Mar २०, २०२० ०६:०८ Asia/Kolkata

25 रजब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की शहादत का दिन है।

उनकी शहादत के दिन के उपलक्ष्य में इस विशेष कार्यक्रम के माध्यम से हम उनके जीवन के कुछ पहलुओं से आपको परिचित कराने की कोशिश करेंगे। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों व उनके पवित्र परिवार से प्यार करने वाले सभी लोगों की सेवा में एक बार फिर संवेदना पेश करते हैं।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म संसार के सबसे पवित्र घराने में हुआ था। उनके पिता इमाम जाफ़िर सादिक़ अलैहिस्सलाम थे जबकि उनकी माता का नाम हमीदा ख़ातून था। हज़रत हमीदा ख़ातून का आध्यात्मिक स्थान इतना उच्च था कि इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उन्हें “मुसफ़्फ़ा” अर्थात हर प्रकार की बुराई व अवगुण से पवित्र महिला की उपाधि दी थी। ज्ञान व धार्मिक शिक्षाओं व आदेशों में वे इतनी निपुण थीं कि जब भी इस्लामी समाज की महिलाओं के समक्ष कोई प्रश्न आता या कोई मुश्किल खड़ी होती तो इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम हज़रत हमीदा ख़ातून से कहते थे कि वे मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा दें और उनका मार्गदर्शन करें।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने ऐसे समय में जीवन बिताया जब इस्लामी समाज में ईश्वरीय मान्यताएं धूमिल पड़ती जा रही थीं और शासक, जिन्हें लोगों व समाज की सेवा में रहना चाहिए था, भ्रष्टाचार, धन दौलत एकत्रित करने और लोगों का माल लूटने में व्यस्त थे। दरबारी धर्मगुरू भी अत्याचारी शासकों का गुणगान करते थे और बनी अब्बास की चापलूसी में लोगों के समक्ष असत्य को सत्य दिखाने की कोशिश करते थे। इन हालात में इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम उनके सामने डट गए और उन्होंने अत्याचारी शासकों की पोल खोलने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं दिया। इस प्रकार उन्होंने लोगों को बनी अब्बास के शासकों की अयोग्यता से अवगत कराया। इमाम मूसा काज़िम इसी तरह लोगों को सोच-विचार व चिंतन का निमंत्रण देते थे और कहते थे कि हर चीज़ का मार्गदर्शक होता है और बुद्ध का मार्गदर्शक सोच-विचार है और सोच-विचार की निशानी, मौन है। यही कारण है कि बुद्धिमान व्यक्ति, मौन के माध्यम से अपने विचार का पोषण करता है और विचार के माध्यम से बुद्धि को मज़बूत बनाता है।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का एक मूल प्रयास बड़ी संख्या में मुफ़स्सिरों यानी क़ुरआने मजीद की व्याख्या करने वालों, मुहद्दिसों यानी हदीस बयान करने वालों और विभिन्न विषयों में प्रचारकों का प्रशिक्षण करना था। यद्यपि उनका काल, ज्ञान व संस्कृति संबंधी व्यापक गतिविधियों के लिए उनके पिता इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के काल की तरह अनुकूल नहीं था लेकिन उन्होंने इस्लामी संस्कृति के प्रसार और अहम शिष्यों के प्रशिक्षण के लिए बड़े बड़े क़दम उठाए। फ़िक़्ह याधर्मज्ञान, हदीस, शास्त्रार्थ और इसी प्रकार के अन्य विषयों में उनके मत से ज्ञान हासिल करने वालों की दूसरों से तुलना नहीं की जा सकती थी। इमाम काज़िम के शिष्य अनेक ज्ञानों में दक्षता के साथ विभिन्न वैचारिक मतों व जातियों के लोगों से बात करने और उनके प्रश्नों का उत्तर देने व भ्रांतियों को दूर करने की क्षमता रखते थे। कोई भी वैचारिक गुरू उनसे शास्त्रार्थ में जीत नहीं पाता था और पराजित होकर अपनी अक्षमता को स्वीकार कर लेता था।

जनता के बीच इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के इन शिष्यों की लोकप्रियता व प्रभाव, उनके विरोधियों विशेष कर तत्कालीन शासन में भय व आतंक उत्पन्न होने का कारण बन गया। वे शासक इमाम के शिष्यों के आंदोलन और जनता की ओर से उनका साथ दिए जाने के विचार से बुरी तरह चिंतित थे। इस प्रकार से कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के एक शिष्य हेशाम बिन हकम के बारे में अब्बासी शासक हारून रशीद का कहना था कि उनका ख़तरा, हाथों में तलवार लिए हुए एक लाख सिपाहियों से ज़्यादा है।

ग़ुस्से को पी जाना, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों की सबसे अहम विशेषताओं में से थी लेकिन इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम में क्रोध को पी जाने की विशेषता का एक अलग ही जलवा था इस लिए उनकी सबसे अहम उपाधिक काज़िम थी। अरबी भाषा में क्रोध को पी जाने वाले व्यक्ति को काज़िम कहा जाता है। वे जीवन में मुसीबतों व कठिनाइयों पर भरपूर धैर्य व संयम से काम लेते थे। इसी तहर अज्ञान व दुश्मनों के उकसावे के कारण इमाम का अनादर करने वालों के मुक़ाबले में वे बहुत अधिक संयम का प्रदर्शन करते थे और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अपने ग़ुस्से को पी जाते थे। यही कारण था कि वे काज़िम के नाम से मशहूर हो गए थे।

अलबत्ता यह विशेषता इस बात का कारण नहीं बनती थी कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम अत्याचारी शासकों सामने भी नर्मी का व्यवहार करें बल्कि वे शासकों के मुक़ाबले में पूरी ताक़त से डट जाते थे। वे अत्याचारी शासकों के मुक़ाबले में इतने गंभीर व दृढ़ थे कि जब उन्होंने अपने एक शिष्य ज़्याद बिन सलमा को, अत्याचारी शासन व्यवस्था से सहयोग करने से मना कर दिया तो उसने कहा कि मेरे बाल बच्चे हैं और मैं इज़्ज़तदार इंसान हूं। मैं अपनी ज़रूरत की वजह से इस शासन के लिए काम कर रहा हूं ताकि अपने जीवन का ख़र्चा चला सकूं। इमाम ने उसके जवाब में कहा कि अगर मैं एक ऊंची इमारत की छत से नीचे गिर जाऊं और टुकड़े टुकड़े हो जाऊं तो यह मेरे इससे बेहतर है कि मैं इस शासन के किसी काम की ज़िम्मेदारी लूं या उसके किसी क़ालीन पर पैर रखूं।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम, ईश्वर की उपासना और उससे सामिप्य का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते थे। अत्यधिक उपासना के चलते उन्हें उपासकों का गर्व और बहुत अधिक त्याग के कारण अब्दुस्सालेह अर्थात नेक बंदे की उपाधि दी गई थी। उनके जीवन की सबसे सुंदर घड़ियां, वह थीं जब वे एकांत में अपने रचयिता व पालनहार की उपासना करते थे। जब वे उपासना करते थे तो अपने पूरे अस्तित्व के साथ अनन्य ईश्वर के ध्यान में लीन रहते थे और अनायास ही उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगती थी।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम बड़ी ही सुंदर और मर्म स्पर्शी आवाज़ में क़ुरआने मजीद की तिलावत किया करते थे। उनकी तिलावत ऐसी होती थी कि मानो उनकी आवाज़ उनके पूरे अस्तित्व से बाहर आ रही है और यही कारण था कि लोग उनकी तिलावत से बहुत अधिक प्रभावित हो जाते थे। अनेक बार ऐसा होता था कि जब वे क़ुरआने मजीद की तिलावत कर रहे होते थे तो उनकी आवाज़ सुनने वाले बहुत से लोग, उनके घर के पास या मस्जिद में चलते चलते रुक जाते थे और उनकी तिलावत सुनने लगते थे।

भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना इस्लाम के दो महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं। क़ुरआने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों ने इसकी बहुत अधिक सिफ़ारिश की है। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने भी इन पर बहुत बल दिया है। बिश्र बिन हारिस हाफ़ी की घटना इसका एक उदाहरण है। बिश्र बिन हारिस अपना जीवन ईश्वर की अवज्ञा और पापों में बिताया करते थे। एक दिन इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम उस गली से गुज़रे जिसमें बिश्र बिन हारिस का घर था। बिश्र के घर से नाच-गाने की आवाज़ आ रही थी। जिस समय इमाम बिश्र के दरवाज़े के सामने पहुंचे, संयोगवश उनके घर का द्वार खुला और उनकी एक दासी घर से बाहर निकली। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम ने उस दासी से पूछाः तुम्हारा मालिक आज़ाद है या ग़ुलाम? दासी ने उत्तर दिया आज़ाद है। इमाम ने अपना सिर हिलाया और कहा तुमने ठीक कहा, क्योंकि अगर वह दास होता तो दासों की तरह रहता और अपने स्वामी अर्थात ईश्वर के आदेशों का पालन करता। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने यह बातें कहीं और वहां से चले गए। दासी जब घर में आई तो बिश्र ने उससे विलम्ब का कारण पूछा। उसने इमाम के साथ हुई बातचीत दोहरा दी। बिश्र जिस स्थिति में थे वैसे ही नंगे पांव इमाम के पीछे दौड़े और उनसे कहाः श्रीमान! जो कुछ आपने उस महिला से कहा था, वह एक बार फिर से बयान कर दीजिए। इमाम ने अपनी बात दोहराई। ब्रिश्र का हृदय परिवर्तित हो गया और उन्हें अपने अब तक के जीवन पर पछतावा हुआ। उन्होंने इमाम मूसा काज़िम का हाथ चूमा और अपने गाल को ज़मीन पर रख दिया और रो रो कर कहने लगेः हां मैं बंदा हूं, हां मैं बंदा हूं। इसके बाद उन्होंने अपनी दासता के प्रमाण स्वरूप जीवन में कभी भी जूता या चप्पल नहीं पहनी जिसके कारण उन्हें हाफ़ी की उपाधि से जाना जाने लगा। हाफ़ी का अर्थ होता है नंगे पांव चलने वाला।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन के लगभग 35 साल इमामत अर्थात लोगों के मार्गदर्शन के ईश्वरीय दायित्व को निभाने में गुज़ारे। इस दौरान उन्हें अधिकतर जेल और निर्वासन में रहना पड़ा। हारून रशीद ने दो बार उन्हें जेल में डाला, जिसमें से दूसरी बार वे चार साल तक जेल में रहे। जेल का वातावरण प्रायः क़ैदी को निराशा व अवसाद में ग्रस्त कर देता है और वह जल्द ही निढाल हो जाता है लेकिन इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम विभिन्न प्रकार की यातनाएं और कठिनाइयां सहन करने के बावजूद कारवास को अपनी उपासना व बंदगी के माध्यम से प्रफुल्लित जगह बना देते थे जिसके कारण हारून इस भय से निरंतर उनके कारावास का स्थान बदलता रहता था कि कहां जेल के अधिकारी उनके प्रभाव में न आ जाएं। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम को जिस अंतिम जेल में रखा गया उसका जेलर सिंदी बिन शाहिक नामक एक अत्यंत क्रूर व निर्दयी व्यक्ति था। इमाम ने उस कारावास में बहुत अधिक यातनाएं व दुख सहन किए लेकिन एक मज़बूत पहाड़ की तरह डटे रहे। हारून, इमाम के बेजोड़ प्रतिरोध के सामने हार मान गया और उसने उन्हें अपने रास्ते से हटाने का फ़ैसला कर लिया। अंततः वर्ष 183 हिजरी क़मरी में हारून के आदेश पर इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम को जेल में विष देकर शहीद कर दिया गया।

दोस्तो! कार्यक्रम के अंत में इमाम इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की शहादत पर एक बार फिर हार्दिक संवेदना प्रकट करते हुए उनके दो स्वर्ण कथन पेश कर रहे हैं, वे कहते हैं। धर्म की समझ पैदा करो क्योंकि धर्म की पहचान, आत्मज्ञान व ईश्वरीय उपासना की कुंजी है। एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं। इंसान को चार बातों का ज्ञान होना चाहिए। एक अपने ईश्वर को पहचाने। दूसरे इस बात को जाने कि ईश्वर ने उसके साथ क्या किया है? तीसरे इस बात को जाने कि ईश्वर उससे क्या चाहता है? और चौथे इस बात को जाने कि क्या चीज़ें उसे धर्म से निकाल देती हैं? दोस्तो! इसी के साथ यह विशेष कार्यक्रम यहीं पर समाप्त हुआ, हमें अनुमति दीजिए। (HN)

 

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