Mar २१, २०२० ०३:०८ Asia/Kolkata

ईदे नौरोज़ का, जिसे ईरान में आम तौर पर संक्षेप में ईद कहा जाता है, बड़ा प्राचीन इतिहास है।

प्राचीन ईरान में साल के पहले मौसम अर्थात वसंत के पहले दिन को पर्व के रूप में मनाया जाता था। ईदे नौरोज़, ईरान का एक अत्यंत प्राचीन पर्व है जो भलाई, पवित्रता, सच्चाई और प्रेम का सूचक है। यह पर्व तीन हज़ार वर्ष से अधिक समय से मनाया जा रहा है और ईरान की संस्कृति व सभ्यता का प्रतिबिंब है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह इस देश के लोगों की संयुक्त मान्यताओं को दर्शाता है। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो नौरोज़ चीन से लेकर भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्रों तक में मनाया जाता रहा है और समय बीतने के साथ साथ इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विचार और संस्कार भी शामिल हो गए हैं। यद्यपि आज नौरोज़ के संस्कार इस व्यापक भौगोलिक क्षेत्र के हर स्थान पर अलग-अलग रूप धारण कर चुके हैं लेकिन उनका मूल ईरानी स्वरूप अब भी बाक़ी है।

प्राचीन ईरानियों का मानना था कि नौरोज़ या नए साल का पहला दिन, संसार, ब्रह्मांड और मनुष्य की सृष्टि का दिन है। प्रख्यात ईरानी विद्वान अबू रैहान अलबीरूनी ने, नौरोज़ को सृष्टि के पुनर्जन्म की उपाधि दी थी। ईरान की अधिकतर पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि चौथे पीशदादी राजा जमशीद ने नौरोज़ व उसके संस्कारों की आधारशिला रखी थी। पहलवी व मानुवी लेखों में नौरोज़ के बारे में बहुत कुछ कहा गया है और बताया गया है कि उस काल के लोग, नौरोज़ से अच्छी तरह परिचित थे और एक प्राचीन पर्व के रूप में उसे मनाया करते थे।

नौरोज़, आर्यों के दो मुख्य वार्षिक उत्सवों में से एक था। प्राचीन कालों में आर्यों के दो मौसम होते थे, सर्दी और गर्मी। गर्मी का मौसम वसंत और ग्रीष्मकाल पर आधारित होता था जबकि सर्दी के मौसम में पतझड़ और शीतकाल शामिल होते थे। अविस्ताई में सर्दी के मौसम को ज़ीमा और गर्मी के मौसम को हमा कहा जाता था। अत्यंत प्राचीन काल में सर्दी के मौसम के दस महीने होते थे जबकि गर्मी का मौसम सिर्फ़ दो महीनों तक रहता था लेकिन बाद में इसमें परिवर्तन आया और गर्मी का मौसम सात महीने और सर्दी का मौसम पांच महीने का हो गया। इन दोनों मौसमों में एक एक उत्सव मनाया जाता था जो नए साल का आरंभ समझा जाता था। पहला जश्न गर्मी का मौसम शुरू होने के समय यानी जब मवेशियों को तबेलों व बाड़ों से हरे भरे मैदानों में ले जाने के समय मनाया जाता था जबकि दूसरा उत्सव सर्दी का मौसम शुरू होने के समय तब मनाया जाता था जब मवेशियों को दोबारा तबेलों में पहुंचाया जाता था और शीत काल के लिए खाद्य सामग्री इकट्ठा कर ली जाती थी।

 

हख़ामनेशी शासन के दूसरे शासक, राजा कूरूश या साइरस ने सन 538 ईसा पूर्व में नौरोज़ को राष्ट्रीय पर्व घोषित किया। इस दिन वह सैनिकों को पदोन्नति प्रदान करने, सार्वजनिक स्थानों व घरों की सफ़ाई और क़ैदियों को क्षमादान देने के कार्यक्रम आयोजित करता था। ये कार्यक्रम अन्य हख़ामनेशी शासकों के काल में आयोजित होते थे। दारयूश प्रथम के काल में नौरोज़ का समारोह, तख़्ते जमशेद के स्थान पर आयोजित होता था। अलबत्ता हख़ामनेशी काल के जो शिलालेख मिले हैं उनमें नौरोज़ के आयोजन की ओर सीधे रूप से कोई इशारा नहीं किया गया है लेकिन इन शिलालेखों की समीक्षाओं से पता चलता है कि हख़ामनेशी काल में लोग, नौरोज़ के समारोह से परिचित थे और हख़ामनेशी बड़े वैभव के साथ यह जश्न मनाया करते थे। साक्ष्यों से पता चलता है कि दारयूश प्रथम ने सन 416 ईसा पूर्व में नौरोज़ के उपलक्ष्य में सोने का सिक्का ढलवाया था जिसके एक ओर तीर चलाते हुए एक सिपाही को दिखाया गया है। हख़ामनेशी काल में नौरोज़ का जश्न 21 इस्फ़ंद से 19 उर्दीबहिश्त यानी 11 मार्च से 9 मई तक मनाया जाता था।

अशकानियों व सासानियों के शासनकाल में भी नौरोज़ मनाया जाता था। उनके काल में पूरे साल विभिन्न उत्सव व जश्न मनाए जाते थे जिनमें से सबसे अहम नौरोज़ व मेहरगान थे। सासानी काल में नौरोज़ का जश्न कम से कम छः दिन मनाया जाता था और इसे छोटे और बड़े नौरोज़ के दो भागों में बांट दिया जाता था। छोटा नौरोज़ पांच दिन का होता था और पहली फ़रवरदीन से लेकर पांचवीं फ़रवरदीन यानी 21 मार्च से 25 मार्च तक मनाया जाता था। फ़रवरदीन महीने के छठे दिन ख़ुर्दाद रूज़ के नाम से बड़ा नौरोज़ मनाया जाता था। छोटे नौरोज़ के पांच दिनों में से हर दिन समाज के एक वर्ग के लोग जैसे किसान, धर्मगुरू, सिपाही, उद्यमी व व्यापारी और दरबारी, राजा से मिलने के लिए आते थे और राजा उनकी बातें सुनता और उनकी समस्याओं के समाधान के आदेश जारी करता था। छठे दिन, जब राजा लोगों के विभिन्न वर्गों से मिल चुका होता था तो केवल उसके निकटवर्ती लोग उससे मिलने के लिए आते थे।

ईरान में इस्लाम के आगमन और प्रसार के बाद, मुसलमान ईरानी भी अपने पूर्वजों की तरह नौरोज़ का जश्न मनाया करते थे और उन्हीं की तरह नौरोज़ को महत्व देते थे। अब्बासी शासनकाल और उसके बाद की ईरानी सरकारों के काल में स्थानीय ईरानी सरकारें विशेष कर ख़ुरासान में सासानियों की सरकार और दक्षिण में आले बूये की सरकार ने नौरोज़ को जीवित रखने और मुस्लिम समाज में नौरोज़ के संस्कारों को बाक़ी रखने में अहम भूमिका निभाया।

 

वर्ष 467 हिजरी क़मरी में जलालुद्दीन मलिक शाह सलजूक़ी ने हकीम उमर ख़य्याम समेत अपने समय के अहम ज्योतिषियों व गणितज्ञों को ईरान के कैलेंडर को सुधारने की ज़िम्मेदारी सौंपी। इस गुट ने नौरोज़ को वसंत ऋतु के आरंभ में क़रार दिया और इस प्रकार हमेशा के लिए उसकी स्थिति निर्धारित कर दी। उसके बाद से जलाली या मलिकी कैलेंडर, जो संसार में वास्तविक सौर वर्ष के सबसे निकट है, ईरान में प्रचलित हो गया और नौरोज़, बसंत के आरंभ में और फ़रवरदीन महीने की पहली तारीख़ को मनाया जाने लगा और इसी दिन में स्थिर हो गया।

इस्लामी काल में विशेष रूप से सफ़वी शासनकाल में नौरोज़ की परंपराएं कुछ इस्लामी संस्कारों व परंपराओं से जुड़ गए और उन्हें एक नया रंग और धार्मिक आयाम मिल गया। शिया धर्मगुरुओं ने नौरोज़ को एक पावन दिन बताया जो कुछ हदीसों के अनुसार वह दिन है जब सभी के पिता और पहले इंसान हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की रचना की गई थी। इस तरह ईरानी-इस्लामी संस्कृति में नौरोज़ का स्थान पहले से अधिक मज़बूत हो गया और ईरानी मुसलमानों ने अपने पूर्वजों की इस सुंदर परंपरा को धार्मिक व इस्लामी विचारों व आस्थाओं से जोड़ कर उसे एक अधिक सुंदर जलवा प्रदान कर दिया।

इस्लाम में नौरोज़ को विशेष महत्व देते हुए इसके सम्मान पर बल दिया गया है, इस प्रकार से कि कुछ हदीसों में इसे अंतिम इमाम, इमाम महदी के प्रकट होने का दिन बताया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक हदीस है कि नौरोज़ वही दिन है कि जब ईश्वर ने अपने बंदों से प्रतिज्ञा ली कि वे केवल उसी की उपासना करेंगे, किसी भी चीज़ को उसका समकक्ष नहीं बनाएंगे और उसके पैग़म्बरों व प्रिय बंदों पर ईमान लाएंगे। इसी तरह नौरोज़ वह पहला दिन है जब सूरज का उदय हुआ, हवाएं चलीं और ज़मीन पर फूल और कलियां पैदा की गईं। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम आगे कहते हैं कि नौरोज़ वह दिन है जब ईश्वर के पैग़म्बर हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का जहाज़ जूदी पर्वत पर जा कर रुक गया। नौरोज़ ही के दिन जिब्रईल, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर नाज़िल हुए थे, इसी दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति की मूर्तियों को तोड़ा था और यही वह दिन है जब पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने कांधों पर खड़ा किया था ताकि वे काबे के अंदर रखे हुई क़ुरैश की मूर्तियों को तोड़ दें।

 

नौरोज़, समकालीन समय में भी एक सांस्कृतिक विरासत के रूप में हमेशा ही लोगों के ध्यान का केंद्र रहा है और हर साल आयोजित होता है। अलबत्ता कुछ देशों में कुछ सरकारों की ओर से कुछ समय के लिए नौरोज़ के जश्न का खुल कर आयोजन प्रतिबंधित था। सोवियत संघ ने कुछ मध्य एशियाई देशों जैसे तुर्मनिस्तान, क़िरग़िज़स्तान व ताजीकिस्तान में नौरोज़ के समारोह के आयोजन को प्रतिबंध कर रखा था और यह प्रतिबंध मीख़ाइल गोर्बाचोफ़ के ज़माने तक जारी रहा। इसके बावजूद इन क्षेत्रों के लोग छिप छिपा कर या देहातों में नौरोज़ का जश्न मनाया करते थे। कुछ लोग, स्थानीय अधिकारियों की सहमति से नौरोज़ का जश्न किसी और नाम से मनाया करते थे। उदाहरण स्वरूप ताजीकिस्तान में लोग आठ मार्च के जश्न का आयोजन करके, नौरोज़ का उत्सव सरकारी अधिकारियों के विरोध के बिना ही मना लें। इसी तरह अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान की सरकार के दौरान, नौरोज़ के जश्न का आयोजन प्रतिबंधित था और वह सरकार केवल हिजरी क़मरी कैलेंडर को मान्यता देती थी।

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो जिस क्षेत्र में नौरोज़ मनाया जाता था वह चीन से लेकर भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्रों तक पर आधारित था और समय बीतने के साथ साथ इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विचार और संस्कार भी शामिल हो गए हैं। नौरोज़ मनाए जाने वाले क्षेत्र में कई देश शामिल हैं जिनमें पूरा पश्चिमी एशिया, क़ज़ाक़िस्तान, मध्य एशियाई देश, सूडान, ज़ंगीबार, लघु एशिया, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल इत्यादि शामिल हैं। इनमें से कई देशों में नौरोज़ की परंपराएं अलग अलग हैं जैसे अफ़ग़ानिस्तान में सात फलों वाला दस्तरख़ान लगाया जाता है जबकि ईरान में हफ़्त सीन नामक दस्तरख़ान लगाया जाता है। यहां तक कि मिस्र और चीन जैसे देशों में भी, जो नौरोज़ मनाए जाने वाले क्षेत्रों में शामिल नहीं हैं, नौरोज़ का जश्न मनाया जाता था लेकिन आज इन देशों के कुछ भागों में नौरोज़ से मिलते जुलते उत्सव मनाए जाते हैं।

 

इस पर्व का व्यापक भौगोलिक क्षेत्र इस बात का कारण बना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य देश इस पर विशेष ध्यान दें। नौरोज़ एक बहुराष्ट्रीय पर्व है जिसे 24 फ़रवरी वर्ष 2010 को राष्ट्र संघ ने एक प्रस्ताव पारित करके नौरोज़ के अंतर्राष्ट्रीय दिवस और संसार में शांति की संस्कृति के दिन के रूप में मान्यता दी। इस प्रकार नौरोज़, एक वैश्विक जश्न के रूप में दर्ज हो गया। तीस मार्च 2009 को कनाडा की संसद ने भी वसंत ऋतु के पहले दिन को नौरोज़ डे के नाम से ईरानियों और कई अन्य जातियों के राष्ट्रीय पर्व का नाम दिया।

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