Sep ०१, २०२० १३:५५ Asia/Kolkata

दोस्तो आज नवीं मुहर्रम है। आज ही के दिन को तासूआ कहा जाता है।

इस दिन उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद के सैनिकों से मैदाने कर्बला भर दिया और सैनिकों की गतिविधियां यह बयान कर रही थीं कि वह जंग शुरु करने वाले हैं और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावान साथियों को या झुकने पर मजबूर कर दें या उनके साथ किसी तरह का समझौता कर ले, या एक पाश्विक हमले में सारे लोगों का काम तमाम कर दें।

हालात को देखते हुए हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीदी सेना के कमान्डर के पास अपना एक प्रतिनिधि भेजा और एक रात की मोहलत मांगी ताकि इस रात अपने पालनहार के समक्ष उपस्थित हों और अपने पापों का प्रायश्चित करें। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने एक रात की मोहलत लेकर क़ुरआन की तिलावत की और ईश्वर से अपने दिल के दर्द को बयान किया। रिवायत में मिलता है कि अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला के मैदान में एक रात की मोहलत न मांगी होती तो ओबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद की सेना नवीं मुहर्रम को ही इमाम हुसैन और उनके साथियों पर हमला कर देती क्योंकि यज़ीदी सेना जंग के लिए पूरी तरह तैयार थी लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने एक दिन की मोहलत लेकर कर्बला की हृदय विदारक घटना को एक दिन के लिए टाल दिया।  

 

आशूरा की रात जहां कर्बला के तपते हुए मैदान की सन्नाटी रात में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावान साथियों के तंबुओं से क़ुरआने मजीद की तिलावत और अल्लाह की इबादत की आवाज़ सुनाई दे रही थी वहीं यज़ीदी सेना के तंबू में ख़ुशियों के नगाड़े बज रहे हैं और सैनिक कल होने वाली जंग के लिए अपनी तलवारों पर धार रख रहे थे, और जंग के लिए तैयार हो रहे थे।

कर्बला की जंग, दो शहज़ादों की जंग नहीं थी जैसा कि कुछ लोग कर्बला की जंग के लक्ष्य को बदलने के लिए करते हैं। कर्बला की जंग सत्य और असत्य के बीच जंग थी। कर्बला की जंग हमको यह बताती है कि सत्य और असत्य के बीच हमेशा से टकराव रहता है और रहेगा।  इस्लाम धर्म की विशेषता वह अपने सत्य के अनुयायियों से कहता है कि असत्य के मोर्चे से निश्चेत न रहो और उससे टकराने के लिए कम कस लो।

ईश्वर सत्य के अनुयाइयों से कहता है कि वह सत्त के मोर्चे की विजय के लिए मैदान में कूद पड़ें। पवित्र क़ुरआन में इसे जेहाद का नाम दिया और इस्लामी संस्कृति में जेहाद के अर्थ प्रयास और कोशिश करना तथा हर क्षेत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक मंच पर जागरूक ढंग से उपस्थित हैं।

जेहाद के महत्व के बारे में पवित्र क़ुरआन के सूरए तौबा की आयत संख्या 41 में ईश्वर कहता है कि (जेहाद के मैदान की ओर) निकल पड़ो चाहे जेहाद तुम्हारे लिए सरल हो या कठिन। और ईश्वर के मार्ग में अपने माल और जान के साथ जेहाद करो कि यही तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो।

ये आयत कहती है कि जेहाद का आदेश आ चुका है और तुम जिस स्थिति में भी हो तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए, चाहे सरल हो या कठिन, चाहे माल के बलिदान के साथ हो या प्राणों की आहूति के साथ। ईश्वर के धर्म और पैग़म्बर की रक्षा, इन सबसे बढ़ कर है। इसके अतिरिक्त यह आदेश, झूठे दावे करने वालों और वास्तविक ईमान वालों की पहचान के लिए एक परीक्षा थी कि वे ईश्वर के मार्ग में अपनी जान, माल, बच्चों तथा घर बार का बलिदान देने के लिए कितना तैयार हैं। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के कथनों में जेहाद और उसके महत्व पर बहुत अधिक बल दिया गया है।

 

हुसैन इब्ने अली का पालन पोषण पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली की गोद में हुआ और उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ख़िलाफ़त के काल में अनेक युद्धों में भाग लिया और ज़बरदस्त वीरता का प्रदर्शन किया। वह जेहाद के बारे में कहते हैं कि ईश्वर ने जेहाद को अनिवार्य किया है और उसको मूल्यवान और बड़ा क़रा दिया है और उसको लोगों का सहायक व दोस्त क़रार दिया, ईश्वर की सौगंध, धर्म और संसार में ईश्वर के मार्ग में जेहाद के अलावा सुधार पैदा नहीं हो सकता।

आशूरा की रात जैसे जैसे रात गुज़र रही थी हज़रत इमाम हुसैन की बहन ज़ैनब का दिल घबराता जा रहा था कि सुबह यह घर तबाह हो जाएगा, मेरे नाना की निशानी ख़ून में लथपथ हो जाएगी और कर्बला की धरती पर सबसे घोर अपराध होगा।

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