Jan ०२, २०२२ १५:२३ Asia/Kolkata
  • अनमोल रत्न

जनरल सुलेमानी की दूसरी बर्सी पर विशेष कार्यक्रम 3 जनवरी 2020 की सुबह अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और स्वतंत्र देशों की संप्रभुता की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए एक बड़ा अपराध किया। ट्रम्प के आदेश के मुताबिक़, अमरीकी ड्रोन विमानों ने बग़दाद एयरपोर्ट के निकट ईरान की इस्लामी क्रांति सेना आईआरजीसी की क़ुद्स ब्रिगेड के कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी और इराक़ी स्वयं सेवी बलों के फ़्रंट हशदुश्शाबी के कमांडर अबू मेहदी अल-मोंहदिस को मिसाइल हमला करके शहीद कर दिया।

दाइश जैसे ख़ूंख़ार आतंकवादी गुटों के ख़िलाफ़ लड़ाई और अमरीकी तथा ज़ायोनी साम्राज्य के ख़िलाफ़ संघर्ष जनरल सुलेमानी की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी थी। इसलिए उनकी

शहादत से न केवल ईरान, बल्कि पश्चिम एशिया का पूरा इलाक़ा और इस्लामी जगत ग़म में डूब गया था। इराक़ी जनता, सरकार और राजनेताओं ने अमरीकी हमले में शहीद होने वाले अपने जियालों को जिस तरह से श्रद्धांजलि दी, उसी तरह से उन्होंने जनरल सुलेमानी को भी सलामी दी। लेकिन शहीद सुलेमानी का शव जब ईरान लाया गया, तो लाखों और करोड़ों लोग अपने बहादुर योद्धा को श्रद्धांजलि देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े। निसंदेह जनरल सुलेमानी के ख़ून का बदला लेने के लिए करोड़ों लोगों के संकल्प और नारों की गूंज से उनके हत्यारों की रूह तक कांप गई होगी। ... लाखों की भीड़ में शामिल जनरल सुलेमानी के नाम की वर्दी पहने हुए यह बच्चा चिल्ला चिल्लाकर कह रहा हैः जनरल सुलेमानी हम सभी के दिलों में बस्ते हैं, वह एक लौह पुरुष थे। उन्होंने दाइश को नष्ट कर दिया।

इस्लामी मामलों के जानकार और विद्वान अल्लामा मोहम्मद अमीनी शहीदी मध्यपूर्व में अमरीका और इस्राईल की साज़िशों से पर्दा उठाते हुए और इन साज़िशों पर पानी फेरने में जनरल सुलेमानी की भूमिका के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैः ...

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जनरल सुलेमानी के संघर्ष को हम तीन चरणों में बांट सकते हैः पहला चरण ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान किया गया संघर्ष है। दूसरे चरण में उन्होंने पूर्वी ईरान में विद्रोही तत्वों के सफ़ाए में अहम भूमिका निभाई और तीसरा चरण इस्लामी देशों में अल-क़ायदा, दाइश और तकफ़ीरी आतंकवादी गुटों को पराजित करने से संबंधित है। जनरल सुलेमानी ने इन तीनों चरणों में अपनी बेजोड़ रणनीति और दूरदर्शिता से महत्वपूर्ण सफलताएं अर्जित की और लड़ाई के मैदान में दुश्मन को धूल चटाई। उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि ख़ुद दुश्मन, युद्ध की उनकी रणनीति, युद्ध के मैदान में उनके साहस, समझदारी और दूरदर्शिता की तारीफ़ करने पर मजबूर हो जाते थे। युद्ध के मोर्चे पर उनके एक साथी कमांडर का कहना हैः उनका कमांड ऑफ़िस अग्रिम मोर्चे पर स्थित होता था। वह हमेशा अपनी सेना और दुश्मन के बीच एक दीवार बने रहते थे, उन्हें अपने सैनिकों का जीवन बहुत प्यारा होता था। इसीलिए युद्ध के मैदान का जायज़ा लेने के अलावा, सैनिकों को निर्देश देने से लेकर ऑपरेशन की सभी योजनाओं को ख़ुद ही अंजाम दिया करते थे।

जनरल सुलेमानी के संघर्ष के दूसरे चरण के बारे में उनके दोस्त और मोर्चे पर साथ लड़ने वाले हसन पिलार्क का कहना हैः युद्ध जब ख़त्म हो गया और जनरल सुलेमानी अपने वतन किरमान लौट गए, तो देश के पूर्वी इलाक़ों में अशांति और विद्रोह की ख़बरें आने लगीं। उस समय इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने कहाः क्या क़ासिम सुलेमानी वहीं नहीं हैं? वहां की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी जाए। उनके आदेश के मुताबिक़, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने अशांत इलाक़ों में शांति की स्थापना की ज़िम्मेदारी आईआरजीसी को सौंप दी। आईआरजीसी ने जनरल सुलेमानी की कमान में वहां एक कमांड सेंटर की स्थापना की। जनरल सुलेमानी ने बहुत सोच विचार के बाद और बेहतरीन रणनीति के तहत तीन दिन तक आम माफ़ी का एलान करते हुए कहाः जिस किसी ने भी हथियार उठाए हैं और अब तक कोई अपराध किया है, तीन दिन के अन्दर अगर वह आत्मसमर्पण कर देता है, तो मैं उसे माफ़ीनामा दे दूंगा और वह पूरी तरह से सुरक्षित रहेगा। आम माफ़ी के एलान के पहले दिन ही 400 से 500 विद्रोहियों ने हथियार डाल दिए और आत्मसमर्पण कर दिया। लम्बी लम्बी लाइनें लग गईं और सुरक्षा बलों की समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह से इन हथियारों को इकट्ठा करें। इस तरह से ख़ून ख़राबे के बिना क्षेत्र में शांति स्थापित हो गई और किरमान प्रांत आज तक शांत है।

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जनरल सुलेमानी के संघर्ष के तीसरे चरण के बारे में भारतीय पत्रकार अहमद काज़मी कहते हैः ... सीरिया संकट में जनरल सुलेमानी की एंट्री के बारे में उनके एक साथी का कहना हैः मिस्र, लीबिया, बहरैन और ट्यूनीशिया में अमरीका के इशारे पर अशांति फैलने के साथ ही सीरिया में झड़पें शुरू हो गईं। कुछ इलाक़ों से शुरू हुई यह झड़पें पूरे देश में फैल गई और जल्द ही इन झड़पों ने देश की सरकार के ख़िलाफ़ तकफ़ीरी और वहाबी विचारधारा के तहत भयानक आतंकवादी कार्यवाहियों का रूप ले लिया। आतंकवादी गुटों ने अमरीका, सऊदी अरब और इस्राईल के समर्थन से लड़ाई के मैदान में बाज़ी मारना शुरू कर दी। उनका लगभग सभी ज़मीनी सीमाओं पर क़ब्ज़ा हो चुका था, सिर्फ़ भूमध्यसागरीय जल सीमा बाक़ी बची थी। आतंकवीद दमिश्क़ के अंदर तक घुस चुके थे। उन्होंने हज़रत ज़ैनब के रौज़े के गुबंद को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। एयरपोर्ट तक जाने वाला रोड बंद हो चुका था। उस समय इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने जनरल सुलेमानी से कहाः जाओ और मदद करो, कहीं सीरिया की सरकार का पतन न हो जाए और तकफ़ीरी शासन की स्थापना न हो जाए। उसके बाद उनकी सीरिया में एंट्री होती है। उनके वहां पहुंचते ही समस्त साज़िशों पर पानी फिरता चला गया।

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इस्राईल, सऊदी अरब और अमरीका ज़ायोनी विरोधी इस्लामी प्रतिरोधी मोर्चे को नष्ट करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने तकफ़ीरी आतंकवादी गुटों को जन्म दिया, ताकि लेबनान, इराक़ और सीरिया के टुकड़े करके इस्राईल के मुक़ाबले में इन देशों को हमेशा के लिए कमज़ोर कर सकें। लेकिन जनल सुलेमानी इन आतंकवादी गुटों के रास्ते में सीसा पिलाई दीवार बनकर खड़े हो गए और उन्होंने इस्लाम के दुश्मनों को उनके लक्ष्यों तक नहीं पहुंचने दिया। उन्होंने इराक़, सीरिया, लेबाना और फ़िलिस्तीनी क़बीलों को एकजुट किया और प्रतिरोधी मोर्चे को मज़बूती प्रदान की। इस प्रकार, जनरल सुलेमानी विश्व मीडिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिरोध का प्रतीक बन गए और उन्होंने अपने ख़ून से प्रतिरोधी मोर्चे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और सीमाओं के उस पार अधिक मज़बूत बना दिया है। उनकी शहादत ने न सिर्फ़ मुसलमानों और प्रतिरोधी संगठनों को एकजुट किया है, बल्कि इस्लामी जगत, पश्चिम एशिया और दुनिया भर के स्वतंत्रता प्रेमियों के दिलों में अमरीका और ज़ायोनी विरोधी भावनाओं को जगा दिया है।

 

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