May २३, २०२० १६:०४ Asia/Kolkata

क़ुरआने मजीद में जब भी नमाज़ का उल्लेख होता है तो उसके तुरंत बाद ज़कात और ईमान वालों और उपासना करने वालों की ओर से ज़कात दिए जाने की बात कही जाती है जिससे पता चलता है कि इस्लामी संस्कृति में रचयिता व रचनाओं के बीच अत्यंत निकट व गहरा संबंध है।

अनन्य ईश्वर, अपनी चौखट पर सिर झुकाने वाले दासों को सूरए बक़रह की 43वीं आयत में इस प्रकार आदेश देता है। नमाज़ स्थापित करे, ज़कात अदा करो और रुकू करने वालों के साथ रुकू करो।

चूंकि नमाज़ व ज़कात पिछले आसमानी धर्मों में भी अनिवार्य रहे हैं इस लिए महान ईश्वर अपने पैग़म्बरों की एक ज़िम्मेदारी इन्हीं दो बुनियादी व अहम कर्तव्यों के पालन को व्यवहारिक बनाना और इन्हें बहाल करना बताता है। सूरए अम्बिया की 73वीं आयत में कहा गया हैः और हमने उन्हें ऐसा नेता बनाया जो हमारे आदेश से (लोगों का) मार्गदर्शन करते थे और हमने उनकी ओर अपना विशेष संदेश वहि भेजा कि भले कर्म करें, नमाज़ स्थापित करें तथा ज़कात दें और वे सब केवल हमारी उपासना करते थे।

इस आधार पर नमाज़ स्थापित करना और ज़कात देना जहां ईश्वर का आदेश है वहीं पैग़म्बरों की शैली व परंपरा भी है और इससे यह मूल संदेश मिलता है कि सच्चे नमाज़ी, ईश्वर की उपासना और नमाज़ के साथ ही, कभी भी वंचितों व ज़रूरतमंदों को नहीं भूलते और उन्हें ज़कात देने की ओर से निश्चेत नहीं रहते। क़ुरआने मजीद इस प्रकार के लोगों के बारे में सूरए नूर की आयत नंबर 37 में कहता हैः वे पुरुष जिन्हें व्यापार और क्रय-विक्रय, ईश्वर की याद, नमाज स्थापित करने और ज़कात देने से निश्चेत नहीं करता। वे उस दिन से डरते रहते है जिसमें हृदय और आँखें पलट जाएँगी।

 

ईश्वर पर ठोस ईमान के साथ ही प्रलय पर भी पक्की आस्था होनी चाहिए ताकि इंसान इन दोनों मज़बूत सहारों के माध्यम से हर प्रकार के आर्थिक व वित्तीय मायामोह से मुंह मोड़ ले और दिखावे, उपकार या यातना के बिना केवल ईश्वर की प्रसन्नता के लिए ज़कात दे, ज़रूरतमंदों की इज़्ज़त सुरक्षित रखे और उनकी आर्थिक आवश्यकताएं पूरी कर दे। निश्चित रूप से ईश्वर ने धनवानों के माल और उनकी संपत्ति में दूसरों का जो हक़ रखा है, अगर उसे अदा कर दिया जाए तो इस्लामी समाज में एक भी दरिद्र व वंचित दिखाई नहीं देगा।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की हदीस है कि ईश्वर ने ज़कात को धनवानों की परीक्षा और ग़रीबों की मदद के लिए रखा है। अगर धनवान, अपने माल की ज़कात अदा करते तो कोई भी ज़रूरतमंद मुसलमान बाक़ी नहीं बचता और ईश्वर ने धनवानों के माल में जो कुछ अनिवार्य किया है, उससे वह आवश्यकतामुक्त हो जाता। जान लो कि जब भी कोई इंसान, ग़रीब, ज़रूरतमंद, भूखा व निर्वस्त्र रहता है तो इसकी ज़िम्मेदारी और इसका पाप धनवानों के सिर होता है।

इस आधार पर ज़कात अनिवार्य किए जाने की अहम वजह ईश्वर का आज्ञापालन, पैग़म्बरों व ईश्वर के प्रिय बंदों के क़दमों पर चलना, धनवानों की परीक्षा लेना, ग़रीबी व वंचितता समाप्त करना, भेदभाव को दूर करना, सामाजिक अंतर को पाटना और दरिद्रता के कारण मानव समाज में पैदा होने वाली बुराइयों व पथभ्रष्टताओं को फैलने से रोकना है। इन सारे विकारों की जड़, धर्म व इंसानियत से कोसों दूर रहने वाले धनवानों की अकूत धन-संपत्ति में खोजनी चाहिए। ज़कात का एक और कारण धन एकत्रित करने की भावना को रोकना है जिसका क़ुरआने मजीद के कई सूरों व अनेक आयतों में उल्लेख हुआ है ताकि एक गुट ऐश्वर्य व संपन्नता में डूबा न रहे जबकि अधिकतर लोग ग़रीबी व दरिद्रता में डूबे हुए हों।

 

ईश्वर क़ुरआने मजीद के सूरए तौबा की 34वीं व 35वीं आयतों में धन के पुजारियों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहता हैः और जो लोग सोना-चांदी एकत्रित करते हैं और उसे ईश्वर के मार्ग में ख़र्च नहीं करते तो हे पैग़म्बर! आप उन्हें कड़े दंड की सूचना दे दीजिए। जिस दिन वो सोना और चांदी नरक में तपाया जाएगा और उनके माथों, पहलू और पीठ को उससे दाग़ा जाएगा तो (दंड के फ़रिश्ते उनसे कहेंगे) यही है वह जो तुमने एकत्रित किया था। तो जो कुछ तुमने एकत्रित किया था उसका स्वाद चखो।

यह जानना भी ज़रूरी है कि वित्तीय हक़ केवल ख़ुम्स व ज़कात तक सीमित नहीं है और इस्लाम की आर्थिक संस्कृति और शिक्षाओं में माल से जेहाद, दक्षिणा देना, सदक़ा देना, भला क़र्ज़ देना, मुफ़्त सहायता, मानवीय सहायता और त्याग अर्थात ज़रूरतमंदों की आवश्यकता को स्वयं पर प्राथमिकता देना और इस तरह की और बातें भी कई गई हैं और उन पर बहुत अधिक बल भी दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के एक महान सहाबी अबूज़र गेफ़ारी हमेशा बनी उमय्या की ओर से धन एकत्रित किए जाने पर आपत्ति करते रहते थे। एक दिन मुआविया ने उनसे पूछा कि क्या ख़ुम्स व ज़कात के अलावा भी मुसलमानों के कंधों पर कोई वित्तीय हक़ है? एक यहूदी काबुल अहबार ने कहा कि नहीं, कोई दूसरा हक़ नहीं है।

हज़रत अबूज़र ने उसे बुरी तरह फटकारते हुए कहाः तुझे इस बारे में अपना विचार व्यक्त करने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसके बाद उन्होंने मुआविया की तरफ़ रुख़ करके कहाः वित्तीय हक़ सिर्फ़ ख़ुम्स व ज़कात तक सीमित नहीं हैं बल्कि मुसलमानों के कंधों पर इसके अलावा भी कुछ हक़ हैं। मुआविया ने कहा कि तुम्हारे पास क्या तर्क है? अबूज़र ने तुरंत ही सूरए बक़रह की आयत नंबर 177 की तिलावत की जिसमें कहा गया हैः भलाई (सिर्फ़) यह नहीं है कि तुम नमाज़ पढ़ते समय अपना मुंह पूरब और (या) पश्चिम की ओर घुमाओ (और केवल क़िबले तथा उसके परिवर्तन के विषय के बारे में सोचो) बल्कि वास्तविक भलाई (और भलाई करने वाला) वह है जो ईश्वर, प्रलय, फ़रिश्तों, आसमानी किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और अपने माल को आवश्यकता रखने के बावजूद नातेदारों, अनाथों, दरिद्रों, मार्ग में रह जाने वालों तथा मांगने वालों को और ग़ुलामों को स्वतंत्र कराने के मार्ग में ख़र्च करता है, नमाज़ पढ़ता है, ज़कात देता है और जब कोई वचन देता है तो उसे पूरा करता है और दरिद्रता, वंचितता, पीड़ा व रोग, दुर्घटनाओं और युद्ध में दृढ़तापूर्वक संयम से काम लेता है। हां, यही लोग हैं जिन्होंने ईमान का सच्चा दावा किया है तथा उनका कथन, व्यवहार और आस्था एक ही है और यही लोग ईश्वर से डरने वाले हैं।

 

इन आसमानी शिक्षाओं के आधार पर धन का ध्रुवीकरण भी रुकता है और साथ ही धन के बंटवारे से समाज के बहुत से ज़रूरतमंदों की ज़रूरतें भी पूरी होती हैं। यह भी ज़कात व अन्य वित्तीय अधिकारों की एक वजह हो सकती है। अलबत्ता इस नीति का क्रियान्वयन उन लोगों को पसंद नहीं आता जो धन एकत्रित करते हैं लेकिन ईश्वर व प्रलय पर कोई ख़ास आस्था नहीं रखते। इसी लिए वे कोशिश करते हैं कि बहाने बना कर या ग़लत औचित्य पेश करके अपनी धार्मिक व इंसानी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लें। क़ुरआन मजीद इस बारे मे सूरए यासीन की 47वीं आयत में कहता हैः और जब उनसे कहा जाता है कि जो कुछ ईश्वर ने तुम्हें रोज़ी के रूप में प्रदान किया है, उसमें से ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करो तो काफ़िर, ईमान वालों से कहते हैं कि क्या हम उसको खिलाएं जिसे ईश्वर चाहता तो खिला सकता था? (मतलब यह कि ईश्वर उसे भूखा रखना चाहता है) तुम तो खुली हुई गुमराही में हो।

एक अहम सवाल जो किसी के भी मन मे आ सकता है, यह है कि अगर यह तय हो कि धनवान, अपने माल को समाज के ज़रूरतमंदों व वंचितों पर विभिन्न रूपों में ख़र्च कर दें तब औद्योगिक व कृषि मामलों में उत्पादन और इसी तरह वैज्ञानिक, प्रशैक्षणिक और आर्थिक मामलों के लिए कोई पूंजी ही नहीं बचेगी। ऐसी स्थिति में समाज का भविष्य क्या होगा? इसके जवाब में कहना चाहिए कि निश्चित रूप से इस्लाम की स्वस्थ आर्थिक व्यवस्था में इस प्रकार के विचार की कोई जगह नहीं है बल्कि इस्लाम का बुनियादी लक्ष्य यह है कि धन को एकत्रित करने, अत्याचारपूर्ण भेदभाव, शोषण, अन्याय और गहरे सामाजिक अंतर पैदा करने पर अंकुश लगाया जाए। इन बुनियादी लक्ष्यों को व्यवहारिक बनाना और सभी मैदानों में पैदावार में वृद्धि और मेहनत व संघर्ष की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक न्याय की स्थापना, योग्यताओं को निखारना, स्वस्थ भावनाओं का पोषण और आर्थिक स्वाधीनता ज़रूरी है। इसी तरह आर्थिक मामलों का संचालन ऐसे लोगों को करना चाहिए जो धर्म का भी पालन करते हों, अपने काम में दक्षता भी रखते हों और ईमानदार भी हों। क़ुरआने मजीद के सूरए निसा की पांचवीं आयत में कहा गया हैः तुम अपने माल और धन सम्पत्ति को, जिसे ईश्वर ने तुम्हारे जीवन का साधन बनाया है, मूर्खों व बुद्धिहीनों के हवाले मत करो।

 

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की हदीस है कि माल, ईश्वर का है और उसने अपने माल को अमानत की तरह इंसानों के हवाले किया है। उसने उन्हें आदेश दिया है कि वे उस माल से संतुलित ढंग से लाभ उठाएं, खाएं, पियें, पहनें, शादी करें और अपने लिए आने जाने का साधन ख़रीदें और उनकी ज़रूरतें पूरी होने के बाद अगर कुछ बच जाए तो उसे ईमान वाले ज़रूरतमंदों को प्रदान करें। जो भी संतुलन के सिद्धांत का पालन न करे और फ़िज़ूलख़र्ची करे तो उसका खाना, पीना, पहनना, शादी और आने जाने के लिए ख़रीदा गया साधन, ग़लत ढंग से इस्तेमाल की श्रेणी में आता है और हराम अर्थात वर्जित है।

ध्यान रहे कि भय व आशा के दो सिद्धांतों के आधार पर, जो सभी धार्मिक मैदानों पर लागू होते हैं और लोग यह न सोचें कि केवल आर्थिक मामलों में ही उन पर सीमितता लगाई गई है, ईश्वर क़ुरआने मजीद के सूरए अनफ़ाल की साठवीं आयत में कहता हैः और ईश्वर के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे उसका (पूरा पूरा) बदला तुम्हें मिलेगा और तुम पर (कण भर भी) कोई अत्याचार नहीं होगा।

 

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