Aug ३१, २०२० १९:०५ Asia/Kolkata

ईश्वरीय दूत हमेशा से भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों का विरोध करते आए हैं।

यह भ्रष्ट लोग चाहे आम आदमी हों या शासक वर्ग इससे उनपर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता वे लोग यह चाहते थे कि पूरी दुनिया से भ्रष्टाचार का सफ़ाया करके लोगों को सुधारा जाए। कई ईश्चरीय तों के काल में एसे शासक गुज़रे हैं जो स्वयंभी भ्रष्ट थे और वे भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ईश्वरीय दूतों  के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को जारी रखते हुए सुधारवादी मिशन शुरू कया।

जब यज़ीद धर्म में मनमानी करने लगा और उसने समस्त बाधाओं व सीमाओं को तार तार कर दिया था तब मजबूर होकर इमामा हुसैन ने अपनी बात रखने काप्रण कर लिया। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने एक बयान में कहते हैं कि कितने आश्चर्य की बात यह है कि मुझे दो चीज़ों के बीच, एक के चयन पर विवश कर दिया गया है, मौत र अपमान । वे कहते हैं कि ईश्वर की सौगंध मैं अपमान को कभी ही स्वीकार नहीं करूंगा। मेरी पवित्रता, मेरे परिवार की सज्जनता और शुद्धता, मेरा साहस और मेरी प्तिष्ठा, मुझको इस बात की बिल्कुल भी अनुमति नहीं देती कि बेइज्ज़ती का अनुसरण करने को मैं इज़्ज़त की मौत पर प्राथमिकता दूं।

सुधार का काम बहुत ही महत्वपूर्ण काम होता है। सुधार के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कहना है कि सबसे अच्छे लोग वे हैं जो सुधार के काम करते हैं।

पवित्र क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर कहता है कि हमने हर क़ौम में अपना दूत भेजा ताकि लोग एक ईश्वर का अनुसरण करें र उद्दंडियों का अनुसरण करने से बचें। इमाम हुसैन ने इसी बात का अनुसरण करते हुए क़दम आगे बढ़ाया।

ईश्वर के आदेश के विपरीत बनी उमय्या के शासक अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के लिए हर प्रकार के हथकण्डे अपनाते थे।

हम यह कह सकते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का लक्ष्य यह था कि तत्कालीन इस्लामी जगत को उमवी शासकों के अत्याचारों और उकी बुराइयों से सुरक्षित रखा जाए । वे चाहते थे कि धर्म का मुखौटा पहनकर जो लोग सत्ता की कुर्सी पर बैठ गए हैं उनकी वास्तविकता को लोगों तक पहुंचाया जाए।

इस प्रकार के लोगों के बारे में पवित्र क़ुरआन कहता है: और हमने जिन्नों और मनुष्यों की एक बड़ी संख्या को नरक के लिए बनाया है क्योंकि उनके पास हृदय तो हैं किन्तु वे उनके माध्यम से सत्य को नहीं समझाते।

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