Feb ०५, २०२० १७:३१ Asia/Kolkata

फ़रवरी 1979 में ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता से न सिर्फ़ ईरान में भ्रष्ट व निरंकुश पहलवी शासन का अंत हुआ बल्कि विदेश में भी इसका काफ़ी असर पड़ा।

इन अहम प्रभावों में अध्यात्म में विस्तार, इस्लाम को दुबारा जीवन मिलना और पूरी दुनिया में इस आसमानी धर्म की ओर दिन प्रतिदिन बढ़ता झुकाव है। इस महाक्रान्ति के घटने से पूरी दुनिया में अध्यात्म व धर्म की ओर रुझान बढ़ा। इस्लाम के विद्वान व धर्मगुरु के रूप में इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का क्रान्ति को इस्लाम के मार्ग की ओर मोड़ने और क्रान्तिकारी इस्लाम को व्यापक बनाने में मुख्य रोल था। बड़ी तादाद में ग़ैर मुसलमान भी इमाम ख़ुमैनी की ओर उन्मुख हुए और इस्लाम को अपने धर्म के रुप में अपनाया। दूसरी ओर विभिन्न देशों में बड़ी तादाद में मुसलमान इमाम ख़ुमैनी की आध्यात्मिक शख़्सियत की ओर आकर्षित हुए और उनमें शुद्ध इस्लाम में रूचि पैदा हुयी जिसकी ओर इमाम ख़ुमैनी बुलाते थे। इस बारे में स्वीडन के पत्रकार व बुद्धिजीवी अहमद हूबर कहते हैः "इमाम ख़ुमैनी हमारे दौर में सभी एकेश्वरवादियों को जागरुक बनाने वाले हैं। भौतिकवाद के वर्चस्व, भौतिक हथकंडों व अध्यात्म विरोधी विचारों के दौर में, धर्म व अध्यात्म का जीवित होना, इमाम ख़ुमैनी और उनके क्रान्तिकारी साथियों का ऋणी था।" इस्लामी क्रान्ति के मूल्यों और इसके नेता की ओर झुकार रखने वाले लोगों में कुछ के बारे में यह बताना रोचक रहेगा कि इन लोगों में यह रुझान क्योंकर पैदा हुआ जिससे इस आंदोलन के अध्यात्मिक असर का कुछ हद तक वर्णन हो सकेगा।

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह इराक़ के बासी शासन के दबाव में इस देश को छोड़ने पर मजबूर हुए और 6 अक्तूबर 1978 को पेरिस पहुंचे और इस शहर के उपनगरीय भाग में स्थित नोफ़ेल लोशातो नामक गांव में लगभग चार महीना निवास किया। इस दौरान इंटरव्यू, विज्ञप्ति और मुलाक़ात के ज़रिए इस्लामी क्रान्ति के स्वरूप व उद्देश्य की सबके लिए व्याख्या की और उसकी सफलता की प्रक्रिया को तेज़ किया। इस बीच नोफ़ेल लोशातू सहित फ़्रांस के दूसरे क्षेत्रों के बहुत से निवासियों के मन में इमाम ख़ुमैनी के लिए लगाव पैदा हुआ। इनमें से एक श्रीमती मोहरज़े लाइब भी थीं। उनकी इमाम ख़ुमैनी से संक्षिप्त सी मुलाक़ात और उनके अध्यात्मिक ओज से यह फ़्रांसीसी महिला बहुत प्रभावित हुयीं। इस अध्यात्मिक बदलाव के नतीजे में उनमें इस्लाम के बारे में अध्ययन करने की रूचि पैदा हुयी जिसकी ओर इमाम ख़ुमैनी ने आमंत्रित किया था। थोड़े ही समय में वह इस ईश्वरीय धर्म की सच्चाई को समझ गयीं। श्रीमती मोहरेज़ा की नई आस्था का उनके पति और बच्चों पर भी असर पड़ा। उन्होंने पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की शिक्षाओं व मूल्यों को अपनी जीवन शैली के रूप में अपनाया। वह इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद, दो बार स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी से मुलाक़ात के लिए ईरान आयीं। एक मुलाक़ात के दौरान इमाम ख़ुमैनी ने उन्हें एक क़ुरआन भेंट किया जिस पर इमाम ख़ुमैनी के दस्तख़त थे। श्रीमती मोहरेज़ा लाएब की पोती अपने दादी के शिष्टाचार के बारे में कहती हैः "मेरी दादी का व्यवहार इतना आकर्षक था कि जो भी उनसे बात करता, वह ख़ुद ब ख़ुद उनके धर्म व मत के बारे में उनसे पूछता और इस्लाम की ओर उन्मुख होता। पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से जो श्रद्धा हमारी दादी को थी, उसी के असर से पूरा घर और रिश्तेदार मुसलमान हुए और उन्होंने शिया मत अपनाया। इन बस सफलताओं के पीछे पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का आशीर्वाद है।"    

श्रीमती मोहरेज़ा लाएब

      

श्रीमती लाएब दूसरों के सामने उस सच्चाई को पेश करना अपनी ज़िम्मेदारी समझती थीं जिसे उन्होंने समझा था। यही वजह है कि उन्होंने ईश्वर पर भरोसे, अपने पति और दोस्तों के समर्थन तथा अपनी अपार दौलत को फ़्रांस में इस्लामी क्रान्ति और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को पहचनवाने में ख़र्च किया और इस रास्ते में उन्हें बहुत सफलता मिली। उन्होंने फ़्रांस में बड़ी तादाद में मस्जिदें और इस्लामी केन्द्र स्थापित किए और सच्चे इस्लाम व अध्यात्म को अपने देश में फैलाने की कोशिश की। इस फ़्रांसीसी महिला की प्राचारिक कोशिश की ओर से इस देश की सरकार संवेदनशील हो गयी। यहां तक कि फ़्रांसीसी सरकार ने झूठा इल्ज़ाम लगाकार उन्हें जेल भेज दिया। उन्होंने जेल में क़ैदियों का मार्गदर्शन करने की कोशिश शुरू की और उन्हें इस्लाम, क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम से परिचित कराया। उन्होंने जेल में अपनी सेल में इमाम ख़ुमैनी की तस्वीर लगा रखी थी। फ़्रांस की पुलिस को जब यह पता चला तो उसने यह समझते हुए कि जेल में श्रीमती लाएब की मौजूदगी, जेल से बाहर रहने की तुलना में अधिक ख़तरनाक है, उन्हें आज़ाद कर दिया और फिर उन पर नज़र रखना शुरु कर किया। इन सबके बावजूद श्रीमती लाएब फ़्रांस में अपनी धार्मिक व क्रान्तिकारी कोशिश में लगी रहीं और अपनी सारी दौलत इस रास्ते में ख़र्च कर दी। यहां तक कि 2015 के अंतिम दिनों में इस नश्वर संसार से चल बसीं।

 

इटली के एक जवान में भी इमाम ख़ुमैनी की इस्लामी क्रान्ति को जानने व समझने की जिज्ञासा पैदा हुयी। उनका नाम था रॉबर्टो आरकाडी। वे ईश्वर, सृष्टि, विभिन्न ईश्वरीय व ग़ैर ईश्वरीय धर्मों व मतों का अध्ययन करने के बावजूद, संतुष्ट नहीं हो पाए थे क्योंकि उनके सवालों का संतोषजनक जवाब उन्हें नहीं मिला था। जब वह इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की आकर्षक शख़्सियत से परिचित हुए तो उनका जीवन बदल गया। वह कहते हैः "मैंने इमाम ख़ुमैनी को एक बार टेलीविजन पर देखा। इस महापुरुष की महानता व दृढ़ता ने मुझे सम्मोहित कर लिया और मेरे मन में यह सवाल उठा कि वह कौन हैं और कहां से आए हैं? किस तरह यह हस्ती इतनी वीरता के साथ दुनिया के सामने डटी हुयी है। मुझे उनकी शख़्सियत बहुत ही आकर्षक लगती थी। इसी वजह से मैंने इस्लाम और इस्लामी क्रान्ति के बारे में अध्ययन किया ताकि उसके बारे में अधिक जान सकूं। पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के अनुयाइयों के एक छोटे गुट से परिचित हुआ और फिर मीलान में रहने वाले ईरानियों से संपर्क किया। अंततः मानवता के आख़िरी मोक्षदाता इमाम महदी अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस पर एक दोस्त मुझे ईरानियों के इस्लामी केन्द्र ले गए जहां मैंने कलमा पढ़ा और शिया हो गया।"

इमाम ख़ुमैनी की शख़्सियत का असर रॉबर्टो पर इतना ज़्यादा था कि उन्होंने अपना नाम बदल कर रूहुल्लाह रखा और उनके आध्यात्मिक व दार्शनिक विचारों की गहन समीक्षा की। रॉबर्टो, इमाम ख़ुमैनी की महान शख़्सियत के बारे में कहते हैः "इमाम की शख़्सियत कई आयामी थी न कि एक आयामी। वह सभी मामलों में परिपक्व थे और यह एक ईश्वरीय पाठ है। उनका जनता से बहुत ही मज़बूत संपर्क था। वह ईश्वर की एक नेमत थे।"       

इमाम ख़ुमैनी के ईरान आने से पहले पेरिस में लिए गए इंटरव्यू का इस्लामी क्रान्ति के स्वरूप और उसके लक्ष्यों को पहचनवाने में बड़ा असर पड़ा। इनमें से एक इंटरव्यू नाइजीरिया के वरिष्ठ धर्मगुरु शैख़ इब्राहीम ज़कज़की को भी मिला जो उस वक़्त नाइजीरिया में अर्थव्यवस्था के छात्र थे। अपने देश में इस्लामी शासन की स्थापना उनकी तमन्ना थी। जब उन्हें यह पता चलता है कि इमाम ख़ुमैनी ईरान में इस तरह की शासन व्यवस्था क़ायम करना चाहते हैं तो उनके मन में इमाम ख़ुमैनी के लिए श्रद्धा पैदा होती है। शैख़ इब्राहीम ज़कज़की उस वक़्त ईरान की इस्लामी क्रान्ति को पहचनवाने के लिए इमाम ख़ुमैनी के कई इंटरव्यू को एक जगह इकट्ठा करते हैं और उसे छात्रों में बांटते हैं। वह और उनके दोस्त इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रान्ति से इतना प्रभावित होते हैं कि इस्लामी क्रान्ति की सफलता की वर्षगांठ पर ईरान आते हैं और उनसे मुलाक़ात करते हैं। इमाम ख़ुमैनी से मुलाक़ात के बाद शैख़ इब्राहीम ज़कज़की जब उनसे पूछते हैं कि क्या नाइजीरिया की जनता के लिए आपका कोई संदेश है तो इमाम ख़ुमैनी उन्हें क़ुरआन की एक प्रति देते हुए कहते हैः "नाइजीरिया की जनता को मेरा सलाम पहुंचाइये और उनसे कहिए कि ख़ुमैनी की सारी बात सिर्फ़ और सिर्फ़ यह है कि क़ुरआन की बात को मानिए। हम क़ुरआन की शिक्षाओं को अपने देश में प्रचलित करना चाहते हैं और दूसरों की अपने अपने देश में क़ुरआन की शिक्षा को प्रचलित कराने में मदद करना चाहते हैं।"

शैख़ इब्राहीम ज़कज़की

 

इमाम ख़ुमैनी की प्रभावी शख़्सियत और उनकी तत्वदर्शी बातों का शैख़ इब्राहीम ज़कज़की पर इतना असर होता है कि स्वदेश लौटते वक़्त हाथ में क़ुरआन लिए रो रहे थे और कह रहे थेः "मैंने इस महापुरुष के चेहरे में हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा, हज़रत ईसा और हज़रत मोहम्मद की झलक देखी। आज के बाद से मेरा धर्म वही है जो ख़ुमैनी का धर्म है।" इसके बाद वह अपने देश की जनता को इमाम ख़ुमैनी के विचारों परिचित कराने का संकल्प लेते हैं। उनकी कोशिशों के नतीजे में डेढ़ करोड़ लोग शुद्ध इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के मत को स्वीकार करते हैं। अलबत्ता इस महा उद्देश्य की प्राप्ति में शैख़ ज़कज़की को बारंबार जेल जाना पड़ा, उनके 3 बेटे शहीद हो गए और इस समय वह अपनी बीवी के साथ बहुत ही बुरी हालत में हिरासत में हैं।   

फ़्रांस के मशहूर विचारक व दार्शनिक रॉजर गैरोडी भी उन लोगों में हैं जो ईरानी जनता की क्रान्ति के नेता इमाम ख़ुमैनी की आध्यात्मिक शख़्सियत से बहुत प्रभावित हुए थे। एक समय वह फ़्रांस में कम्यूनिस्ट पार्टी के मुख्य योजनाकार थे, बाद में वह भी मुसलमान हो गए। वह इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रान्ति के बारे में कते हैः "इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरान की इस्लामी क्रान्ति शुद्ध इस्लामी संस्कृति व सभ्यता उपहार में लायी और दुनिया के सुदूर क्षेत्रों में रह रहे करोड़ों मुसलमानों के मन में उम्मीद की किरण जगायी, इस्लाम को दोबारा जीवन दिया और इस्लामी जगत की पिछली महानता को फिर से जीवित किया।"

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