Feb ०८, २०२० १७:०१ Asia/Kolkata

ईरान की इस्लामी क्रांति वर्ष 1979 में ऐसी स्थिति में सफल हुई जब अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर दो ध्रुवीय वातावरण का राज था।

अमरीका व कुछ यूरोपीय देशों के नेतृत्व में पश्चिमी ब्लाक और पूर्व सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी ब्लाक, उस समय की सांसारिक व्यवस्था के दो मुख्य ध्रुव थे। पश्चिमी ब्लाक की विचारधारा का आधार, पूंजीवादी व्यवस्था पर था जो यूरोप में पुनर्जागरण के बाद आने वाले परिवर्तनों का परिणाम थी। यह व्यवस्था उस समय सोवियत संघ की सोशलिस्ट व्यवस्था को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझती थी जो 1917 की क्रांति की बाद रूस में स्थापित हो गई थी। पूरी दुनिया में इन दो बड़ी शक्तियों का वर्चस्व व प्रभाव इस सीमा तक था कि कोई भी बड़ी राजनैतिक घटना, इन दो ब्लाकों की इच्छा के विपरीत, सामने नहीं आ सकती थी और यही कारण था कि कोई भी एक बड़े धार्मिक आंदोलन की कल्पना नहीं कर सकता था।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात संसार पर एक अत्याचारी व्यवस्था छाई हुई थी और संसार के अधिकांश क्षेत्र, अमरीका व सोवियत संघ जैसी दो बड़ी शक्तियों के बीच बंटे हुए थे। नैटो तथा वर्शो की सामरिक संधियां, इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था की रक्षक थीं और उन्होंने वाशिंग्टन व मास्को के प्रभुत्व से बाहर किसी भी जनांदोलन को सामने आने की अनुमति नहीं दी। पूरब तथा पश्चिम के दो ब्लाकों के बीच संसार के बंटवारे के काल में तीसरी दुनिया में ऐसे किसी भी आंदोलन या परिवर्तन की सफलता की संभावना नहीं थी जो इन दोनों ब्लाकों में से किसी एक पर निर्भर न हो। इन परिस्थियों में ईरान की इस्लामी क्रांति "न पूरब, न पश्चिम" के नारे के साथ सफल हुई तथा उसने ईरान पर पश्चिम की बड़ी शक्ति के वर्चस्व को समाप्त कर दिया तथा पूरब की बड़ी शक्ति को भी ईरान में हस्तक्षेप से रोक दिया।

पूर्वी ब्लाक के विचारकों ने तीसरी दुनिया के अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों को वर्षों तक यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया था कि साम्यवादी ब्लाक के समर्थन के बिना कोई भी राष्ट्र साम्राज्यवाद तथा उसके प्रतीक अर्थात अमरीका से संघर्ष नहीं कर सकता। इन्हीं विचारकों ने दसियों वर्षों तक धर्म को अफ़ीम बताया था। मध्यपूर्व में पश्चिम के सबसे सुरक्षित स्थान अर्थात ईरान में इस्लामी क्रांति इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के नेतृत्व में सफल हुई। यह ऐसी क्रांति थी जिसका आधार एवं विचारधारा इस्लाम  था और जिसका नारा "न पूरब, न पश्चिम" था। यह क्रांति ईरान में अमरीकी साम्राज्यवाद से टकरा गई और इसने वाशिंग्टन की पिट्ठू शक्तिशाली शाही सरकार का तख़्ता उलट दिया।

 

इस्लामी क्रांति ने बीसवीं सदी के अस्सी के दशक में पूर्वी व पश्चिमी ब्लाक से हट कर एक तीसरे ब्लाक को अस्तित्व प्रदान किया। इस्लामी क्रांति ने अपनी सफलता के बाद, दुनिया में तीसरे ब्लाक को मज़बूत बनाने क लिए अन्य राष्ट्रों को भी "न पूरब, न पश्चिम" की नीति का निमंत्रण दिया। इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने इस संबंध में कहा था। "मैं संसार के सम्मानीय व अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों और ईरान के प्रिय राष्ट्र को सिफ़ारिश करता हूं कि इस सीधे ईश्वरीय रास्ते पर, जो न तो पूरब की नास्तिक व्यवस्था से और न ही पश्चिम की अत्याचारी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है, पूरी दृढ़ता व शक्ति के साथ डटे रहें।

ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता ने इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया कि इस्लाम धर्म न केवल यह कि अफ़ीम नहीं है बल्कि अत्याचार के विरुद्ध तथा स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए लोगों को उठ खड़े होने की प्रेरणा देने वाली सबसे सशक्त विचारधारा है। यही कारण था कि विश्व स्तर पर शाह की सरकार को बचाने तथा इस्लामी क्रांति को सफल होने से रोकने के लिए किए जाने वाले समस्त कुप्रयासों के बावजूद ईरानी जनता ने इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में क्रांति को सफल बनाया और अपने देश को सदा के लिए राजाओं के वर्चस्व से स्वतंत्र करा लिया। इमाम ख़ुमैनी तथा ईरानी जनता के अतिरिक्त जो उन पर दृढ़ विश्वास रखती थी, क्षेत्र तथा पश्चिम के सभी शासक एवं समीक्षक शाह की सरकार के अंतिम दिनों तक भी इस्लामी क्रांति की सफलता तथा शाह की सरकार की समाप्ति को असंभव समझते थे।

ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद स्वाभाविक था कि पथभ्रष्ट व अत्याचारी व्यवस्थाएं विभिन्न आयामों से प्रतिक्रिया व्यक्त करें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस व्यवस्था का राज था वह अपनी भौतिक सोच के साथ इस स्थिति को सहन नहीं कर पा रही थी। वह अपने हितों की पूर्ति के लिए अन्य देशों पर अपने विचारों को थोपने के लिए हर प्रकार के हथकंडे इस्तेमाल करने को सही समझती थी, चाहे वह युद्ध हो, हमला हो, हत्या हो, यातनाएं हों, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से बाहर निकलना हो, अन्य देशों से व्यापारिक युद्ध हो, सीमा पार प्रतिबंध लगाना हो या फिर मानवाधिकार का हनन हो।

इस व्यवस्था ने ईरान की इस्लामी क्रांति के ख़िलाफ़ ये सारे ही हथकंडे इस्तेमाल किए लेकिन चालीस साल से जारी ये हथकंडे अभी तक विफल रहे हैं। वर्ष 1991 में पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद, पूर्वी ब्लाक भी बिखर गया। सोवियत संघ के बिखरने के बाद संसार में अब मुख्य मुक़ाबला इस्लाम और साम्राज्य के बीच रह गया है। इस समय चालीस साल से अधिक का समय गुज़र जाने के बाद इस्लामी क्रांति नए काल में एक अहम व नई व्यवस्था के रूप में यथावत अपने नारों पर कटिबद्धता के साथ आगे बढ़ रही है। यह क्रांति पूरी आशा के साथ अपनी कमियों को दूर करते हुए अपना दूसरा क़दम उठा रही है और अगले चरण में प्रवेश कर रही है।

ईरान 41 वर्षों से संसार की वर्चस्ववादी शक्तियों के समक्ष पूरे साहस के साथ डटा हुआ है और उसने अपने प्रतिरोध से यह दर्शा दिया है कि इस्लामी मूल्यों व आकांक्षाओं पर प्रतिबद्ध रहकर विश्व साम्राज्य के समक्ष चुनौती खड़ी की जा सकती है। ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रभाव को पिछले वर्षों में उत्तरी अफ्रीक़ा से लेकर क्षेत्र में आने वाली जनक्रांतियों में देखा जा सकता है और साम्राज्यवादी तथा उन पर निर्भर शक्तियां ईरान की इस्लामी क्रान्ति के प्रभाव से भयभीत हो गयीं और उनकी प्रतिक्रिया को ईरान की इस्लामी क्रांति एवं इस्लामी व्यवस्था से शत्रुता के रूप में देखा जा सकता है।

आज पूरी दुनिया में इस सच्चाई को बहुत स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है कि इस्लामी क्रांति आने के बाद आजका इंसान इस्लाम से कुछ नई बातें सीख रहा है और इस्लाम मानवीय समाजों में बड़ी तेज़ी से फैलता जा रहा है, चाहे वे समाज हों जो शैतानी शक्तियों व साम्राज्यवादी व्यवस्थाओं के अत्याचार से तंग आ चुके हैं और नई सोच व नई राह की तलाश में हैं, जैसे अफ़्रीक़ी व एशियाई देशों के समाज और चाहे यूरोपीय समाज हों। यह ऐसी स्थिति में है कि यूरोप में मुसलमानों को अनेक सीमितताओं और रेड लाइनों का सामना है और पश्चिम में इस्लामोफ़ोबिया की अनेक योजनाओं पर काम किया जा रहा है लेकिन सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि यूरोप में मुसलमानों की संख्या और इस्लाम की ओर रुझान में निरंतर वृद्धि हो रही है और पिछले एक दो दशक में यह दुगनी हो चुकी है। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि अगले दशक के अंत तक यूरोप में इस्लाम बहुत फैल जाएगा और संभव है कि इसे इस्लामी चेहरे के रूप में देखा जाने लगे।

अमरीका व यूरोप के कई अहम लोगों के इस्लाम स्वीकार करने से जहां पश्चिमी समाजों में उच्च स्तर पर इस ईश्वरीय धर्म के प्रभाव का पता चलता है, वहीं विभिन्न अनुसंधान केंद्रों ने भी कहा है कि यह बात पूरी तरह से सही है कि चरमपंथी विरोधी गुटों की सभी नकारात्मक कार्यवाहियों के बावजूद इस्लाम, यूरोप व अमरीका में फैलता जा रहा है। सीएनएन ने अप्रैल 2015 को अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि इस समय संसार में सबसे तेज़ी से फैलने वाला धर्म इस्लाम है। इसी तरह इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि संसार के बड़े धर्मों व मतों के बीच इस्लाम के प्रसार की रफ़्तार सबसे तेज़ है।

सीबीएन की वेबसाइट ने भी “क्यों बहुत से पश्चिमी लोग इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं?” शीर्षक के अंतर्गत अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि अमरीका में अफ़्रीक़ी मूल के लोग बड़ी संख्या में मुसलमान हो रहे हैं लेकिन इसी के साथ इस्लाम स्वीकार करने वाले श्वेतों की संख्या भी कम नहीं है जिनमें से अधिकतर काफ़ी पढ़े लिखे हैं। इटली की समाचार एजेंसी ने भी बताया है कि इस्लाम दुनिया में हर जगह, सीमाओं को पार कर चुका है और वर्तमान संकटग्रस्त संसार में जीवन को दोबारा आरंभ करने के लिए एक व्यवस्था में बदल चुका है। बीबीसी टीवी के लिए कुछ समय पहले “इमाम ख़ुमैनी के बच्चे” नाक कार्यक्रम तैयार करने वाले राजर हार्डी कहते हैं कि आज इस्लाम, पश्चिम के लिए सबसे बड़ समस्या है बल्कि एक वैश्विक समस्या है। आज इस्लाम न केवल पश्चिमी एशिया में बल्कि हर जगह फैल चुका है और उससे मुक़ाबला करना बहुत मुश्किल है।

इस समय ईरान की इस्लामी क्रांति अपनी सफलता के पांचवें दशक में प्रविष्ट हो गई है और वह अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील चरण से गुज़र रही है। यह क्रांति अपने इस्लामी रुझान के साथ व्यापक आर्थिक व सामाजिक विकास व प्रगति की राह पर बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रही है। इस क्रांति ने जीवन की एक नई शैली दुनिया के सामने पेश की है जिसमें मनुष्य अपनी सही पहचान हासिल करके स्वाभिमान, ज्ञान, स्वाधीनता व गौरव का इच्छुक है। यह क्रांति एक ऐसे धर्म का परिचय कराती है जिसके पास मनुष्य के लोक-परलोक के जीवन में सौभाग्य, परिपूर्णता व कल्याण के लिए स्पष्ट क़ानून हैं। जैसा कि क़ुरआने मजीद के सूरए नह्ल की आयत नंबर नवासी में कहा गया है। और (हे पैग़म्बर!) हमने आप पर (ऐसी) किताब उतारी है जो हर वस्तु को स्पष्ट करके बयान करने वाली और मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन, दया व शुभसूचना है। इस प्रकार अगर आजके संसार के भविष्य का रेखांकन किया जाए तो सच्चे इस्लाम ने ध्रुव व शक्ति के केंद्र के रूप में संसार का रास्ता बदल दिया है और एक नई सभ्यता अस्तित्व में आ रही है और वर्चस्ववादियों की नींद उड़ चुकी है।

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