May २३, २०२० १५:४० Asia/Kolkata

वैसे तो खुशबरी से मनुष्य सामान्यतः खुश होता ही है किंतु जब यह ईश्वर की ओर से हो तो खुशी दुगनी हो जाती है। 

समस्त ईश्वरीय धर्मों में अलग-अलग अवसरों पर शुभसूचनाएं दी गई हैं। ईश्वरीय खुशख़बरी की एक विशेषता यह है कि वह मनुष्य के भीतर से निराशा को समाप्त करके उसके भीतर आशा पैदा करती है। जहां आशा होती है वहां पर उत्साह भी होता है। जब कोई मनुष्य पूरे उत्साह के साथ किसी काम को करता है तो उसे सफलता भी निश्चित रूप से मिलती है। मनुष्य के जीवन में आशा और निराशा के क्षण आते जाते रहते हैं किंतु अपने जीवन में मनुष्य को सदैव ही आशावान रहना चाहिए। 

एक बार की बात है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम मुसलमानों के बीच बैठे हुए थे। उन्होंने लोगों से पूछा कि क्या तुमको पता है कि पवित्र क़ुरआन की वह कौन सी आयत है जो सबसे अधिक आशा प्रदान करती है। इसके जवाब में वहां पर मौजूद लोगों ने अलग-अलग आयतों के नाम लेने शुरू कर दिये। एक व्यक्ति ने कहा कि सूरे निसा की 48वीं आयत ही वह आयत है जिसमें ईश्वर की ओर से लोगों को आशा प्रदान की गई है। इस आयत में ईश्वर कहता हैः नि:संदेह ईश्वर अपने साथ किसी को समकक्ष या शरीक ठहराये जाने को क्षमा नहीं करेगा पंरतु इसके अतिरिक्त जो पाप होगा उसे वह जिसे चाहेगा उसके लिए क्षमा कर देगा और जिसने भी किसी को ईश्वर का भागीदार ठहराया निश्चित रूप से उसने बहुत बड़ा पाप किया। उन्हीं लोगों में से एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि सूरे निसा की आयत नंबर 110 वह आयत है जिसमें ईश्वर की ओर से अधिक आशा प्रदान की गई है। इस आयत में ईश्वर कह रहा हैः और जो कोई बुरा कर्म करे या अपने आप पर अत्याचार करे और फिर ईश्वर से क्षमा चाहे तो वह ईश्वर को अत्यन्त क्षमाशील और दयावान पाएगा।

एक दूसरे व्यक्ति ने सूरए आले इमरान की 135वीं आयत के बारे में कहा कि यह लोगों को सबसे अधिक आशा प्रदान करती है जिसका अनुवाद इस प्रकार हैः (ईश्वर से डरने वाले वे लोग हैं) जो जब भी कोई बुरा कार्य करते हैं या (वास्तव में) स्वयं पर अत्याचार करते हैं तो ईश्वर को याद करते हैं और अपने पापों के लिए ईश्वर से क्षमा चाहते हैं और ईश्वर के अतिरिक्त कौन उनके पापों को क्षमा करता है? और वे लोग जिसकी बुराई को वे जानते हैं उस पर आग्रह नहीं करते। वहां पर उपस्थित एक मुसलमान ने कहा कि सूरे ज़ोमर की 53वीं आयत हमें सबसे अधिक आशा दिलाती है। जिसका अनुवाद इस प्रकार से हैः (हे रसूल!) कह दीजिए कि हे मेरे (ईमानदार) बन्दो! जिन्होंने (गुनाह करके) अपनी जानों पर अत्याचार किए हैं, तुम लोग ईश्वर की दया से निराश न होना कि निस्संदेह वह (तुम्हारे) सारे पापों को क्षमा कर देगा, वह निस्सन्देह, बहुत ही कृपालु एवं क्षमाशील है।

जब मौजूद लोग इस बारे में अपने विचार व्यक्त कर चुके तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से सुना है कि पवित्र क़ुरआन में सबसे अधिक आशा देने वाली आयत सूरे हूद की एक आयत है। उन्होंने कहा कि यह सूरे हूद की 114वीं आयत है जिसमें ईश्वर कह रहा है कि और (हे पैग़म्बर!) दिन के दोनों ओर और रात्रि के आरंभ में नमाज़ क़ाएम यानी स्थापित कीजिए। निस्संदेह भले कर्म बुराइयों को समाप्त कर देते हैं, यह ईश्वर को याद रखने वालों के लिए एक नसीहत है। इसके बाद हज़रत मुहम्मद (स) ने कहा कि हे अली! उस ईश्वर की सौगंध जिसने मुझको लोगों के लिए शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है, यह जान लो कि जब कोई नमाज़ पढ़ने के लिए वूज़ करता है तो उसके पाप समप्त हो जाते हैं। अब जब वह क़िब्ले की ओर मुंह करता है तो पवित्र हो जाता है। आपने कहा कि हे अली, रोज़ाना की नमाज़ें पढ़ने वाला वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति दिन में पांच बार पाबंदी से नहाए। सूरे हूद की 114वीं आयत में ईश्वर, नमाज़ का आदेश देने के बाद इस नमाज़ के कारण पाप के प्रभाव के समाप्त हो जाने के बारे में बताता है।

 

सामान्यतः मनुष्य अपने पापों के प्रति बहुत चिंतित रहता है। यह बात सही है कि हर पाप या बुरा काम, मनुष्य की आत्मा को एक प्रकार से अंधकार में डाल देता है। यह अंधकार मनुष्य के लिए धीरे-धीरे दुष्परिणाम पैदा करता है जो उसके लिए बाद में समस्याओं का कारण बनते हैं लेकिन इसके विपरीत अगर कोई काम ईश्वर की प्रसन्नता के उद्देश्य से किया जाए तो वह मनुष्य की आत्मा को प्रभुल्लित करता है। यह भला काम आत्मा पर छा जाने वाले अंधकार को भी दूर करता है। नमाज़ के आदेश के बाद यह कहे जाने से कि वह पाप को समाप्त करती है, यह नतीजा निकाला जा सकता है कि मनुष्य पर नमाज़ के अभूतपूर्व सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं जिनमें से एक पापों का दूर हो जाना है।

इस आयत की व्याख्या करते हुए इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि आयत में कहा गया है कि नमाज़ों को दिन के दोनों ओर और रात्रि के आरंभ में क़ाएम कीजिए। निस्संदेह, भले कर्म बुराइयों को समाप्त कर देते हैं। इसका अर्थ है कि नमाज़ में नूर होता है जो अंधकार को दूर करता है। यह बुराइयों का दमन करता है और साथ ही पापों के दुषप्रभावों को भी समाप्त कर देता है। वे कहते हैं कि जीवन में मनुष्य से ग़लतियां हो ही जाती हैं और वह पाप कर बैठता है किंतु अगर वह नमाज़ की पाबंदी करता है तो वह इन बुराइयों को दूर कर देती है। साथ ही मनुष्य को एसी शक्ति देती है जिससे वह पापों से बचने लगता है।

देखा गया है कि ज़िंदगी के दौरान आंतरिक इच्छाएं, मनुष्य को बुरे कामों के लिए उकसाती रहती हैं जिसके कारण वह बुराई की ओर बढ़ने लगता है। आंतरिक इच्छाओं के सामने यदि को दृढ़ता के साथ डट सकता है तो वह मनुष्य की आत्मशक्ति है। आत्मशक्ति के कमज़ोर होने की स्थिति में मनुष्य आंतरिक इच्छाओं और भावनाओं के जाल में बहुत तेज़ी से फंस जाता है जिसके बाद उसके गुमराह होने की संभावना बढ जाती है। नमाज़ की यह विशेषता है कि वह एसी असीम शक्ति से जोड़ती है जिससे उसका संकल्प मज़बूत होता जाता है और वह बहुत ही सरलता से अपनी आंतरिक इच्छाओं पर क़ाबू पाने लगता है। यही कारण है कि इस्लाम में नमाज़ को आध्यात्मिक बीमारियों की सबसे महत्वपूर्ण दवा बताया गया है। मनोवैज्ञानिकों का भी कहना है कि हर गुनाह या बुरा काम, मनुष्य की आत्मा में अंधकार का कारण बनता है। अब अगर वह पापों को करता रहता है तो फिर वह अधंकार भी बढ़ता रहता है जिससे वह ईश्वर के मार्ग से भटककर शैतान के मार्ग पर चल निकलता है और तेज़ी से बुराइयों के भंवर में डूबता चला जाता है। जब भी कोई अच्छा काम ईश्वर की प्रसन्नता के उद्देश्य से किया जाए तो उसे मनुष्य की आत्मा को एक प्रकार की शांति का आभास होता है।

पैग़म्बरे इस्लाम, हज़रत मुहम्मद सल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के एक सहाबी सलमान फ़ारसी कहते हैं कि एक बार मैं पैग़म्बरे इस्लाम के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ा हुआ था। पेड़ की डालें सूख चुकी थीं। पैग़म्बरे इस्लाम ने पेड़ की एक सूखी डाल को हिलाया। डाल को हिलाने से उसके सारे पत्ते नीचे गिर गए। इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने क्यों नहीं पूछा कि यह मैंने क्यों किया? मैंने कहा कि हे पैग़म्बर! आप ही इसका जवाब दीजिए। इस पर हज़रत मुहम्मद (स) ने कहा कि जब भी कोई मुसलमान वुज़ू करके नमाज पढ़ने लगता है तो उसके गुनाह इसी तरह से गिरने लगते हैं। इतना कहने के बाद उन्होंने सूरे हूद की 114वीं आयत पढ़ी जिसमें ईश्वर कह रहा हैः (हे पैग़म्बर!) दिन के दोनों ओर और रात्रि के आरंभ में नमाज़ क़ाएम कीजिए। निसंदेह भले कर्म बुराइयों को समाप्त कर देते हैं, यह ईश्वर को याद रखने वालों के लिए एक नसीहत है। सूरए हूद की इस आयत के बाद वाली आयत में ईश्वर कह रहा है कि हे पैग़म्बर! संयम से काम लीजिए कि निश्चित रूप से ईश्वर, भलाई करने वालों के पारितोषिक को व्यर्थ नहीं जाने देगा।

ईश्वर की कृपा के प्रति आशान्वित रहना वह विषय है जिसे रोज़ा रखने वाला रमज़ान के ज़माने में अच्छी तरह से समझता है। ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में विभिन्न जगहों पर अपनी कृपा और अनुकंपाओं का उल्लेख किया है। उसका कहना है कि जो ईश्वर पर भरोसा करता है वह उसके अच्छे परिणाम भी देखता है। इस्लामी शिक्षाओं में मनुष्य के आशावान रहने का आह्वान किया गया है। क़ुरआन के अनुसार जहां आशा एक सकारात्मक चीज़ है वहीं पर निराशा बहुत ही नकारात्मक है। यही कारण है कि निराशा को इस्लाम ने पाप बताया है। मनुष्य के भीतर जब जीवन के प्रति आशा होती है तो वह इसके माध्यम से बहुत से एसे काम कर लेता है जो निराशा की स्थिति में कर ही नहीं सकता।  जीवन में काम आशा और उत्साह से पूरे होते हैं निराशा से नहीं।

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