May १९, २०२० १७:२२ Asia/Kolkata

हम सभी जानते हैं कि इस्लाम की आदर्श व न्यायपूर्ण व्यवस्था में किसी भी तरह की असमानता, भेदभाव और सामाजिक अंतर का कोई चिन्ह तक नहीं होना चाहिए और लोगों के किसी समूह में दरिद्रता व वंचितता की कोई निशानी दिखाई नहीं देनी चाहिए।

तो फिर इस्लाम के प्रभावी कार्यक्रमों व अहम नीतियों के विपरीत हमें इस्लामी जगत में इस प्रकार के उच्च मानवीय व इंसानी लक्ष्य व उमंगें दिखाई क्यों नहीं देतीं?

इस अहम सवाल के जवाब में कहना चाहिए कि इस्लाम की न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था में ईश्वर ने धनवानों की संपत्ति में लोगों के लिए जो अनेक अधिकार रखे हैं, अगर वे धनवान अपने धार्मिक व मानवीय कर्तव्यों का सही ढंग से पालन करते तो निश्चित रूप से इस्लामी समाज में ग़रीबी व अभाव का नामो- निशान तक न होता। खेद की बात है कि आजकल अवैध तरीक़े से सत्ता हथियाने वाले क्रूर व निर्दयी तानाशाह जिस तरह से बेतहाशा धन एकत्रित कर रहे हैं और जिस तरह वंचित लोगों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं उसकी वजह से कुछ समाजों में दहला देने वाले फ़ासले पैदा हो गए हैं। इसके चलते कुछ लोग तो पूरी संपन्नता के साथ जीवन बिता रहे हैं लेकिन अधिकतर लोग, ग़रीबी व दरिद्रता से जूझ रहे हैं। इन पीड़ादायक, ग़ैर इस्लामी व ग़ैर इंसानी हालात में इस्लाम, ईमान वाले, प्रतिबद्ध और दूसरों की पीड़ा समझने वाले रोज़ेदार इंसानों से चाहता है कि वे वंचितों व भूखों की मदद के लिए आगे बढ़ें। इस निमंत्रण का बेहतरीन अवसर रमज़ान का पवित्र महीना है जिसमें सच्चे रोज़ेदारों को ज़िम्मेदारी का आभास करते हुए ज़रूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।

 

इस्लाम धर्म, ईश्वर पर ईमान रखने वाले हर सद्कर्मी की व्यवहारिक ज़िम्मेदारी का चित्रण सूरए बक़रह की आयत नंबर 177 में इस प्रकार करता है। भलाई (केवल) यह नहीं है कि तुम नमाज़ पढ़ते समय अपने मुख को पूरब और पश्चिम की ओर घुमाओ (और क़िबले तथा उसके परिवर्तन के विषय के बारे में सोचो) बल्कि वास्तविक भलाई करने वाला वह है जो ईश्वर, प्रलय, फ़रिश्तों, आसमानी किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और अपने माल को आवश्यकता रखने के बावजूद नातेदारों, अनाथों, दरिद्रों, मार्ग में रह जाने वालों तथा मांगने वालों को और ग़ुलामों (को स्वतंत्र कराने) के मार्ग में ख़र्च करता है।

इस आधार पर, कर्म व उपासना संबंधी दायित्व उसी समय मूल्यवान हैं जब इंसान, भूखों, निर्वस्त्रों, क़ैदियों, ऋणी और शरण चाहने वालों की समस्याओं व कठिनाइयों के संबंध में न सिर्फ़ यह कि तटस्थ न रहे बल्कि उससे जहां तक संभव हो ज़िम्मेदारी का आभास करे और इस संबंध में क़दम उठाए। निश्चित रूप से यह ज़िम्मेदारी धनवानों पर सबसे ज़्यादा है। अगर कोई इस धार्मिक व इंसानी भावना को नहीं समझता तो वह केवल नाम का मुसलमान है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया हैः अगर कोई सुबह सो कर उठे और इस्लामी समाज की समस्याओं को हल करने के बारे में क़दम न उठाए तो वह मुसलमान नहीं है।

 

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पौत्र से रिवायत की गई है कि ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से एक दुआ की जिसके जवाब में उसने कहाः हे मूसा! मांगने वाले का थोड़ी सी दक्षिणा लेकिन अच्छे आकर्षण से सम्मान करो क्योंकि जो तुम्हारे पास आता है और तुम से मदद मांगता है, वह इंसान या जिन्न नहीं ईश्वर के फ़रिश्तों में से एक फ़रिश्ता है ताकि हमने जो कुछ तुम्हें प्रदान किया है, उसके बारे में तुम्हारा इम्तेहान ले और तुमसे वह मांगे जो हमने तुम्हें दिया है इस लिए हे इमरान के बेटे! इस बात का बड़ा ध्यान रखो कि तुम किस तरह का व्यवहार करते हो।

सच्चे इस्लाम की संस्कृति में एक अहम कसौटी, सभी छोटे बड़े मामलों में संतुलन बाक़ी रखना है। उदाहरण स्वरूप इस्लाम ने एक ओर तो ईश्वर व प्रलय पर ईमान के साथ उपासना, अध्यात्म व शिष्टाचार संबंधी शिक्षाओं की आत्मा की शुद्धि पर ध्यान देने पर बल दिया है और दूसरी ओर शरीर व स्वास्थ्य को भी बहुत अधिक महत्व दिया है। इस संतुलित सोच का सबसे स्पष्ट उदाहरण रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा है जिसमें नमाज़, प्रार्थना, रात की उपासना, ईश्वरीय आदेशों का पालन, व्यक्तिगत व सामाजिक पापों से दूरी और ज़रूरतमंदों के साथ हमदर्दी, आध्यात्मिक दृष्टि से इंसान की आत्मा को विकसित करती है और उसे परिपूर्णता की ओर बढ़ा देती है। इस तरह इंसान, ईश्वर के अधिक समीप होता है और ईदे फ़ित्र के दिन इस सफलता का उत्सव मनाता है।

अलबत्ता इस्लाम ने सूफ़ियों की ग़लत व दिगभ्रमित परंपराओं के विपरीत, जो केवल आत्मा के स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं और शरीर के स्वास्थ्य को कोई महत्व नहीं देते, ध्यान योग्य दिशा निर्देश पेश किए हैं। इस्लाम केवल आत्मिक व मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता बल्कि वह शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए व्यक्तिगत व सामाजिक स्वास्थ्य को भी दृष्टिगत रखता है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया हैः "रोज़ा रखो ताकि स्वस्थ रहो।" एक अन्य स्थान पर उन्होंने फ़रमाया हैः "हर चीज़ की ज़कात है और शरीर की ज़कात, रोज़ा है।" इस आधार पर रोज़ा आत्मा व शरीर दोनों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित बनाता है।

 

जहां तक रोज़े की स्वास्थ्य संबंधी उपलब्धियों की बात है तो नई शोधों से पता चला है कि शरीर के अंदर मौजूद विषैले पदार्थों को बाहर निकालने और शरीर की प्रतिरक्षा शक्ति को मज़बूत बनाने में रोज़े के अत्यंत लाभदायक प्रभाव हैं। रोज़ा, शरीर के ऊतकों को जवान बनाने का एक उत्तम मार्ग है। इसके अलावा काफ़ी समय से अनेक बीमारियों के उपचार के रूप में रोज़े की सिफ़ारिश की जा रही है, जिसे fasting therapy या उपवास चिकित्सा कहा जाता है। इसमें तीन या सात दिन या उससे अधिक दिनों तक, जो अधिकतम तीस दिन हो सकते हैं लगातार रोज़ा रखा जाता है और थोड़ा सा पानी पिया जाता है या ज़रा से फल खा लिए जाते हैं।

इस प्रकार की चिकित्सा शैली प्राचीन काल में भारत, यूनान व मिस्र में प्रचलित थी और पंद्रहवीं शताब्दी ईसवी के बाद से इसे यूरोप में लगभग भुला दिया गया था लेकिन सन 1880 के बाद एक बार फिर कुछ रोगों के उपचार में रोज़े के अच्छे प्रभाव सिद्ध हुए और धीरे- धीरे यह शैली फिर से प्रचलित हो गई। अब कई दशकों से इस उपचार शैली की सिफ़ारिश की जा रही है। जर्मनी, फ़्रान्स और अमरीका में विशेष रूप से इस शैली के अधिक समर्थक पाए जाते हैं। इस उपचार शैली की सिफ़ारिश अधिकतर उन बीमारियों के उपचार में की जाती है जो मेटाबोलिज़्म के विकारों के कारण जन्म लेती हैं। जैसे पुराना गठिया, गुर्दे की बहुत सी बीमारियां, धमनियों में जमाव, शराब की पुरानी लत और कुछ मानसिक बीमारियां।

 

इसके अलावा हम सब जानते हैं कि बहुत सी बीमारियों की जड़, अधिक खाना-पीना है और चूंकि अधिक मात्रा में खाई गई चीज़ें या तो शरीर के विभिन्न अंगों में चर्बी के रूप में बाक़ी रहती हैं या ख़ून में शर्करा या वसा के रूप में रह जाती हैं, इस लिए शरीर के विभिन्न स्थानों पर अतिरिक्त पदार्थ, विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं व रोगाणुओं के पलने बढ़ने की उचित जगह उपलब्ध करा देते हैं। इस प्रकार की बीमारियों से लड़ने का एक उत्तम रास्ता, रोज़ा या उपवास है।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की एक मशहूर हदीस है कि अमाशय, सारी बीमारियों का घर है और रोज़ा उन सभी बीमारियों की सबसे प्रभावी दवा है। ईश्वर के पैग़म्बर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी कहते हैं कि रोज़ा, बीमारी को शरीर से बाहर निकाल देता है। लुक़मान हकीम कहा करते थे कि जब पेट भर जाता है तो बुद्धि सो जाती है, तत्वदर्शिता निष्क्रिय हो जाती है और शरीर के अंग, ईश्वर की उपासना के लिए मनुष्य का साथ नहीं देते। इसी तरह एक यूरोपीय मनोवैज्ञानिक का कहना हैः रोज़ा, आत्मा के आकर्षण में वृद्धि कर देता है।

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