Feb ०८, २०२० १६:४३ Asia/Kolkata

पवित्र कुरआन उन लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम का अनुयाई बताता है जो प्रतिरोध करते हैं और कभी भी न तो प्रतिरोध करने से रुकते हैं न ही पीछे हटते हैं और दुनिया में इस्लाम के प्रचार- प्रसार के लिए प्रयास करते हैं।

इस कार्य से जहां दोस्त खुश होते हैं वहीं दुश्मन क्रोधित होते हैं। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे फत्ह की 29 वीं आयत में कहता है” वे उस खेती की भांति हैं जिसके अंकुर ज़मीन चीर कर बाहर निकलते हैं उसके बाद वे मज़बूत होकर अपने पैरों पर खड़े हो गये हैं और वे इतने बड़े हो गये हैं कि कृषक उन्हें देखकर आश्चर्य चकित हो जाते हैं। यह इसलिए है ताकि काफिर इन्हें देखकर क्रोधित हो जायें।

इराक ने ईरान पर जो आठ वर्षीय युद्ध थोपा था वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे लंबा और विनाशकारी युद्ध था। अलबत्ता इसे ईरानी इतिहास में गौरवान्वित दिनों के रूप में लिखा गया और याद किया जाता है। अब इस युद्ध को समाप्त हुए दशकों का समय बीत रहा है परंतु ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से दुश्मनों की ओर से जो प्रतिबंध लगाये गये थे वे आज भी जारी हैं। इराक ने ईरान पर जो आठ आठ वर्षीय युद्ध थोपा था उससे ईरान ने बहुत से अनुभव हासिल किया है और उन्हीं अनुभवों का लाभ उठाते हुए उसने कठिन से कठिन चुनौती को अवसर में बदल दिया है। इस युद्ध पर पवित्र कुरआन की वह आयत चरितार्थ होती है जिसमें महान ईश्वर कहता है कि अगर तुम ईश्वर की मदद करोगे तो वह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें विजयी बनायेगा।

इराक द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध के कुछ दशकों के बाद पूरी दुनिया ने देख लिया कि ईरान ने आंतरिक क्षमताओं व संभावनाओं पर भरोसा करके दुश्मनों की ओर से खड़ी की गयी रुकावटों और चुनौतियों का किस प्रकार मुकाबला किया और इन्हीं चुनौतियों को किस तरह अवसर में बदल दिया। गत चालिस वर्षों से दुश्मन और वर्चस्ववादी व्यवस्थायें ईरान के रास्ते में विभिन्न तरीक़ों से बाधायें खड़ी करती रही हैं परंतु ईरान इन बाधाओं का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में ईरान ने जो उपलब्धियां अर्जित की हैं वे इस बात का प्रमाण हैं कि ईरान ने दुश्मनों की ओर से उत्पन्न की गयी चुनौतियों को अवसर में बदल दिया है। यही नहीं ईरान ने विभिन्न क्षेत्रों में जो ध्यानयोग्य प्रगतियां की हैं और उपलब्धियां अर्जित की हैं वे इस बात की सूचक हैं कि दुश्मनों के दबाव और प्रतिबंध न तो ईरान को आगे बढ़ने से रोक पाये हैं और न ही रोक सकते हैं।

 

महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे निसा की 141वीं आयत के एक भाग में मुसलमानों की स्वतंत्रता व स्वाधीनता की ओर संकेत करते हुए कहता है" ईश्वर ने कदापि काफिरों को मोमिनों पर तसलुल्लत व वर्चस्व नहीं दिया है। पवित्र कुरआन की यह आयत अच्छी तरह इस बात की सूचक है कि राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इस्लामी समाज की स्थिति एसी नहीं होनी चाहिये जिससे ग़ैर मुसलमान मुसलमानों पर वर्चस्व जमा लें और उन पर शासन करें। इस्लाम धर्म की यह शिक्षा मुसलमानों की प्रेरणा शक्ति है ताकि वह दूसरों पर निर्भरता को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ें और अपने उपर किसी के वर्चस्व को स्वीकार न करें और ईरान की इस्लामी क्रांति भी इसी बिन्दु पर बल देती है।

ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से ही आर्थिक स्वाधीनता पर बल दिया जाता रहा है। आर्थिक समस्या ईरान के अत्याचारी शासक शाह के समय से ही थी और उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह थी कि ईरान की आर्थिक स्थिति बहुत अधिक तेल की आय पर निर्भर थी और इस आय का अधिकांश भाग अमेरिका लेता था। स्वर्गीय इमाम खुमैनी के नेतृत्व में जब इस्लामी क्रांति सफल हो गयी और शाह ईरान से भाग गया तो दुश्मनों विशेषकर अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिया और इन प्रतिबंधों से ईरान की अर्थ व्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचा परंतु यही प्रतिबंध इस समस्या के समाधान का महत्वपूर्ण कारण बना। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई कहते हैं” प्रतिबंध अवसर हो सकता है क्यों? उसकी वजह यह है कि अनुभव ने दर्शा दिया है कि जो देश तेल जैसे प्राकृतिक स्रोतों से सम्पन्न हैं और जब भी उनकी पैदावार में कमी हो जाती है तो वे अर्थ व्यवस्था को बेहतर करने की सोच में पड़ जाते हैं और वे यह सोचने लगते हैं कि किस प्रकार स्वयं को इस निर्भरता से मुक्ति दिलायें और यह हालत केवल हमारी नहीं है बल्कि उन समस्त देशों की यही हालत है जिनकी अर्थ व्यवस्था इस प्राकृतिक स्रोत तेल पर  निर्भर है।“

इराक ने ईरान पर जो आठ वर्षीय युद्ध थोप रखा था ईरानी राष्ट्र के लिए उसकी दूसरी उपलब्धियां भी रही हैं। उसकी एक उपलब्धि ईरानी राष्ट्र के अंदर आत्म विश्वास की भावना का पैदा हो जाना है। इस युद्ध से ईरानी राष्ट्र के अंदर यह भावना पैदा हो गयी है कि देश में मौजूद संभावनाओं का प्रयोग करके वह आत्म निर्भर हो सकता है। इस संबंध में ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई इस प्रकार कहते हैं” जी हां युद्ध में हमारे बहुत से प्रियजनों की जान चली गयी और बहुत अधिक आर्थिक व आध्यात्मिक नुकसान हुआ परंतु इससे ईरानी राष्ट्र के दिल में एसी चीज़ आई जिसकी क़ीमत इस राष्ट्र के लिए आज और कल की समस्त चीज़ों से अधिक है और वह स्वयं पर भरोसा, इज़्ज़त, स्वाधीनता और आत्म विश्वास की भावना का पैदा हो जाना है। ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध ने दर्शा दिया कि अगर एक राष्ट्र ईश्वर पर ईमान व भरोसा करके अच्छा काम करे तो एक के बाद दूसरे असंभव कार्य भी संभव हो जायेंगे। आत्म विश्वास के परिणाम में ईरान ने ज्ञान- विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ध्यान योग्य सफलता अर्जित की है और बहुत से क्षेत्रों में आत्म निर्भर हो गया है।

          

             

लगभग चार दशक का समय हो रहा है जब से ईरान को दुश्मनों विशेषकर अमेरिका के विभिन्न प्रतिबंधों व दबावों का सामना रहा है और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि तेहरान के खिलाफ जो हालिया प्रतिबंध हैं उनसे ईरानी जनता को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है परंतु ईरानी राष्ट्र अपनी संभावनाओं को आधार बनाकर दुश्मनों की ओर से लगाये गये प्रतिबंधों और उनके द्वारा खड़ी की गयी समस्याओं का मुकाबला कर रहा है और अब ईरान उस दिशा में आगे बढ़ रहा है कि कल अगर तेल से होने वाले आय भी बंद हो जाये तो वह अपनी ज़रूरतों की पूर्ति कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम के समस्त षडयंत्रों के बावजूद अगले 20 वर्षों में ईरान क्षेत्र की पहली आर्थिक और वैज्ञानिक शक्ति में परिवर्तित हो जायेगा।

आज ईरान विभिन्न क्षेत्रों में ध्यान योग्य सफलता प्राप्त कर चुका है मध्यम दूरी से लेकर बैलेस्टिक मिसाइलों का निर्माण कर रहा है, ईरान ने एसी तकनीक प्राप्त कर ली है जिसकी वजह से उसके मिसाइल सटीक निशाने पर लगते हैं, वह  बहुलक्ष्यीय ड्रोन्स का निर्माण कर रहा है, युद्ध पोतों और पनडुब्बियों का निर्माण कर रहा है इसी प्रकार वह छोटे- बड़े विभिन्न प्रकार के हथियारों व उपकरणों का निर्माण कर रहा है। दूसरे शब्दों में जिन चीज़ों की उसे आवश्यकता है किसी दूसरे देश की सहायता के बिना उन चीज़ों का निर्माण ईरान स्वय कर रहा है।

इराक द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध और साहसिक प्रतिरोध से ईरान ने मूल्यवान अनुभव प्राप्त किये हैं और ईरान और उसकी उपलब्धियां आज दुश्मनों की आंखों का कांटा बन गयी हैं। इस बात को जान लेना चाहिये और पूरे विश्वास के साथ कहना चाहिये कि ईरान ने विभिन्न क्षेत्रों में जो उपलब्धियां अर्जित की हैं वे ईश्वरीय कृपा और उसके वादे का परिणाम हैं।

जिन क्षेत्रों में ईरान ने ध्यान योग्य प्रगति की है उनमें से एक परमाणु तकनीक है। ईरान परमाणु तकनीक से संपन्न हो गया है और वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इस तकनीक से लाभ उठा रहा है। ईरान का परमाणु तकनीक से सम्पन्न होना इस बात का सूचक है कि ईरान तेज़ी से नई तकनीक प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

रोचक बात यह है कि उसके इस प्रयास को भी अमेरिका और जायोनी शासन और उनके घटकों की ओर से दबावों का सामना है। इसके बावजूद ईरान ध्यान  योग्य प्रगति कर रहा है और अब दुश्मन इस बात को स्वीकार करने पर बाध्य हैं कि ईरान परमाणु ईंधन चक्र से सम्पन्न 10 देशों में शामिल है।

ईरानी राष्ट्र के शत्रु इस बात से बहुत चिंतित हैं कि अगर ईरान इसी तरह आगे बढ़ता रहा तो उनके वर्चस्व और साम्राज्यवाद का अंत हो जायेगा और ईरान पूरी दुनिया के लिए आदर्श बन जायेगा इसलिए वे यथासंभव हर मार्ग से ईरान पर दबाव डाल रहे हैं ताकि उसे आगे बढ़ने से रोक सकें।

ईरान की अर्थ व्यवस्था की स्वतंत्रता का जो रत्न है वह आत्म निर्भरता की भावना है। ईरान का मानना है कि उसकी अर्थ व्यवस्था दुनिया की किसी भी व्यवस्था पर निर्भर नहीं होनी चाहिये ताकि संकटग्रस्त स्थिति में देश अपने पैरों पर खड़ा हो सके। इस दिशा में ईरानी अधिकारी गम्भीरता से प्रयास कर रहे हैं और उन्होंने एसा कार्यक्रम बनाया है जिससे देश विकास और प्रगति की दिशा में आगे बढ़ता रहे। इस प्रकार से कि आज देश में निर्मित वस्तुएं विदेशों में निर्मित वस्तुओं को टक्कर दे रही हैं। विभिन्न प्रकार की चुनौतियों, प्रतिबंधों, और दबावों के बावजूद इस समय ईरान की इस्लामी व्यवस्था अपने पैरों पर खड़ी हो गयी है। वास्तव में आज इस्लामी गणतंत्र ईरान की सरकार वरिष्ठ नेता की होशियारी, दूरगामी सोच और अच्छे मार्ग दर्शन और जनता की भागीदारी की वजह से दुनिया की एक स्वतंत्रतम सरकार है और देश के अधिकारी और ज़िम्मेदार जनमत का दिशा- निर्देशन विदेशी शक्तियों के हितों के बजाये समाज के हितों के आधार पर कर रहे हैं। राजनीतिक टीकाकारों के अनुसार इस समय विश्व की साम्राज्यवादी शक्तियां केवल इस बात से चिंतित नहीं हैं कि ईरान हाथ से निकल गया बल्कि उससे बड़ी चिंता यह है कि आज ईरान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़ोरज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों के क्रिया- कलापों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है और बहुत से क्षेत्रों में बड़ी शक्तियों के एकाधिकार और वर्चस्व को समाप्त कर दिया है। MM

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