और दाइश व अलक़ाएदा के ख़िलाफ़ आतंकवाद विरोधी कार्यवाही को भी जारी रखेगी। अलबत्ता उन्होंने यह नहीं बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की कौनसी छाविनयों को बंद किया जाएगा। उनका कहना था कि इसके बाद जो कुछ भी होगा वह अमरीका की अगली सरकार के हाथ में होगा।

 

जो बात स्पष्ट है वह यह है कि जो चीज़ इलाक़े के लिए सहायक है, वह अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी नहीं बल्कि उनका पूरी तरह से इलाक़े से निकल जाना है। क्षेत्र से अमरीकी सैनिकों की संख्या में कमी, अमरीका के हितों के परिप्रेक्ष्य में है। याद रहे कि ओबामा सरकार के दौरान वाइट हाउस ने एक बिल पास किया था जिसके आधार पर अमरीका के घटकों को अपनी सुरक्षा की क़ीमत अदा करनी चाहिए और अमरीका सिर्फ़ ज़रूरत पड़ने पर ही उपस्थित होगा। दूसरे शब्दों में अमरीका, क्षेत्र व दुनिया में अपनी सैन्य उपस्थिति का ख़र्चा कम करने के लिए सामान्य मामले अपने घटकों के हवाले करेगा और ख़ुद परामर्शदाता की भूमिका निभाएगा अलबत्ता इसके लिए भी वह अपने घटकों से भारी क़ीमत वसूल करेगा। (HN)

 

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