Apr ०५, २०२१ १८:५७ Asia/Kolkata

ईरान और भारत के संबंध सदियों नहीं बल्कि हज़ारों बरस पुराने हैं और यह संबंध जनता और सरकार दोनों स्तर पर हमेशा से मज़बूत रहे हैं। दोनों राष्ट्रों के बीच जो सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है, उसने इन रिश्तों और और अधिक मज़बूती प्रदान की है।

जैसे जैसे समय बीतता गया, वैसे वैसे यह रिश्ते अन्य मैदान में भी फैलते और मज़बूत होते गए। दोनों देश विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी एक दूसरे के साथ भरपूर सहयोग करते रहे हैं। इसी के साथ व्यापारिक मैदान में भी दोनों देशों के रिश्ते बड़े पुराने हैं और अब भी ईरान व भारत एक दूसरे के बड़े व्यापारिक साझेदार माने जाते हैं। ईरानी संसद के पूर्व सभापति एवं फ़ार्सी भाषा विद् डॉक्टर हद्दाद आदिल ने एक कार्यक्रम में कहा था कि ईरान और भारत के संबंधों की जड़ें बहुत ही पुरानी और मज़बूत हैं और भविष्य में भी दोनों देश और मज़बूत बनाने के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016 में तेहरान आए थे और तब भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय आवाजाही मार्ग विकसित करने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। नई दिल्ली और तेहरान चाबहार बंदरगाह को अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) से जोड़ना चाहते हैं। आईएनएसटीसी भारत, ईरान और रूस के साथ-साथ मध्य एशियाई देशों और यूरोप को जोड़ने वाला एक व्यापारिक मार्ग है जिसमें जल परिवहन, रेल और सड़क परिवहन शामिल हैं। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस दौरे के दौरान कहा था कि ईरान व भारत हमेशा से दोस्त और साझेदार रहे हैं।

ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने सन 2018 में भारत की यात्रा की थी जिसके दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए। इनमें भारत के सहयोग से बन रहे चाबहार पोर्ट को लेकर काफ़ी अहम समझौता हुआ था। इससे नई दिल्ली को अपने पड़ोसी देशों और उनके ज़रिए दुनिया के एक बड़े हिस्से तक पहुंच बनाने में काफ़ी मदद मिलेगी। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति डॉक्टर हसन रूहानी की भारत यात्रा पर इन शब्दों के साथ उनका स्वागत किया था। वहीं ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर हसन रूहानी ने भी मोदी सहित भारत की जनता का उनका भव्य स्वागत करने पर धन्यवाद किया था।

ईरान, भारत को तेल निर्यात करने वाले तीन अहम देशों में से एक है जबकि ईरान की चाबहार बंदरगाह के विकास की परियोजना में भारत का हिस्सा सबसे ज़्यादा है। ये बातें इन दोनों देशों के गहरे आपसी रिश्तों का प्रमाण हैं। दोनों देशों के यह गहरे संबंध कुछ सरकारों को नहीं भाते जिनमें अमरीका व इस्राईल की सरकारें सबसे ऊपर हैं। ये दोनों सरकारें हमेशा तेहरान व दिल्ली के आपसी रिश्तों को बिगाड़ने की साज़िशें करती रहती हैं। पिछले दस बरसों में दिल्ली में स्थित इस्राईली दूतावास के क़रीब हुए दो हल्के धमाकों में ईरान को लिप्त बताना, इसी साज़िश की एक कड़ी है। अलबत्ता सोचने वाली बात यह है कि ईरान, जो हमेशा भारत के साथ अच्छे व मधुर संबंधों पर बल देता है, उसे किस तरह इन धमाकों से फ़ायदा हो सकता है? इसी तरह यह भी सोचना चाहिए कि इन धमाकों से किस को फ़ायदा पहुंच रहा है? इसी तरह अमरीका ने भी ईरान से भारत के संबंधों को बिगाड़ने की बहुत कोशिश की और ईरान पर लगे प्रतिबंधों के अंतर्गत उसने भारत पर दबाव डाल कर उससे ईरान से तेल का निर्यात कम करने की मांग की। हालांकि भारत की विदेश नीति स्वाधीन है और किसी तीसरे देश के कहने पर वह किसी भी देश से अपने संबंधों को ख़राब नहीं करेगा। अलबत्ता भारत में सत्ता के गलियारों में कुछ लोग अमरीका की हां में हां मिलाने को आतुर रहते हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है।

ईरान व भारत के बीच सदियों पुराने आर्थिक, व्यापारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। जहां भारत ईरान से तेल व गैसे ख़रीदता है, वहीं ईरान भारत से दवाएं, भारी मशीनें, कल-पुर्ज़े और अनाज लेता है। सामरिक तौर भी दोनों देश एक दूसरे के पुराने सहयोगी रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया व पश्चिमी एशिया में दोनों देशों के साझा सामरिक हित हैं। ऐसे में दोनों देशों के संबंधों को अधिक से अधिक मज़बूत बनाना दोनों के लिए ज़रूरी है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ईरान व भारत के संबंध हमेशा दोस्ताना रहे हैं और हज़ारों बरसों से जारी इन संबंधों के अधिक प्रगाढ़ होने के अनेक कारण हैं जिनमें से एक चाबहार परियोजना है। कुछ समय पहले भारत ने चाबहार दिवस मना कर जहां इस परियोजना की अहमियत को दर्शा दिया है वहीं दोनों देशों के संबंधों को दुश्मनों को यह संदेश भी दे दिया है कि कोई भी साज़िश और कोई भी चाल ईरान व भारत के रिश्तों को कमज़ोर नहीं कर सकती।

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