May १६, २०२० १८:३५ Asia/Kolkata

रमज़ान में तीन रातें एसी होती हैं जिन्हें कद्र की रातें कहा जाता है।

हदीसों में कहा गया है कि कद्र की रातों में इन्सान के पूरे साल की क़िस्मत का फैसला होता है। इस लिए इन रातों में दुआ करना चाहिए और ईश्वर से उसकी कृपा और दया की प्रार्थना करना चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम ने रमज़ान के महीने के दिनों का महत्व बयान करते हुए कहा है कि यह दिन पवित्र सांसों के दिन हैं और इन दिनों में ईश्वरीय कृपा की बयार चलती है। जान लो सचेत रहो स्वंय को इस बयार से लाभ उठाने का अवसर दो।

रमज़ान का महीना इस लिए भी साल भर के अन्य महीनों से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इस महीने लोग, रोज़ा रख कर ईश्वर के अतिथि बनते हैं। रमज़ान के महीने की सभी रातों में कद्र की रातों को विशेष महत्व प्राप्त है। कद्र की रात, दिलों को ईश्वरीय प्रकाश से भर लेने का की रात है। इस रात ईश्वर से प्रार्थना द्वारा ईश्वर के दास आध्यात्मिक स्थान प्राप्त करते हैं और अपने मन को अपनी आत्मा में नया प्राण फूंकते हैं। ईश्वरीय दूतों और उनके उत्तराधिकारियों के कथनों के अनुसार इस रात सब से अच्छा और सराहनीय काम, ईश्वर की उपासना करना है। इन रातों का महत्व इतना है कि पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया है कि अगर अन्य रातों को उपासना नहीं कर सके तो कोशिश करो कि तेइसवीं की रात को जाग कर ज़रूर उपासना करो।

तेइसवीं की रात का बहुत महत्व है लेकिन इसके साथ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस रात उपासना के लिए स्वंय को तैयार भी करना होता है। हदीसों के अनुसार इन्सान को इस रात का पूरी तरह से फायदा उठाने के लिए पहले दिन से ही स्वंय को तैयार करना चाहिए। पहली रमज़ान से रोज़े रखने के अलावा हर उस काम से बचना चाहिए जिससे महान ईश्वर अप्रसन्न होता है। इस तरह से उसके दिल में ईश्वरीय प्रेम और उपासना की भावना अधिक जागती है और उसका दिल इस रात की विशेष उपासनाओं के लिए अधिक तैयार होता है। हदीसों में कहा गया है कि 23वीं की रात को जितना अधिक संभव हो ईश्वर को याद करे, विशेष नमाज़ें पढ़े, दुआाएं करे और कुरआने मजीद के सूरए दुखान और अनकबूत की तिलावत करे। इसके अलावा अपने माता- पिता और अपने बच्चों के लिए ईश्वर से दुआ करना भी इस रात की उपासनाओं में शामिल है। हदीसों में कहा गया है कि इन्सान को इस रात अपने माता पिता को खुश रखने की कोशिश करना चाहिए और यदि उनके मन में कोई दुख है तो उसे दूर करना चाहिए , यह बहुत बड़ी उपासना है।

इस रात इन्सान, ईश्वर की उपासना करके उसके सामने गिड़गिड़ा कर अपना मानवीय स्थान ऊंचा करता है। वास्तव में ईश्वर से दुआ का एक उद्देश्य, ईश्वरीय कृपा व दया से अधिक लाभ उठाना भी है। इन्सान दुआ और प्रार्थना करके अधिक क्षमता व योग्यता प्राप्त कर लेता है, वास्तव में दुआ इन्सान की आत्मा को पवित्र करती है। दुआ इन्सान के भीतर उम्मीद पैदा करती है और इस उम्मीद की डोर थामे इन्सान, ईश्वर तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि चौथे इमाम, इमाम ज़ैनुल आबेदीन कद्र की रातों में दुआ को बहुत अधिक महत्वपूर्ण बताते हैं। वह अपनी प्रार्थनाओं में ईश्वर से हर उस चीज़ की मांग करते हैं जो इन्सान के लिए भली हो और जिससे उसे फायदा मिले। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कद्र की रात इन्सान को ईश्वर से अपने भले की दुआ करना चाहिए।  इसी तरह इमाम जाफरे सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि दुआ निश्चित मौत को भी, टाल देती है इस लिए बहुत अधिक दुआ करो क्योंकि दुआ हर कृपा की कुंजी है।

रमज़ान का महीना कुरआने मजीद के उतरने का भी महीना है। खास तौर पर कद्र की रातें बहुत अहम हैं और कुरआने मजीद में कहा गया है कि हम ने कुरआने मजीद को कद्र की रात में उतारा है। यही वजह है कि कद्र की रातों में उपासना करने वाले कुरआने मजीद को अपने सामने खोल कर और अपने सिरों पर रख कर विशेष प्रकार की दुआंए पढ़ते हैं। इस अवसर पर उपासक ईश्वर से अपने पापों की क्षमा मांगता है।

शबे कद्र या कद्र की रातें जिन रातों को कहा जाता है वह बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह महत्व उपासना की दृष्टि से नहीं बल्कि इस समय के जीवित इमाम से संपर्क के लिहाज़ से भी इन रातों का बहुत महत्व है। यही वजह है कि बुद्धिजीवी कद्र की रातों को धार्मिक भविष्य के हिसाब से भी महत्वपूर्ण मानते हैं। इस रात उपासक अपने जीवित इमाम से मदद मांगता है और उन्हें गवाह बना कर अच्छे कामों की प्रतिज्ञा करता है। वह यह प्रयास करता है कि इस रात में जो कि किस्मत लिखे जाने की रात है अपने ईश्वर को स्वंय से प्रसन्न करे। 

क़द्र की रातें विशेष कर 23वीं रात में उपासना के दौरान पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों का हवाला देकर दुआ मांगना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि मुसलमानों के निकट यह लोग पवित्र हैं और ईश्वर उनका हवाला देने पर दुआ अधिक आसानी से कुबूल करता है। प्रसिद्ध बुद्धिजीवी शेख कुलैनी की किताब उसूले काफी में भी इमाम ज़माना और क़द्र की रात के मध्य संबंध की ओर संकेत किया गया है। इस किताब में है कि इमाम ने कहा है कि विरोधियों के सामने हमारे अनुसरण की अनिवार्यता को सिद्ध करने के लिए कुरआने मजीद के सूरए क़द्र को प्रमाण के रूप में पेश करो। इमाम की यह बात सुन कर एक व्यक्ति ने हैरत से पूछा कि इस सूरे में तो आप लोगों के हुज्जत या अभिभावन होने या इमामत की बात नहीं की गयी है। तो किस तरह से इस सूरे को आप लोगों की इमामत सिद्ध करने के लिए हम प्रमाण के तौर पर पेश कर सकते हैं?  यह सुन कर  इमाम ने कहा कि विरोधियों से यह कहो कि कद्र की रात फरिश्ते किस पर उतरते हैं? क्या आज तक किसी ने यह दावा किया है कि फरिश्ते उस के पास आते हैं? कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि कद्र की रात फरिश्तों के उतरने को देखता है। कुरआने मजीद के सूरए कद्र की चौथी आयत में कहा गया है कि उस रात फरिश्ते और रुहुलअमीन हर काम के निर्धारण के लिए  अपने पालनहार की अनुमति से उतरते हैं। इस आधार पर पैगम्बरे इस्लाम के बाद किसी का होना ज़रूरी है जिसके पास यह फरिश्ते जाएं और वह इमाम ज़माना के अलावा कोई नहीं होगा।

वास्तव में पैगम्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि यह धरती एक क्षण के लिए भी ईश्वर के प्रतिनिधि और उसके प्रमाण के बिना नहीं रह सकती। इस लिए वह संकट मोचक हस्ती हमेशा ही इस धरती पर रही है अलबत्ता उनका रूप अलग अलग रहा है। इस समय पैगम्बरे इस्लाम के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के वंश से बारहवें इमाम, अज्ञातवास में हैं और वही इस धरती के लोगों और ईश्वर के मध्य निकट संपर्क की कड़ी हैं। ईश्वर हमारे दिलों को उनके अपनी कृपा के प्रकाश को महसूस करने में सहायता प्रदान करे और हमें वह दिन देखना नसीब हो जब इस दुनिया से अन्याय व अत्याचार का अंत हो जाएगा और हर तरफ ईश्वरीय मूल्यों का बोल बाला होगा। हमारी प्रार्थना है कि ईश्वर इस पवित्र रात में हमारे पापों को क्षमा करे और हमें अच्छे कर्म करने का अवसर दे।

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