Feb ०८, २०२० १७:०८ Asia/Kolkata

इस्लामी क्रांति, निश्चित रूप से नयी सदी में एक नयी चीज़ थी जिसका उदय, नये नारों और नये संदेश के साथ हुआ।

ईरान की  क्रांति , इस्लाम की राजनीतिक शिक्षाओं के आधार पर आगे बढ़ी और इमाम खुमैनी के नेतृत्व में और ईरान की जनता की इच्छा के अनुसार इस क्रांति ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया कि वह इस्लामवादी है, आदर्शवादी है और ईरान के लिए स्वाधीनता और स्वतंत्रता चाहती है और किसी भी  बड़ी शक्ति से संबंधित और किसी पर भी निर्भर नहीं है। ईरान की इस्लामी क्रांति ने यह संदेश दिया कि वह किसी भी दशा में अन्याय व अत्याचार को स्वीकार नहीं करती और साम्राज्यवादियों को कदापि इस बात की अनुमति नहीं देगी कि वह देश कें संसाधनों को लूटें। 

 

 ईरान की इस्लामी क्रांति को शताब्दी का सब से बड़ा चमत्कार कहा  जाता है  क्यांकि क्षेत्र में ईरान की शाही सरकार की जो स्थिति थी और उसे जिस प्रकार से महाशक्तियां का समर्थन प्राप्त था उस के साथ कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि कोई धर्म गुरू बिना किसी महाशक्ति से जुड़े केवल जनता की शक्ति के सहारे ढाई हज़ार वर्ष पुराने शाही शासन को इस प्रकार से उखाड़ फेंकेगा और  उसका भरपूर समर्थन करने वाली अमरीका जैसी महाशक्तियां भी मुॅंह तकती रह जाएगीं ।   इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद भी अमरीकी सरकार ने ईरान की इस्लामी क्रांति की विरुद्ध जो साज़िशें रची उस का एक कारण यह भी था कि अमरीका को ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद भी विश्वास नहीं हो पा रहा था कि कोई धर्म गुरु धार्मिक आधारों पर और धर्म की सरकार चलाने के नारे के साथ , ऐसी किसी क्रांति को सफल कर सकता है उसे अंतिम क्षणों तक क्रांति की विफलता की प्रतीक्षा थी अमरीका ने अपनी इस प्रतीक्षा को समाप्त करने के लिए भरसक प्रयास किये जो अब तक जारी हैं किंतु उस की प्रतीक्षा लंबी होती चली गयी और अब तो 41 वर्षों की लंबी अवधि बीत चुकी है और यह सब कुछ इमाम खुमैनी की सूझबूझ और दूरदर्शिता के कारण था।

 

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद जिस प्रकार से क्रांति की सरकार आगे बढ़ी उसने अमरीका और उस जैसे कई देशों को अपना दुश्मन बना लिया ज़ाहिर सी बात है स्वतंत्रता व स्वाधीनता के नारों के साथ और महाशक्तियों के नकार पर सफल होने वाली क्रांति क्यों इन शक्तियों को भाती? यही वजह थी कि ईरान में क्रांति की सफलता के बाद से ईरान में तरह तरह से हंगमें की कोशिश की गयी, जातीय व सांप्रदायिक दंगे करवाने की कोशिश हुई पृथकतावादी आंदोलन चलाए गये, आतंक फैलाया गया, हत्या की गयी लेकिन इमाम खुमैनी की अभूतपूर्व सूझ बूझ ने इस सभी षडयंत्रों को विफल कर दिया तब सामाज्यवादियों ने ईरान की इस्लामी क्रांति के खिलाफ महाषडयंत्र रचा, यह सोच कर कि इस दलदल से क्रांति की सरकार निकल नहीं पाएगी। इस तरह से ईरान पर आठ वर्षीय युद्ध थोप दिया गया । इन बड़ी शक्तियों ने यह काम अपने पिट्ठू सद्दाम हुसैन से करवाया था जो इराक़ में अपनी तानाशाही सरकार चला रहे थे। इस तरह से सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में विश्व के 34 से अधिक देशों ने एक व्यापक और भयानक युद्ध आरंभ कर दिया ।

 

सवाल यह है कि ईरान की इस्लामी क्रांति से इतनी दुश्मनी की वजह क्या थी ?  जर्मनी से प्रकाशित पत्रिका  इश्पिगल ने इमाम खुमैनी के बारे में लिखा : ईरान की घटनाओं से हम बहुत अच्छी तरह से यह समझ सकते हैं कि इमाम खुमैनी , मध्य पूर्व के समीकरण में ईरान के महत्व को , राष्ट्रपति कार्टर से अधिक बेहतर रूप में समझते हैं अमरीका ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि ईरान , उस की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए कमज़ोरी बन सकता है किंतु इमाम खुमैनी ने इस वास्तविकता को भली भांति समझ लिया है। तेहरान में उन की सफलता केवल उस क्रांति की आंरभिक लहरें हैं जिस के बारे में उन्हें आशा है कि यह लहर पूरे मध्य पूर्व को अपनी लपेट में ले लेगी। कार्टर और उन के सलाहकारों ने इमाम खुमैनी को केवल राष्ट्रीय आयाम पर ध्यान दिया किंतु इस के बाद अब निश्चित रूप से मिस्र व इस्राईल से लेकर  सऊदी अरब व इराक़  तक तथा फार्स की खाड़ी की राजशाही शासनों  को ईरान की क्रांति के परिणामों का सामना करना पड़ेगा। ईरान के खिलाफ 34 देशों का युद्ध, ईरान की क्रांति से से उनके भय का परिणाम था। 

 

युद्ध आरंभ हुआ तो ईरानी राष्ट्र की एकजुटता और अधिक हो गयी, जोश व उत्साह से भरे ईरानी युवाओं ने, प्रतिबंधों के कड़े घेरे में रहते हुए भी उस साहस का प्रदर्शन किया जिसकी दुश्मनों को आशा नहीं थी । धर्म पर आस्था और देश प्रेम से भरे दिलों के साथ ईरानी युवाओं ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये और  उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अमरीका और उसके घटकों के समीकरण गलत थे । आठ वर्षीय युद्ध, ईरानी युवाओं ने लगभग खाली हाथ लड़ी मगर अपनी भूमि का एक इंच भी दुश्मन के पास नहीं रहने दिया। 

 

युद्ध की रणनीति नाकाम हो गयी और ईरान अधिक ताकतवर हो गया। अब ईरान की इस्लामी क्रांति के दुश्मनों ने ईरान के आस पास के देशों में अशांति फैलाना आरंभ कर दी ताकि अशांति से घिरे ईरान में, सरलता के साथ अशांति पैदा की जाए मगर इस चरण में भी ईरान ने अमरीका के सारे अनुमान गलत सिद्ध कर दिये और ईरान को अशांति के महासागर में शांति का द्वीप कहा जाने लगा। ईरान ने इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर अपने पड़ोसियों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। क्षेत्रीय सहयोग पर आधारित ईरान की विदेश नीति प्रभावी सिद्ध हुई और जैसे जैसे क्षेत्र में ईरान की भूमिका बढ़ती गयी अमरीका की  परेशानी  भी बढ़ने लगी । इराक़ में सद्दाम के पतन और शिया सरकार के सत्ता में आने के बाद ईरान की क्षेत्रीय नीति में एक नया मोड़ आया और ईरान की विदेश नीति में सुरक्षा व राजनीतिक दृष्टि से बदलाव नज़र आने लगा। 

 

 

अमरीका ने इलाक़े में भारी पराजय और भारी आर्थिक नुक़सान उठाने के बाद ईरान के आस पास भयानक आतंकवादी संगठन, दाइश को अस्तित्व दिया ताकि इस्लामोफोबिया द्वारा इस्लाम के फैलाव व प्रसार को रोका जा सके और इसी तरह, अमरीका व इस्राईल के विरोधी प्रतिरोध मोर्चे में शामिल देशों को तबाह कर दिया जाए। सन 2014 में इस भयानक साज़िश पर काम शुरु हुआ और आतंकवादी संगठन दाइश ने पहले सीरिया और फिर इराक़ में सिर उभारा और  बड़ी तेज़ी के साथ यह गुट ताक़तवर होता चला गया। ईरान ने इन देशों की मांग पर, और सीरिया व इराक़ की सरकारों की अनुमति से दाइश के खिलाफ मोर्चा संभाला और रूस जैसे देशों की मदद से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध आरंभ किया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने आरंभ से ही दाइश को अमरीका की पैदावार बताया और इस क्षेत्र से दाइश के पतन में उन्होंने महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाई। ईरान ने दाइश के ,खिलाफ लड़ने वालों को ज़रूरी साधनों से लैस किया, सैंकड़ों सैन्य सलाहकार भेजे और स्वंय सेवी बल का गठन किया जिनके अधिकांश सदस्यों को इराक़ और लेबनान में ट्रेनिंग दी गयी थी। 

 

 

 

इराक़ और सीरिया के कमांडरों के अनुसार ईरान ने दाइश के खिलाफ युद्ध में बेहद प्रभावशाली भूमिका निभाई है। कुद्स ब्रिगेड के प्रमुख शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी  ने आतंकवादी संगठन दाइश  से बगदाद की सुरक्षा के अभियान की कमान संभाली थी, सीरिया में भी वह उपस्थित थे और उन्होंने अपनी योजनाओं और रणनीतियों से दाइश को दमिश्क से खदेड़ दिया  और इसी  तरह उन्होंने सीरिया के अन्य क्षेत्रों की स्वतंत्रता में मदद की। इस प्रकार से इराक़ी, सीरियाई, कुर्द, लेबनानी, ईरानी और अफगान बलों के सहयोग से और लंबे व कठिन अभियान में सभी क्षेत्रों को स्वंतत्र करा लिया गया और दाइश का अंत हो गया। दाइश के अंत के बाद इस्राईल के तत्कालीन युद्ध मंत्री लेबरमैन ने कहा था कि बश्शार असद की सरकार ईरान की मदद के बिना जारी रही रह सकती थी यहां तक कि रूस भी ईरान की मदद के बिना दाइश को पराजित नहीं कर सकता था। 

 

क्षेत्र में सुरक्षा स्थापना ईरान के लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहा है और ईरान ने आज तक कभी क्षेत्र में कोई भी युद्ध आरंभ नहीं किया। इस्लामी क्रांति की नीति अच्छे संबंधों पर आधारित है लेकिन आक्रमण और हमले की दशा में ईरान चुप भी नहीं रह सकता और कड़ा व ठोस उत्तर देता है। अब और  अमरीका के हाथों जनरल शहीद कासिम सुलैमानी की  शहादत के बाद इस देश की सरकार का काला रूप सब पर स्पष्ट हो गया। अब क्षेत्रीय देश और विशेष कर इराक़ इस परिणाम पर पहुंच गये हैं कि जब तक अमरीका इस इलाक़े में रहेगा, यह इलाक़ा असुरक्षित व अशांत रहेगा। इराक़ी अपने देश से अमरीकियों को निकाले जाने के इच्छुक हैं और इस अभियान में ईरान में क्षेत्रीय देशों की मदद और उनके साथ सहयोग कर रहा है। Q.A.

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