Sep ०१, २०२० १६:२४ Asia/Kolkata

दोस्तो आज मुहर्रम की दस तारीख़ है। आज ही के दिन अल्लाह के सबसे बेहतरीन बंदे हुसैन इब्ने अली शहीद हुए।

पूरी दुनिया में हर शहर और हर क़स्बे की सड़कों और गली कूचों में कर्बला वालों की याद में सबीलें लगी हुई हैं और मातमी दस्ते चिकित्सा प्रोटोकोल का ख़याल रखते हुए शहीदों के सरदार का शोक मना रहे हैं।  यद्यपि कोरोना वायरस के क़हर की वजह से पूरी दुनिया मानो ठहर सी गयी है लेकिन इमाम हुसैन का शोक मनाने वाले चिकित्सा सिद्धांतों पर अमल करते हुए शोक मना रहे हैं लेकिन यह वायरस हुसैनियों के हौसलों को पस्त नहीं कर सका। कर्बला के तपते हुए मरुस्थल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावासन साथियों, बच्चों और महिलाओं के ख़ैमे खुले आसमान में लगे हुए हैं।

हर साल की तरह इस साल भी बच्चे, बूढ़े और जवान बड़े ही जोश व ख़रोश के साथ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मजिलसों और जूलूसों में शामिल होकर हुसैनी मार्ग पर चलने का संकल्प दोहरा रहे हैं। अत्याचार के आगे सिर न झुकाना हुसैनी मार्ग है, असत्य पर ख़ामोश न रहना, हुसैनी रास्ता है, इज़्ज़त से जीना, हुसैनी मार्ग है, वर्चस्व को नकाराना हुसैनी मार्ग है, मज़लूमों की मदद करना, हुसैनी शैली है।

क्या कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अलैहिस्लाम और उनके निष्ठावान साथियों को घेरने वालों को पता नहीं था कि वह किस के नवासे को घेर कर लाए हैं, क्या उनको यह पता नहीं था कि यह किसका बेटा है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला के तपते सहरा में अपने निष्ठावान साथियों, बच्चों और जवानों की क़ुरबानी पेश करके इस्लाम को बचा लिया, यज़ीद ने सत्ता संभालते ही राजगद्दी पर बैठकर खुल्लम खुल्ला यह एलान कर दिया कि बनी हाशिम ने सत्ता के साथ खिलवाड़ किया, तो कोई ईश्वरीय दूत आया और न ही कोई वहि आई।

यज़ीद का दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा था, अब उसने इमाम हुसैन को अपनी बैयत के लिए बुलाया लेकिन इमाम ने साफ़ शब्दों में इनकार कर दिया, यह पाकिस्तान थीं, महिला बुद्धिजीवी डाक्टर ख़ानुम सकीना महदवी साहिबा। यज़ीद और उसके साथियों ने इमाम को पवित्र नगर मदीने में न रहने दिया, रक्तपात से बचने के लिए वह मक्के की ओर निकल गये लेकिन जब पता चला कि यहां पर यज़ीदी जासूस उनकी हत्या के प्रयास में हैं तो उन्होंने कर्बला की ओर यात्रा का फ़ैसला किया।

कर्बला पहुंचने के बाद इमाम हुसैन और उनके निष्ठावान साथियों को घेर लिया गया और ऐसी जंग हुई जिसमें हुसैनियों ने अपने ख़ून से खंजरों की धार मोड़ दी। कर्बला के तपते सहरा में इतनी कठिनाइयां सहन करने के बावजूद किसी एक बच्चे ने यह नहीं कहा कि इमाम, यज़ीद की बैयत कर लें, क्योंकि हुसैन के साथियों को यह पता था कि सत्य किधर है और धोखा किधर है।

दोस्तो आशूर का दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के जवान पुत्र अली अकबर की अज़ान से शुरु होता है।  इमाम हुसैन का एक साथी उनके पास आता है और पूरी जागरूकता और समझदारी से इमाम से रणक्षेत्र में जाने की अनुमति लेता है और हंसते हुए इस्लाम पर अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है।  जब सारे साथी और निकटवर्ती, बच्चे और भाई शहीद हो गये तो इमाम अलैहिस्सलाम अकेले बचे, कभी दाएं देखते हैं और कभी बाएं देखते हैं, और आसमान की ओर देखकर चीख़ कर पुकाना, अपमान मुझसे दूर है, घोड़े पर सवार हुए और मैदाने जंग का रुख़ किया।

जब लश्करे यज़ीद के समक्ष पहुंचे तो यज़ीदी सेना को संबोधित करते हुए ईश्वर की सराहना की और यज़ीदी सेना को बहुत समझाने बुझाने की कोशिश की और कहा कि मैंने कोई अपराध तो नहीं किया जो तुम सब मेरी हत्या पर तुले हो, इस पर यज़ीदी सेना की ओर से कोई जवाब नहीं आया, लेकिन यज़ीदी सेना कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थी। फिर इमाम हुसैन ने जंग शुरु की और उनके चेहरे पर शहादत का शौक़ साफ़ दिखाई पड़ रहा था। आशूर के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अकेले की जंग और शहादत को पाकिस्तान के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकार अल्लामा तालिब जौहरी यूं बयान करते हैं।

टैग्स