Aug ३१, २०२० १९:२८ Asia/Kolkata

दोस्तो मुहर्रम पर विशेष कार्यक्रम के साथ आपकी सेवा में उपस्थित हैं।

दोस्तो पिछले कार्यक्रम में हमने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क्रांति में सुधार के विषय पर चर्चा की थी और आपको बताया था कि भ्रष्टाचार से संघर्ष, सुधार की पूर्व शर्त है और इसके लिए ज़रूरी है कि भ्रष्टाचारियों का अनुसरण न किया जाए। इसी तरह हमने आपको यह भी बताया थ कि हर समाज और हर व्यवस्था में सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण क़दम, नज़रियों और दृष्टिकोणों का सुधार है, इसी सुधार के रास्ते में जब हम आगे बढ़ेंगे तो हमारा सामना अच्छा के आदेश देने और बुराई से रोकने के विषय से हो जाएगा।

इस्लाम धर्म में अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का आदेश दिया गया है। पवित्र क़ुरआन इस बारे में कहता है कि (1) अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने की ज़िम्मेदारी सभी मुसलमानो की है यद्यपि धर्मगुरुओं की इस संबंध में ज़्यादा ही ज़िम्मेदारी है। शहीदों के सरदार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अपनी क्रांति के फ़लसफ़े को बयान करते हुए कहते हैं कि अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के लिए निकला हूं। उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस विषय के महत्व को, अपना रास्ता क़रार दिया और कहा कि मैं इस रास्ते में अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम और अपने पिता अली इब्ने अबी तालिब के रास्ते पर अमल चलूंगा।

 

दोस्तो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क्रांति, पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण और उनके अनुरूप थी इसको समझने के लिए आपको पैग़म्बरे इस्लाम के काल का अध्ययन करना होगा। निसंदेह अगर मुसलमानों ने पैग़म्बरे इस्लाम की बेहतरीन शिक्षाओं को अपना आदर्श बना लिया होता तो पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के समय बनी सक़ीफ़ा में होने वाली कार्यवाही का मुक़ाला करते और उस पर आपत्ति जताते और हज़रत अली को अपना नेता और इमाम मान लेते तो पैग़म्बरे इस्लाम के कथानानुसार लोक परलोक में उनके लिए भलाई और शांति होती और फिर कोई भी वर्चस्वादी गुट इस्लामी समाज पर नियंत्रण करने का प्रयास न करता और मुसलमानों पर अनुकंपाओं और विभूतियों की वर्षा नहीं रुकती।

इस्लाम धर्म के उदय के काल में मुसलमानों के आलस और उनकी निश्चेतना को पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन में भलिभांति देखा जा सकता है। पैग़म्बरे इस्लाम कहते हैं कि ईश्वर उस व्यक्ति से बहुत अधिक क्रोधित होता है जो धर्म पर विश्वास न रखता हो, वहां पर मौजूद एक किसी ने बड़े आश्चर्य से पूछा कि या रसूल्लाह, जो व्यक्ति धर्म पर विश्वास नहीं रखता है वह कौन है? तब पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया कि जो व्यक्ति दूसरे को अच्छाई का आदेश नहीं देता और बुराई से नहीं रोकता। लंदन में रहने वाले भारत के प्रसिद्ध धर्मगुरु मौलाना अक़ीलुल ग़रवी दूसरों को अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने को बहुत ही अच्छे तरीक़े से समझाते हैं। 

अब सवाल यह पैदा होता है कि किसी प्रकार एक व्यक्ति ईमान से संपन्न हो और धर्मावल्बी होने का दावा भी करे और सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बुराईयों से निश्चेत भी रहे और मार्गदर्शन और आपत्ति पर अपनी ज़बान न खोले। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मार्ग को जारी रखने वाले हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने हाथ, ज़बान और दिल से, बुराईयों और मूल्यहीन चीज़ों के विरोध में अपनी ज़बान न खोले, कोई भी प्रतिक्रया व्यक्त न करे, वह मुर्दा इंसानों की भांति है जो इंसानों के बीच ज़िंदगी गुज़ार रहा है।

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपना रास्ता जारी रखने वाला बताया है। वह कहते हैं कि मुसलमानों में दो गुट हैं यदि सुधर जाएं तो पूरे मुसलमान सुधर जाएंगे और अगर बिगड़ जाएं तो पूरा मुस्लिम समाज बिगड़ जाएगा, किसी ने उनसे पूछा कि वह दो गुट कौन हैं? उनका कहना था कि धर्मगुरु और नेता। मुंबई ख़ोजा मस्जिद के इमामे जुमा मौलाना अहमद अली आब्दी का कहना है कि यह अच्छाई का आदेश देना और बुराई से रोकना अनिवार्य है और अब लोगों की क्या ज़िम्मेदारी है। (आब्दी)

पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन से बहुत अच्छी तरह यह बात स्पष्ट हो जाती है कि समाज के प्रबंधन में धार्मिक नेतृत्व की भूमिका, नेताओं और सरदारों से कहीं अधिक है क्योंकि धर्मगुरु अपने ज्ञानी दृष्टिकोणों से जनमत को प्रकाशमयी बना सकते हैं और अत्याचारियों के हाथ में सत्ता की बागडोर जाने से रोक सकते हैं। पवित्र क़ुरआन के सूरए मायदा की आयत संख्या 62 में भी कुछ समाजों में धार्मिक नेतृत्व की भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि आख़िर उन्हें अल्लाह वाले और धर्मगुरु उनके झूठ बोलने और हराम खाने से क्यों नहीं मना करते, निश्चित रूप से बहुत बुरा कर रहे हैं। पवित्र क़ुरआन में इस प्रकार के धर्मगुरुओं की कड़े शब्दों में निंदा की गयी है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम और क़ुरआन की आयतों की छत्रछाया में मिना में मुआविया के मरने से दो साल पहले पैग़म्बरे इस्लाम (स) के 200 साथियों और लगभग 500 लोग उनके बाद वालों को संबोधित करते हुए एक विस्तृत भाषण दिया था जो आज तक इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा हुआ है और उसमें भी उन्होंने धर्मगुरुओं की ज़िम्मेदारियों और उनके भटकाए जाने की ओर इशारा किया था।  

 

क़ासिम इमाम हसन बिन अली (अ) के बेटे थे और आप की माता का नाम “नरगिस” था मक़तल की पुस्तकों ने लिखा है कि आप एक सुंदर और ख़ूबसरत चेहरे वाले नौजवान थे और आपका चेहरा चंद्रमा की भाति चमकता था।

क़ासिम बिन हसन कर्बला के मैदान में अपने चचा की तरफ़ से लड़ने वाले थे आपने 13 या 14 साल की आयु में यज़ीद की हज़ारों के सेना के साथ युद्ध किया और शहीद हुए।

अबू मख़नफ़ हमीद बिन मुसलिम के माध्यम से कहता है कि हमीद ने रिवायत कीः हुसैन के साथियों में से एक लड़का जो ऐसा लगता था कि जैसे चाँद का टुकड़ा हो बाहर आया उसके हाथ में तलवार थी एक कुर्ता पहन रखा था और उसने जूता पहन रखा था जिसकी एक डोरी काटी गई थी और मैं कभी भी यह नही भूल सकता कि वह उसके बाएं पैरा का जूता था। लंदन में मौजूद पाकिस्तान के मौलाना अली रज़ा रिज़वी साहब क़ासिम इब्ने हसन की शहादत यूं बयान करते हैं। 

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