Jun २३, २०२१ १९:२६ Asia/Kolkata
  • मादक पदार्थ अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष दिवस

मादक पदार्थों के अभिशाप और उसकी तस्करी को रोकने में इस्लामी गणतंत्र ईरान के अद्वितीय योगदान 

इस्लामी गणतंत्र ईरान मादक पदार्थों की तस्करी से मुक़ाबले की अग्रिम पंक्ति है और उसके योगदान की विश्व समुदाय भी सराहना करता है।

पांच तीर अर्थात 26 जून को मादक पदार्थों से मुकाबले का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। मादक पदार्थों की तस्करी जहां इसके सौदागारों के लिए बहुत अधिक मुनाफ़े का कारोबार है वहीं विश्व की वर्चस्वादी शक्तियां मादक पदार्थों का प्रयोग विकासशील देशों पर वर्चस्व जमाने के हथकंडे के रूप में करती हैं।

राजनैतिक और सामाजिक मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि विश्व की वर्चस्वादी शक्तियाँ मादक पदार्थ को सांस्कृतिक धावे के लिए बेहतरीन हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं और इससे वे दूसरे देशों व समाजों में पैठ बनाती और प्रभाव बढ़ाती हैं। इस दृष्टि से मादक पदार्थों का अभिशाप किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं है और उसका अभिशाप भौगोलिक सीमा से बाहर हो गया है। दूसरे शब्दों में अब मादक पदार्थ अंतर्राट्रीय चुनौती बन गया है।

मादक पदार्थों के पहले लक्ष्य युवा होते हैं जो हर देश व समाज के भविष्य होते हैं। समाज में मादक पदार्थों के सेवन के नुक़सानों की गणना नहीं की जा सकती। मिसाल के तौर पर अगर कोई छात्र या छात्रा मादक पदार्थों के सेवन का आदी हो गया तो उसके स्कूल या विश्वविद्यालय की पढ़ाई चौपट हो जायेगी। यही नहीं वह दूसरी बहुत सारी नैतिक बुराइयों में भी पड़ सकता है। सारांश यह कि उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाती है।

बहुत से समाजों में यह भी होता है कि जिस परिवार का युवा नशा  करने लगता है उसे लोग अच्छी नज़रों से नहीं देखते। कोई भी इंसान नशा करने वाले युवा से अपनी लड़की की शादी नहीं करता। नशा करने वाले बहुत से युवा, शादी से पहले लड़की वालों को यह भी नहीं बताते कि वे नशा करते हैं क्योंकि वे इस बात को जानते हैं कि अगर उन्होंने यह बात बता दी कि वे नशा करते हैं, तो कोई भी इंसान उन्हें अपनी लड़की नहीं देगा।

आज बहुत से लोगों का तलाक़ केवल इस बात पर हो जाता है कि लड़का  नशा करता है। जो लोग नशे के आदी हो जाते हैं, जब मादक पदार्थों की खरीदारी के लिए उनके पास पैसा नहीं होता है तो वे धीरे- धीरे घर के सामानों को बेचना और चोरी करना भी आरंभ कर देते हैं। सारांश यह कि नशे का सेवन समाजों और परिवारों की बर्बादी की जड़ है।  

कुछ कारणों से पश्चिम एशिया के देशों को मादक पदार्थों और उसकी तस्करी का सबसे अधिक ख़तरा है। जब इस प्रकार का ख़तरा है तो सीधी सी बात है कि इस ख़तरे से बचने के लिए इस क्षेत्र के देशों को अनवरत प्रयास करने की ज़रूरत है। क्योंकि इस संबंध में हर प्रकार की लापरवाही मादक पदार्थों की पहुंच के सरल हो जाने का कारण बनेगी और जिस समाज व देश में मादक पदार्थों की पहुंच आसान हो जायेगी उसे उतनी ही आसानी से बर्बाद किया जा सकेगा।

चूंकि विश्व में मादक पदार्थों का सबसे अधिक उत्पादन अफ़ग़ानिस्तान में होता है और ईरान अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोस में स्थित है और इन मदार्थों को यूरोप तक पहुंचाने के लिए ईरान से गुज़रना पड़ता है इसलिए ईरान को मादक पदार्थों से ख़तरा दोगुना हो गया है। जिस देश या समाज के अंदर मादक पदार्थ पहुंच जाता है तो कोई भी इसका शिकार बन सकता है परंतु सबसे अधिक युवा ही इसके शिकार बनते हैं।

इस बात का उल्लेख ज़रूरी है और वह यह है कि युवा पीढ़ी हर समाज या देश की रीढ़ की हड्डी होती है और सीधी सी बात है कि जिस समाज या देश की रीढ़ की हड्डी ही कमज़ोर हो जायेगी तो वह हर क्षेत्र में कमज़ोर व पीछे हो जायेगा।

इस बात का भी उल्लेख ज़रूरी है कि मादक पदार्थों के तस्करों का अस्ली लक्ष्य इन पदार्थों को यूरोप तक पहुंचाना होता है और यूरोप तक इन पदार्थों को पहुंचाने के लिए सबसे सस्ता, आसान और निकट रास्ता ईरान से होकर गुज़रता है इसलिए मादक पदार्थों से मुक़ाबले के लिए ईरान बहुत प्रयास कर रहा है। इस प्रकार से कि अब तक मादक पदार्थों से मुक़ाबले के मार्ग में चार हज़ार सुरक्षा बलों की शहादत दे चुका है जबकि 12 हज़ार से अधिक सुरक्षा बल घायल हो चुके हैं।  

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार केवल पिछले वर्ष ईरान ने 950 टन विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थों को बरामद किया था। जिन देशों व समाजों में इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ पहुंचते हैं, वहां कितनी तबाही मचती और कितने लोगों व परिवारों की बर्बादी होती? दूसरे शब्दों में ईरानी सुरक्षा बलों ने हज़ारों नहीं बल्कि शायद लाखों लोगों को मादक पदार्थों के अभिशाप से बचाया है और मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाले किसी भी देश को ईरान की यह कुर्बानियां नज़र नहीं आती।

आज दुनिया का शायद ही कोई देश हो जिसे मादक पदार्थों के अभिशाप का सामना न हो। बहुत से देश मादक पदार्थों से मुकाबले के लिए काफ़ी धन व बल ख़र्च कर रहे हैं फिर भी विभिन्न देशों में मादक पदार्थों का सेवन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस समय पूरी दुनिया में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग मादक पदार्थों के सेवन से पीड़ित और उनके उपचार की ज़रूरत है। इस ज़रूरत का आभास तीन दशक पहले से किया जा रहा है। मादक पदार्थों की तस्करी और नशे से मुकाबले के लिए 26 जून 1987 को वियना में एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेन्स हुई थी और उसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसमें मादक पदार्थों से मुक़ाबले पर बल दिया गया था। इसी प्रकार वियना में होने वाली उस कांफ्रेंस में शिक्षा व प्रशिक्षा के माध्यम से मादक पदार्थों की रोकथाम, पोस्ते के खेतों को बर्बाद करने और इसी प्रकार मादक पदार्थों के संबंध में एक दूसरे से सहयोग करने वाले चैनलों को नष्ट किये जाने पर भी बल दिया गया था।

ठोस रिपोर्टें इस बात की सूचक हैं कि वर्ष 2001 में अमेरिका और उसके घटक देशों द्वारा अफ़ग़ानिस्तान का अतिग्रहण कर लिये जाने के बाद इस देश की बहुत सारी ज़मीनों पर पोस्ते की खेती होने लगी। इस प्रकार से कि राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थों की खेती में दसियों गुना की वृद्धि हो गयी। कुछ रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2001 में अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 180 टन अफ़ीम का उत्पादन होता था और हालिया वर्षों में यह मात्रा नौ हज़ार टन पहुंच गयी है।

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार दुनिया में पैदा होने वाली हीरोइन का 93 प्रतिशत भाग केवल अफ़ग़ानिस्तान में होता है और अफ़ग़ानिस्तान में तीन लाख हेक्टर से अधिक की ज़मीन पर पोस्ते की खेती की जाती है। अगर अफ़ग़ानिस्तान के तीन दशकों के इतिहास पर नज़र डालें और उसका विश्लेषण करें तो बहुत आसानी से समझ में आ जायेगा कि यह देश किन कारणों से मादक पदार्थों के उत्पादन का केन्द्र बन गया।

जिन कारणों से अफ़ग़ानिस्तान मादक पदार्थों का उत्पादन केन्द्र बन गया उनमें सबसे महत्वपूर्ण इस देश में अमेरिकी व विदेशी सैनिकों की उपस्थिति और पश्चिम एशिया के संबंध में अमेरिका की विनाशकारी नीतियां हैं। अमेरिका ने वर्ष 2001 में आतंकवादी गुटों से मुकाबले और सुरक्षा स्थापित करने के बहाने अफगानिस्तान पर हमला करके इस देश पर कब्ज़ा कर लिया था और अब 20 वर्षों के बाद अमेरिकी सैनिक ऐसी स्थिति में अफगानिस्तान से जा रहे हैं जब वहां से न तो आतंकवादी गुटों का अंत हुआ और न ही अफगानिस्तान में शांति स्थापित हुई। यही नहीं रोचक बात यह है कि अफगानिस्तान के जिन क्षेत्रों में अमेरिकी और ब्रितानी सैनिक तैनात थे वहां पर मादक पदार्थों की खेती में कई गुना की वृद्धि हो गयी है। हालिया वर्षों में आतंकवादियों की आय का मुख्य स्रोत अफगानिस्तान है यानी वहां मादक पदार्थों की होने वाली खेती।

हर वर्ष 1500 से 2000 टन तक अफीम से गुप्तरूप से अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हीरोइन और मॉर्फ़िन बनाई जाती है और उसके बाद तस्कर ईरान के रास्ते यूरोप तक पहुंचाने की चेष्टा करते हैं। इस समय पूरी दुनिया में हीरोइन का जो कारोबार है वह 500 अरब डालर से अधिक है और इस अवैध पैसे को पश्चिमी देशों के बैंको में वाइट मनी में बदला जाता है।

अफगानिस्तान में मादक पदार्थों की खेती और उसकी यूरोपीय देशों के लिए तस्करी ईरान के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और ईरान इसकी तस्करी को रोकने के लिए अपने हज़ारों सीमा सुरक्षा बल के जवानों के प्राणों की कुर्बानी दे चुका है। ईरान ने मादक पदार्थों के तस्करों से मुकाबले के लिए लगभग 2000 किलोमीटर की सीमा के कुछ भागों पर दीवारें बना दी हैं, कटीले तार लगा दिये हैं, निगरानी करने वाली चौकियां बना दी हैं, कैमरे लगा दिये हैं और गहरी खाइयां खोद दी हैं।

इटली के पूर्व राजदूत एलेक्ज़ेडर स्कॉटी ने कहा है कि मादक पदार्थ का नियंत्रण एक चुनौती है जिसका सामना पूरी दुनिया को है। उन्होंने विश्व समुदाय का आह्वान किया है कि इन पदार्थों के नियंत्रण में ईरान की बहुत महत्वपूर्ण और रचनात्मक भूमिका को मान्यता दी जाये और इस्लामी गणतंत्र ईरान की सराहना के साथ इस संबंध में उसके साथ सहयोग को मज़बूत किया जाये।

बहरहाल मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने के संबंध में ईरान बहुत ही रचनात्मक व प्रभावी भूमिका निभा रहा है। जिन मादक पदार्थों को यूरोपीय और पश्चिमी देशों के लिए भेजा जाता है अगर ईरान उन्हें नहीं पकड़ता व रोकता तो इन देशों की स्थिति बहुत ही बुरी होती और शायद ही यूरोप का कोई देश मादक पदार्थों के अभिशाप से बच पाता।

ईरान ने मादक पदार्थों से मुकाबले में यूरोपीय देशों के गम्भीर न होने के कारण बारमबार इन देशों की आलोचना की है। बहरहाल मादक पदार्थों से मुकाबले का अंतरराष्ट्रीय दिवस इस बात के लिए बेहतरीन अवसर है कि यह बयान किया जाये कि मादक पदार्थों से क्या-क्या नुकसान होते हैं, इन पदार्थों से मुकाबले में इस्लामी गणतंत्र ईरान ने जो कुर्बानियां दी हैं और दे रहा है दुनिया के किसी भी देश ने नहीं दी है और विश्व समुदाय विशेषकर यूरोपीय देशों को चाहिये कि वे मादक पदार्थों के विनाशकारी परिणामों व दुष्प्रभावों के दृष्टिगत ईरान से अधिक से अधिक सहयोग करें।

 

 

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