Oct १४, २०२० १८:४३ Asia/Kolkata

ईश्वरीय दूतों की जीवन शैली शहादत प्रेम पर आधारित रही है और वे हमेशा न्याय के आधार पर ज़मीन पर ईश्वरीय आदेशों को लागू करने के प्रयास में थे और इसके लिए वह अनथक प्रयास भी करते थे।

इसी प्रकार ईश्वरीय दूत महान ईश्वर की शिक्षाओं को लागू करने के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट अपने समय के अत्याचारियों से मुकाबला भी करते थे और उनके ग़लत कार्यों पर कभी भी मौन धारण नहीं करते थे। इमामों ने भी ईश्वरीय दूतों का अनुसरण करते हुए ईश्वरीय धर्म और उसकी शिक्षाओं के प्रचार- प्रसार में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया। इमामों ने भी पैग़म्बरों के सदाचरण पर अमल करते हुए अपने समय के अत्याचारी शासकों से मुकाबला किया और कभी भी उनके ग़लत कार्यों पर मौन धारण नहीं किया और अत्याचारी शासकों से मुकाबले में उन्होंने शहादत भी गले लगाई। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला के तपते मरुस्थल में आशूर के दिन अपनी, अपने परिजनों और अपने वफ़ादार साथियों की जो अमर क़ुर्बानी दी उसे इसी दिशा में देखा जा सकता है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की पावन जीवन शैली और उनके महांदोलन का स्रोत हज़रत अली अलैहिस्सलाम  की जीवनी थी और हज़रत अली अलैहिस्सलाम का प्रेरणास्रोत पैग़म्बरे इस्लाम का सदाचरण था। स्वयं इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा था कि उनके आंदोलन का उद्देश्य अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम और पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम की उम्मत में सुधार था। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे इब्राहीम की आरंभिक आयतों में कहता है कि पैग़म्बरों के भेजने का उद्देश्य इंसान का मार्गदर्शन है। महान ईश्वर सूरे इब्राहीम की पहली आयत में कहता है कि लोगों को अज्ञानत व गुमराही के अंधकार से बाहर निकालना पैग़म्बरों का एक दायित्व है। पवित्र कुरआन में महान ईश्वर कहता है। ”यह किताब मैंने तुम पर नाज़िल की है ताकि तुम लोगों को उनके पालनहार के आदेश से गुमराही से प्रकाश में लाओ, उस ईश्वर की राह की ओर जो बहुत ही शक्तिशाली और प्रशंसनीय है। इसी प्रकार महान ईश्वर सूरे इब्राहीम की 5वीं आयत में पैग़म्बरे इस्लाम से कहता है कि इससे पहले उसने मूसा को भी आदेश दिया था कि वह लोगों को गुमराही से बाहर निकालें और प्रकाश की ओर उनका मार्गदर्शन करें। महान ईश्वर कहता है कि बेशक हमने मूसा को अपनी आयतों व निशानियों के साथ भेजा और कहा कि तुम अपनी क़ौम को गुमराही से प्रकाश में लाओ और ईश्वर के दिनों की याद उन्हें दिलाओ! कि इसमें शुक्र करने वाले धैर्यवानों के लिए निशानियां हैं।

इसके अलावा महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे हदीद की 25वीं आयत में कहता है कि पैग़म्बरों और आसमानी किताबों के भेजने का उद्देश्य ज़मीन पर न्याय लागू करना है। महान ईश्वर कहता है। “हमने अपने पैग़म्बरों को स्पष्ट तर्कों के साथ भेजा है और उनके साथ आसमानी किताबें और सत्य- असत्य की पहचान का मापदंड नाज़िल किया है ताकि लोग न्याय से काम लें और हमने लोहा नाज़िल किया है कि उसमें बहुत शक्ति और लोगों के लिए बहुत फाएदे हैं और ईश्वर यह जान जाये कि कौन उसकी और उसके पैग़म्बरों की मदद करता है। बेशक ईश्वर बहुत शक्तिशाली है। इन दोनों आयतों के अर्थों पर ध्यान देने से हम इस बात को समझ सकते हैं कि महान ईश्वर ने पैग़म्बरों को जो भेजा है उससे उसका उद्देश्य लोगों का मार्गदर्शन है और लोगों के मध्य न्याय की स्थापना है।

यहां इस बिन्दु का उल्लेख ज़रूरी है कि लोगों के मार्गदर्शन, उनकी प्रगति और समाज में न्याय स्थापित करने के लिए सरकार का गठन आवश्यक है क्योंकि जिस समाज में सरकार न हो वहां के लोगों के मध्य न्याय की स्थापन न केवल कठिन बल्कि लगभग असंभव है क्योंकि सरकार न होने की स्थिति में कोई किसी से नहीं डरेगा और जिसका जो दिल चाहेगा वह करेगा। दूसरे शब्दों में जहां के लोगों पर किसी किस्म का अंकुश नहीं होगा उनके मध्य न्याय की स्थापना लगभग असंभव है। पूरे इतिहास में एक भी उदाहरण एसा नहीं मिलेगा कि जहां कोई सरकार न रही हो और वहां पूरे समाज में न्याय स्थापित हो गया हो। अगर कोई किसी समाज का कल्याण चाहता है और यह चाहता है कि उस समाज में ईश्वरीय शिक्षायें लागू हों तो वहां पर एक सरकार का गठन न केवल ज़रूरी बल्कि वाजिब है। इसलिए कि सरकार के बिना लोग निरंकुश होंगे और जब तक लोगों पर अंकुश नहीं होगा तब तक समाज मुक्ति व कल्याण के मार्ग का अनुपालन नहीं करेगा। इसी प्रकार महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन के सूरे आराफ़ में पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण को समाज को प्रकाशित करने वाला बताया है और कहा है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कृपालु व महान ईश्वर की शिक्षाओं को लाकर लोगों को मुक्ति प्रदान की है। महान ईश्वर कहता है। “जो लोग उस पैग़म्बर का अनुसरण करते हैं जिसने किसी के पास जाकर शिक्षा ग्रहण नहीं की है और वे लोग उसका नाम तौरात और इंजील में लिखा पाते हैं वह उन्हें अच्छाई का आदेश देता है और बुराई से रोकता है और उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल और बुरी चीज़ों को हराम करता है और उनके ऊपर जो बोझ था उसे हटा देता है तो जो लोग उस पर ईमान लाये और उसे अज़ीज़ समझा और उसकी मदद की और उस प्रकाश का अनुसरण किया जो उसके साथ नाज़िल किया गया है तो यही लोग कल्याण व मुक्ति पाने वाले हैं।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जो लोग इस्लामी समाज के आदर्श होते हैं उन्हें अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना होता है और उनका जीवन उतार- चढ़ाव से भरा होता है और उन्हें चाहिये कि वह हर वक्त महान ईश्वर से मदद मांगे। इसी प्रकार जो लोग या जो हस्तियां लोगों के लिए आदर्श होती हैं उन्हें उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में दुश्मनों और उनके शैतानी षडयंत्रों से कदापि नहीं डरना चाहिये। वास्तव में जो हस्तियां या ईश्वरीय दूत लोगों के लिए आदर्श होते हैं वे अत्याचारियों से लेशमात्र भी नहीं डरते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का पूरा विश्वास होता है कि महान ईश्वर और उसकी मदद उनके साथ है। उदाहरण के तौर पर ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम की जीवनी देख सकते हैं। वह मौत से लेशमात्र भी भयभीत नहीं हुए जबकि समय के अत्याचारी शासक नमरूद ने उन्हें बुरी तरह मारने और आग में डालने की धमकी दी थी। क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था कि महान व सर्वसर्मथ ईश्वर सब कुछ देख रहा है और जब वह उचित समझेगा उनकी मदद अवश्य करेगा। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की नज़र में महान ईश्वर की राह में मरना कोई दुःख की बात नहीं है कि वह उससे मदद मांगे कि मौत से उन्हें बचा ले और नमरूद और उसके चाहने वाले उन्हें न जलायें। हज़रत इब्राहीम की जीवनी इस बात की सूचक है कि महान ईश्वर की राह में शहादत से वह लेशमात्र भी नहीं डरते थे। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी अपने पूर्वजों का अनुसरण किया और महान ईश्वर की प्रसन्नता के मार्ग में अनगिनत समस्याओं का सामना किया और उनके अमर महाआंदोल का उद्देश्य लोगों का सुधार था। इसी कारण जब वह पवित्र नगर मदीना से कूफा की ओर रवाना हुए तो एक एतिहासिक भाषण दिया और लोगों को ईश्वर की राह में शहादत के लिए प्रोत्साहित किया। ईश्वर की राह में मौत भार नहीं है बल्कि सुन्दरता का आभूषण है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह बयान इस बात का सूचक है कि उनका भी रास्ता उनके पूर्वज हज़रत इब्राहीम का रास्ता था और इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि उन्हें आग में डाल दिया या तलवारों से शहीद कर दिया जाये। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की संतान ने भी अपने पूर्वज हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की जीवन शैली अपनाई। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की संतान को आशूर की एतिहासिक घटना के बाद बहुत सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा परंतु वे कभी भी अत्याचारियों के समक्ष नतमस्तक नहीं हुए और कभी भी अमवी सरकार की अत्याचारी नीतियों पर मौन धारण नहीं किया यहां तक कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सुपुत्र और चौथे इमाम, इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने शाम में अत्याचारी व धर्मभ्रष्ट शासक यज़ीद के दरबार में एतिहासिक भाषण दिया। यही नहीं इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने जीवन भर कर्बला के महांदोलन के संदेशों, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों और उनके परिजनों पर पड़ने वाली मुसीबतों को बयान किया।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन मानवीय व इस्लामी था और इस्लाम एक व्यापक धर्म है इस आधार पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन बहुआयामी सुधार के लिए था जिस तरह से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के नाना, पिता और भाई की पूरी जीवनी लोगों की भलाई और उनके सुधार के लिए थी। कोई भी सुधार संघर्ष के बिना नहीं होता और उसके लिए बड़ी- बड़ी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी वसीयत में कहा है कि मेरे आंदोलन का उद्देश्य अपने नाना और पिता की उम्मत में केवल सुधार करना है। इसी प्रकार वह अपनी वसीयत में कहते हैं कि क्या नहीं देख रहे हो कि हक पर अमल नहीं हो रहा है और बातिल व ग़लत से रोका नहीं जा रहा है। ईश्वरीय दूतों के आंदोलन के बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आंदोलन करके विश्व वासियों को यह बता दिया कि हक और बातिल के बीच संघर्ष खत्म नहीं हुआ है और महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने और बातिल का मुकाबला करने के लिए जान व माल की कुर्बानी भी देनी पड़ती है और कर्बला के तपते मरुस्थल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर मुसीबतों के पहाड़ ढ़ाये गये परंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सत्य के रास्ते में कुर्बानी देने में लेशमात्र भी संकोच से काम नहीं लिया।

पवित्र कुरआन में एसी भी आयतें हैं जो इस बात की सूचक हैं कि समय के अत्याचारियों ने बहुत से ईश्वरीय दूतों की हत्या की है परंतु ईश्वरीय दूत कभी अत्याचार और अत्याचारियों के मुकाबले से पीछे नहीं हटे और इस मार्ग में उन्होंने अपने प्राणों की कुर्बानी दे दी। उदारण के तौर पर हम पवित्र कुरआन के सूरे बकरा की 61वीं आयत में देखते हैं जिसमें बनी इस्राईल द्वारा पैग़म्बरों की हत्या की ओर संकेत किया गया है। महान ईश्वर कहता है कि नाहक़ नबियों की हत्या करते थे। पवित्र कुरआन की इस आयत से भली-भांति समझा जा सकता है कि न्याय की बात करने, अत्याचार और अत्याचारियों का विरोध करने के कारण वे नबियों की हत्या करते थे और अगर ईश्वरीय दूत अत्याचारियों का विरोध न करते तो अत्याचारी उनकी हत्या न करते पर नबियों, पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों ने कभी भी अत्याचारियों के समक्ष मौन धारण नहीं किया और कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने वफादार साथियों के साथ जो अमर कुर्बानी दी वह इसी सिलसिले की एक कड़ी थी और उसे भी इसी दिशा में देखा जा सकता है।

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