Mar ०७, २०२१ २३:०० Asia/Kolkata
  • सूची आज उन्ही के निशाने पर जिनके साथ कल तक कांधे से कांधा मिलाए रखा

म्यांमार में प्रदर्शनकारियों के दमन के जो चित्र रविवार को सामने आए हैं उनमें सैकड़ों लोगों को घायल देखा जा सकता है।

यूरो न्यूज़ के अनुसार इंटरनेट पर मौजूद इन तस्वीरों में देखा जा सकता है कि बहुत बड़ी संख्या में सैन्य तख्तापलट के विरोधी सड़कों पर घायल अवस्था में पड़े हुए हैं।  हालांकि म्यांमार के सरकारी मीडिया ने प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध सुरक्षाबलों की ओर से बल प्रयोग को सिरे से नकार दिया है।

म्यांमार की आर्थिक राजधानी रंगून में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।  म्यांमार के दूसरे सबसे बड़े नगर मंडला में बड़े पैमाने पर सेना के विरुद्ध प्रदर्शन किये गए।  प्रदर्शनकारियों ने एलान किया है कि वे सोमवार को पूरे म्यांमार में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करेंगे।  उनका कहना है कि अब सड़को पर निकलकर विरोध करने का समय आ गया है।  सरकारी संचार माध्यमों ने सचेत किया है कि जो भी सरकारी कर्मचारी, कल के प्रदर्शनों में भाग लेगा उसको नौकरी से निकाल दिया जाएगा।

म्यांमार में जारी सेना विरोधी प्रदर्शनों ने इस देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है।  बैंकों में काम नहीं हो पा रहा है और अस्पताल ही ख़ाली पड़े हैं।  कार्यालयों में कर्मचारी नहीं पहुंच रहे हैं।  याद रहे कि पहली फरवरी 2021 को म्यांमार में होने वाले सैन्य तख़्तापलट के बाद से वहां पर आए दिन सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हो रही हैं।

सेना की ओर से प्रदर्शनकारियों के दमन के कारण बहुत से लोगों ने वहां से पलायल करना शुरू कर दिया है।  रिपोर्टों से पता चला है कि बड़ी संख्या में लोग म्यांमार से भागकर भारत की सीमा मे प्रविष्ट हो रहे हैं।  बहुत से लोग भारत की सीमा में तो नहीं घुसे लेकिन अपनी जान बचाने के लिए वे सीमावर्ती क्षेत्रों में भाग आए हैं।  वर्तमान समय में म्यांमार के बहुसंख्यकों के साथ कुछ एसा ही हो रहा है जैसा कुछ वर्षों पहले यहीं के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के साथ किया गया था।

सन 2016 और 2017 में म्यांमार के राख़ाईन प्रांत में इस देश की सेना के दमन और अत्याचारों के कारण लाखों रोहिंग्या मुसलमान वहां से पलायन करने पर मजबूर हुए थे।  सेना ने इनके साथ बलात्कार, दमन और नरसंहार सबकुछ किया।  सेना के अत्याचारों और यातनाओं से बचने के उद्देश्य से जो लाखों रोहिंग्या मुसलमान, म्यांमार से भागे थे उनमे से अधिकांश ने बांग्लादेश में शरण ली थी जबकि न जाने कितने रोहिंग्या, दर-दर की ठोकरे खाने के बाद इस दुनिय से चल बसे।  विशेष बात यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ने म्यांमार में अल्पसंख्यकों के साथ की जाने वाली हिंसा को मानवाधिकारों का हनन घोषित किया था।  हालांकि उस समय भी म्यांमार की सेना ने अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को ख़ारिज कर दिया था। 

उस समय आंग सांग सूची और उनकी पार्टी एनएलडी, सेना के साथ खड़े थे किंतु विडंबना देखिए कि आज वे और उनकी सरकार सब ही उसी सेना के निशाने पर आ चुके हैं जिनको उन्होंने हमेशा ही क्लीन चिट दी।

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