Apr २८, २०२२ १५:१८ Asia/Kolkata

वर्ष 1948 में जायोनी शासन ने अपने अवैध अस्तित्व की घोषणा की थी तब से जायोनी शासन ने फिलिस्तीनी राष्ट्र के खिलाफ खुल्लम- खुल्ला अत्याचार व अपराध आरंभ कर दिया जो आज तक जारी हैं।

ऐसा नहीं है कि इस्राईल के अवैध अस्तित्व की घोषणा से पहले फिलिस्तीनी राष्ट्र पर अत्याचार नहीं होते थे बल्कि उसके पहले भी हो रहे थे। दूसरे शब्दों में फिलिस्तीनी राष्ट्र पर अत्याचार ही का नतीजा था कि इस्राईल ने अपने अवैध अस्तित्व की घोषणा की और इस काम की भूमि ब्रिटेन ने समतल की थी।

इस्राईल द्वारा अपने अवैध अस्तित्व की घोषणा किये हुए 73 साल से अधिक का समय हो रहा है। दूसरे शब्दों में फिलिस्तीनी राष्ट्र के खिलाफ इस्राईल के अत्याचारों को आरंभ हुए 73 साल से अधिक का समय हो रहा है। इन वर्षों में इस्राईल चालिस लाख से अधिक फिलिस्तीनियों को उनकी मातृभूमि से बाहर निकाल चुका है और ये फिलिस्तीनी दूसरे देशों में बहुत ही दयनीय दशा में शरणार्थी का जीवन बिता रहे हैं। अगर फिलिस्तीनी इस्राईल की दमनकारी व आतंकी कार्यवाहियों के जवाब में चार जायोनियों को घायल कर देते हुए हैं तो इसकी खबर मिडिया में आ जाती है परंतु इस्राईल ने चालिस लाख से अधिकि फिलिस्तीनियों को उनकी मातृभूमि से निकाल रखा है इसकी खबर दुनिया के किसी मिडिया में नहीं आती है। यही नहीं इस्राईल इन बेघर फिलिस्तीनियों को अपनी मातृभूमि में वापसी का भी अधिकार नहीं दे रहा है और मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वाले इस्राईल के समर्थन में पूरी तरह अर्थपूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं।

इस्राईल ने जिन चालिस लाख से अधिक फिलिस्तीनियों को उनकी मातृभूमि से निकाल दिया है उनके घरों, खेतों और बागों आदि को दूसरे देशों से लाकर अवैध अधिकृत फिलिस्तीन में बसाये गये जायोनियों व यहूदियों को दे दिया है। इतनी बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों के अधिकारों को जायोनियों को दिये जाने पर मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वालों को सांप सूंघ गया है और वे सब अपनी आंखे मूंदे हुए हैं।

 

यही नहीं वर्ष 1948 से अब तक शायद ही कोई एसा हफ्ता गुज़रा हो जब जायोनी सैनिकों ने किसी फिलिस्तीनी को शहीद व घायल न किया हो। कई हज़ार फिलिस्तीनी इस्राईल की जेलों में बंद हैं जिनमें महिलायें और बच्चे भी शामिल हैं। जायोनी सैनिक अब तक कई हज़ार फिलिस्तीनियों के मकानों को उनकी नज़रों के सामने ध्वस्त कर चुके हैं और फिलिस्तीनियों द्वारा आपत्ति जताने पर उनके साथ क्रूरतम व्यवहार किया जाता है।

ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रह. ने विश्व समुदाय का ध्यान फिलिस्तीनियों पर हो रहे अत्याचारों की ओर दिलाने के लिए रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को विश्व कुद्स दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा की। इस वक्त प्रतिवर्ष रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को फिलिस्तीनियों और मस्जिदुल अक्सा के समर्थन में हज़ारों जुलूस और रैलियां निकाली जाती हैं। इन रैलियों में न केवल मुसलमान भाग लेते हैं बल्कि दुनिया के बहुत से स्वतंत्रता और न्याय प्रेमी ग़ैर मुसलमान भी भाग लेते हैं। दुनिया के बहुत से देशों में इस्राईल के अत्याचारों के खिलाफ और फिलिस्तीनियों और मस्जिदुल अक्सा के समर्थन में रैलियों का निकाला जाना इस बात का सूचक है कि फिलिस्तीन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय रूप धारण कर चुका है हालांकि जायोनी शासन और उसके समर्थक इस बात को बिल्कुल पसंद नहीं करते। वे फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान अपनी इच्छानुसार करना चाहते हैं। सेंचुरी डील को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। इस डील में कहीं भी दूसरे देशों में शरणार्थी का जीवन बिता रहे फिलिस्तीनियों की समस्याओं और उनकी स्वदेश वापसी का उल्लेख तक नहीं किया गया है।

कितनी अजीब बात है कि जो फिलिस्तीनी अपनी मातृभूमि की रक्षा और अपने वैध अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं उन्हें इस्राईल और उसके समर्थक आतंकवादी कहते हैं और जो लोग दूसरे देशों व क्षेत्रों से लाकर अवैध अधिकृत फिलिस्तीन में बसा दिये गये हैं उनके समर्थन में कहा जाता है कि उन्हें आत्मरक्षा का अधिकार प्राप्त है! कितनी अजीब बात है कि जिन लोगों ने दूसरों की ज़मीनों, घरों और सम्पत्तियों पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर रखा है उन्हें आत्मरक्षा का अधिकार प्राप्त है? और जिन लोगों की ज़मीनों और घरों पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया गया है उन्हें न केवल आत्मरक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं है बल्कि उन्हें आतंकवादी भी कहा जाता है। यह पश्चिम और उसकी हां में हां मिलाने वालों के मानवाधिकार का आधुनिकतम रूप है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ में जब भी कोई प्रस्ताव इस्राईल के खिलाफ पेश किया जाता है तो आम तौर पर अमेरिका उसे वीटो कर देता है और अगर संयोग से कोई प्रस्ताव इस्राईल के खिलाफ पारित भी हो गया तो इस्राईल उस पर अमल ही नहीं करता। इस्राईल राष्ट्रसंघ के प्रस्तावों को कोई महत्व ही नहीं देता और उससे कोई पूछता भी नहीं कि वह राष्ट्रसंघ के प्रस्तावों पर अमल क्यों नहीं करता? इस्राईल 73 वर्षों से अधिक समय से फिलिस्तीन की मज़लूम जनता व लोगों के खिलाफ जो अपराधों व अत्याचारों को जारी रखे हुए है उसकी एक वजह यही है कि उसे दुनिया को डेमोक्रेसी और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका का व्यापक समर्थन प्राप्त है।

मस्जिदुल अक़सा

अमेरिका और कुछ शक्तियों व देशों ने राष्ट्रसंघ और सुरक्षा परिषद को अपने लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का हथकंडा बना रखा है। राष्ट्रसंघ ने अपने प्रस्तावों में कहा है कि अवैध अधिकृत फिलिस्तीन की भूमियों में कालोनियों का निर्माण ग़ैर कानूनी है और इस्राईल को इसे बंद कर देना चाहिये परंतु राष्ट्रसंघ के इस प्रस्ताव पर कभी भी अमल नहीं हुआ है। इस्राईल एक ओर तथाकथित शांतिवार्ता की बात करता है और दूसरी ओर फिलिस्तीन की हड़पी भूमियों में जायोनी कालोनियों का निर्माण करता है और मानवाधिकारों की रक्षा का राग अलापने वाला कोई भी देश उससे यह नहीं कहता है कि फिलिस्तीन की अवैध अधिकृत भूमियों में जायोनी कालोनियों का निर्माण ग़ैर कानूनी है और इस्राईल को राष्ट्रसंघ के प्रस्तावों का सम्मान करना चाहिये।

रोचक बात यह है कि जो देश अमेरिका की वर्चस्वादी नीतियों के विरोधी हैं उन्हें राष्ट्रसंघ के प्रस्तावों पर अमल करने के लिए बाध्य किया जाता है और अगर वह इस पर अमल करने में आना- कानी से काम लेता है तो उसके खिलाफ सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई जाती और दूसरे प्रस्ताव पारित कराये जाते हैं। यही नहीं जो देश राष्ट्रसंघ और सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों पर अमल करते हैं पर अगर वह प्रस्ताव अगर अमेरिका की वर्चस्ववादी नीति से मेल नहीं खाता है तो उस देश को अमेरिका के एकपक्षीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रमों के खिलाफ अमेरिका के एकपक्षीय व अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

पूरी दुनिया में विश्व कुद्स दिवस की रैलियों में लाखों लोगों का बढ़- चढ़कर भाग लेना इस बात का सूचक है कि अमेरिका, इस्राईल और पश्चिमी व कुछ अरब सरकारों की इच्छा के विपरीत फिलिस्तीन का मुद्दा ज़िन्दा है। रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को विश्व कुद्स दिवस के रूप में मनाया जाना और इस अवसर पर निकाली जाने वाली रैलियों में हज़ारों नहीं, बल्कि लाखों लोगों का भाग लेना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि लोगों में फिलिस्तीन मुद्दे के प्रति जागरुकता बढ़ रही है जबकि अमेरिका, इस्राईल और उनके पिछलग्गू देशों की पूरी कोशिश यह बताने की है कि फिलिस्तीन अरबों का मामला है इससे इस्लामी जगत का कुछ लेना देना नहीं है जबकि वास्तविकता बिल्कुल इसके विपरीत है। विश्व कुद्स दिवस के अवसर पर निकाली जाने वाली रैलियों में भारी संख्या में लोगों की उपस्थिति इस बात की भी सूचक है कि विश्व के लोग अमेरिका, जायोनी शासन और उनके पिछलग्गूओं के दुष्प्रचारों से प्रभावित नहीं हैं और दुनिया के लोग फिलिस्तीनियों और मस्जिदुल अक्सा के समर्थन में प्रदर्शन करके यह बताते हैं कि फिलिस्तीनी अकेले नहीं हैं और मस्जिदुल अक्सा और मुसलमानों के पहले किबले का संबंध केवल फिलिस्तीनियों से नहीं है बल्कि उसकी रक्षा विश्व के समस्त मुसलमानों का परम धार्मिक व मानवीय दायित्व है।

बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि कुछ अरब देश एसी स्थिति में अतिक्रमणकारी व अतिग्रहणकारी जायोनी शासन से अपने संबंधों को सामान्य बनाने की चेष्टा में लगे हुए हैं जब अवैध अधिकृत फिलिस्तीन के विभिन्न क्षेत्रों में इस्राईली आतंक अपनी चरमसीमा पर है। इस प्रकार की स्थिति में जो अरब देश जायोनी शासन से संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश में हैं वास्तव में वे फिलिस्तीनियों और उनकी आकांक्षाओं की पीठ में विश्वासघात का छुरा घोंप रहे हैं और अपने कार्यों से जायोनी शासन का दुस्साहस बढ़ा रहे हैं।

 

आज कुछ अरब देशों के शासक अपनी तानाशाही और ग़ैर लोकतांत्रिक सरकारों को बचाने और अमेरिका और इस्राईल की प्रसन्नता हासिल करने के लिए हर वह कार्य अंजाम दे रहे हैं जो वे चाह रहे हैं। क्योंकि तानाशाही सरकारों के शासक अपनी बक़ा को अमेरिका और इस्राईल की प्रसन्नता में देख रहे हैं।

फिलिस्तीनियों की ताकत को कम करने के लिए जायोनी शासन हमेशा कोई न कोई चाल चलता रहता है। इसी नीति के अंतर्गत उसने वर्ष 1993 में ओस्लो समझौता किया और इस समझौते से उसका लक्ष्य फिलिस्तीनी प्रशासन की शक्ति को सीमित करना था। इसी प्रकार जायोनी शासन ने वर्ष 1995 में इस बात की मांग कर दी कि ग़ज़्ज़ा पट्टी से लेकर जार्डन नदी के पश्चिमी किनारे तक के क्षेत्रों को तीन क्षेत्रों में बांट दिया जाये और इन तीनों क्षेत्रों के प्रबंधन को फिलिस्तीनी प्रशासन और जायोनी शासन के बीच बांट दिया जाये। इस समझौते को ओस्लो दो या क़ाहेरा समझौते के नाम से तैयार किया गया और मिस्र की राजधानी काहेरा में उस पर फिलिस्तीन की स्वशासित सरकार और जायोनी शासन ने ह्स्ताक्षर किये।

रोचक बात यह है कि जायोनी शासन इस समझौते के प्रति भी कटिबद्ध नहीं रहा। उसने इसका भी वही अंजाम किया जो इससे पहले होने वाले समझौतों का कर चुका है। बहरहाल जायोनी शासन और उसके समर्थकों के क्रिया- कलापों को देखते हुए बहुत से लोग अब इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि इस्राईल के साथ तथाकथित शांतिवार्ता करके फिलिस्तीनी अपने अधिकारों को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते और बहुत से लोगों का मानना है कि जायोनी शासन केवल शक्ति की भाषा समझता है और उससे उसी की भाषा में बात करना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। इसलिए बहुत से फिलिस्तीनी और ग़ैर फिलिस्तीनी सशस्त्र संघर्ष को ज़रूरी समझते हैं।

इसी प्रकार बहुत से लोगों का मानना है कि फिलिस्तीनी, सशस्त्र संघर्ष के बिना कभी भी अपने अधिकारों को उस अतिग्रहणकारी शासन से वापस नहीं ले सकते जिसका आधार ही लोगों की हत्या, हिंसा और अतिक्रमण है। यह फिलिस्तीनी जियालों व संघर्षकर्ताओं का साहसिक सशस्त्र प्रतिरोध है जो जायोनियों के उल्टे पलायन और इस्राईल और उसके समर्थकों के भय का कारण बना है और वह दिन अधिक दूर नहीं है जब फिलिस्तीनियों का सशस्त्र संघर्ष रंग लायेगा और ग़ैर फिलिस्तीनी भी मस्जिदुल अक्सा और मुसलमानों के पहले किबले में नमाज़ अदा करेंगे और इस्राईल और उसके समर्थकों को अब इस बात का पक्का विश्वास हो चला है कि हथियारों के बल पर दूसरों की मातृभूमि पर अधिक दिन तक शासन नहीं किया जा सकता और उन्हें उनका भविष्य नजर आने लगा है। जो जायोनी और यहूदी दूसरे देशों व क्षेत्रों से लाकर अवैध अधिकृत फिलिस्तीन में बसा दिये गये थे उनके उल्टे पलायन को इसी दिशा में देखा जा सकता है।

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