Jun २८, २०२१ १६:३२ Asia/Kolkata
  • ईरान पर इराक़ के रासायनिक हमले की बरसी, सरदश्त इलाक़े के लोग आज भी इस हमले की मार झेल रहे हैं

आजसे 34 साल पहले इराक़ की सद्दाम सरकार की सेना ने ईरान के सरदश्त इलाक़े पर केमिकल बमबारी की थी जिसमें 100 से ज़्यादा लोग शहीद हो गए थे।

29 जून 1987 ईरान के सरदश्त शहर पर केमिकल बमबारी की बरसी है जिसे ईरान में रासायनिक व जैविक हथियारों के ख़िलाफ़ संघर्ष दिवस का नाम दिया गया है। 1987 की 28 और 29 जून को इराक़ी बमबार विमानों ने सरदश्त शहर के चार घनी आबादी वाले इलाक़ों पर केमिकल बम से हमले किए जिसमें शहर और उसके आस-पास के बेगुनाह बच्ते, मर्द औरत छोटे बड़े लोग घातक गैस का निशाना बने। इसी वजह से ईरानी कैलेंडर के चौथे महीने की 8वीं तारीख़ बराबर 29 जून को रासायनिक व जैविक हथियारों के ख़िलाफ़ संघर्ष दिवस रखा गया है।

 

कैमिकल हथियार ऐसे ख़तरनाक पदार्थों से बने हथियार हैं जिनसे इंसानों या जीवों का निशाना बनाया जाता है। इन पदार्थों से किसी भी जीव के बदन के सीधे संपर्क में आने से उसका बदन दूषित हो जाता है और वह कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाता है। ये पदार्थ तरल, गैस या ठोस शक्ल में इस्तेमाल होते हैं। दूसरे शब्दों केमिकल हथियार ऐसे कंपाउंड को कहते हैं जिसे इंसान, जानवर या वनस्पति के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने पर मौत हो सकती है, शरीर की बनावट को स्थायी या अस्थायी तौर पर नुक़सान पहुंचाते हैं। केमिकल हथियार सैन्य नज़र से छह घातक गुटों में बंटे हुए हैं। इन हथियारों से शरीर के नर्वस सिस्टम पर बुरा असर पड़ता है, त्वचा पर इसके असर ज़ाहिर होते हैं और सांस लेने में मुश्किल पैदा होती है।

केमिकल व जैविक हथियारों के इस्तेमाल की इतिहास 1763 से ईसवी तक पहुचंता है, जब अमरीकियों ने रेड इंडियन्स के ख़िलाफ़ जो अमरीका के अस्ला मालिक थे, केमिकल हथियार पहली बार इस्तेमाल किए। पहले विश्व युद्ध में जर्मन फ़ौज ने केमिकल हथियार इस्तेमाल किए जिसके बाद दूसरे देशों ने अपनी सैन्य नीति में इसके इस्तेमाल को शामिल किया। जर्मन फ़ौज ने 22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम की सरहद पर पेरिस नामक इलाक़े में 1 लाख 68 हज़ार टन क्लोरिन गैस से क़रीब 5000 अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी फ़ौजियों को मौत के घाट उतारा। इस दिन को केमिकल जंग के वजूद में आने का नाम दिया गया। इसके अलावा 1917 में जर्मन फ़ौज ने पहली बार मस्टर्ड गैस का इस्तेमाल किया।

 

पहले विश्व युद्ध में कुल 1 लाख 24 हज़ार 200 टन केमिकल पदार्थ इस्तेमाल हुए जिससे 90 हज़ार लोग मारे गए और क़रीब 10 लाख घायल हुए। ये केमिकल पदार्थ बड़े पैमाने पर जनसंहारक होने के अलावा, इंसान की आने वाली नस्लों पर भी ख़तरनाक असर डालते हैं।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटेन ने 1951 में दक्षिण पूर्वी एशिया के मलय प्रायद्वीप में स्वतंत्रता संग्रामियो के ख़िलाफ़ फ़ोटोटॉक्सिन पदार्थ इस्तेमाल किया था। अमरीकियों ने वियतनाम जंग में भी केमिकल और जैविक पदार्थ इस्तेमाल किये थे। उन्होंने क्षेत्र के जंगलों में ऑरेन्ज एजेन्ट का छिड़काव किया था ताकि वेट किंग के ठिकाने मरूस्थल में बदल जाएं। इस पदार्थ का बड़ा भाग जर्मन्ज़ ने अमरीकियों को दिया था। इस घातक पदार्थ के बुरे असर दसियों साल गुज़रने के बाद अभी भी बाक़ी हैं। वियतनाम में अभी भी अपंग बच्चे पैदा होते हैं।

1979 में पूर्व सोवियत संघ की फ़ौज ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के लिए इस तरह के हथियार इस्तेमाल किए थे। दक्षिण अफ़्रीक़ा के तत्कालीन नस्लभेदी शासन ने 8 मार्च 1983 को नामीबिया में स्वापो फ़ोर्सेज़ के ख़िलाफ़ ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल किया था।

 

सद्दाम हुसैन के दौर में इराक़ी सरकार ने ईरान के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर केमिकल हथियार इस्तेमाल किए। 1976 में इराक़ी शासन ने यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों और ज़रूरी बजट के साथ केमिकल व जैविक हथियारों और रेडियो ऐक्टिव पदार्थ के बारे में जानकारी इकट्ठा शुरू की और तीनों क्षेत्र में सफलता हासिल की। सद्दाम हुसैन ने 1984 और उसके बाद, बड़े पैमाने पर ताबून केमिकल पदार्थ का इस्तेमाल किया। यह पदार्थ बड़ा महंगा था और आसानी से नहीं मिलता था। इसलिए सद्दाम शासन वीएक्स गैस बनानी शूरू की जिसका असर देर तक रहता था। सद्दाम शासन ने मस्टर्ड गैस से भी हमले किए क्योंकि इस गैस का दूरगामी असर अंधेपन, नाना प्रकार के कैंसर, बांझपन और पैदाइशी अपंग के रूप में सामने आता है।

पहली बार इराक़ की बासी सेना ने 19 अक्तूबर 1980 को ख़ूज़िस्तान प्रांत के दक्षिणी भाग पर इस्तेमाल किया। उस साल इराक़ी सेना ने चार बार मस्टर्ड से हमला किया था जिसमें 20 शहीद हुए थे, जबकि एक व्यक्ति घायल हुआ था। इराक़ के इस अमानवीय कृत्य की ईरान की ओर से आधिकारिक भर्स्तना की वजह से इराक़ के सरकारी रेडियो ने इसका इंकार किया। लेकिन रमज़ान और ख़ैबर ऑप्रेशन के दौरान इराक़ द्वारा बनाए गए केमिकल बम तोपख़ाना इकाई और फ़ाइटर जेट से बड़े पैमाने पर गिराए गए। इराक़ी फ़ोर्सेज़, ईरानी वीरों की रक्षा पंक्ति को केमिकल हथियारों से तोड़ने की कोशिश करने के साथ ही इन जनसंहारक हथियारों से आम नागरिकों को भी निशाना बनाती थी। ख़ुर्रमशहर की आज़ादी और इराक़ी फ़ोर्सेज़ पर ईरानी फ़ोर्सेज़ की बड़ी जीत की वजह से इराक़ी सेना ने ईरानी बलों के वल-फ़ज्र-2, वल-फ़ज्र-4, ख़ैबर और बद्र ऑप्रेशनों के ख़िलाफ़ केमिकल हथियार इस्तेमाल किए।

 

पश्चिमी ईरान के सरदश्त शहर पर इराक़ की बासी सेना के फ़ाइटर जेट्स के केमिकल हमलों में 110 लोग शहीद और 5000 के क़रीब लोग घायल हुए। अफ़सोस के साथ बताना पड़ रहा है कि सरदश्त शहर की जनता अभी भी केमिकल हमलों के दुष्प्रभाव को झेल रही है। इराक़ी सेना के इस घिनौने अपराध के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय हल्क़ों ने इस हमले को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि ऐसा रवैया अपनाया मानो कुछ हुआ ही न हो।

1984 में यूएन की ओर से नियुक्त एक्सपर्ट्स की टीम ने ईरान के दावे की पुष्टि में पहली रिपोर्ट प्रकाशित की। इस टीम ने ईरान के अनेक इलाक़ों में मस्टर्ड गैस और नर्व एजेन्ट के हमले की पुष्टि की। इस रिपोर्ट के बाद जंग के अंत तक हर साल एक टीम ईरान आती थी और इराक़ द्वारा केमिकल हथियार से हमले की पुष्टि करती थी। इस संबंध में एक अहम बिन्दु यूएन का रवैया था। इराक़ को पश्चिम के खुले समर्थन की वजह से यूएन सुरक्षा परिषद ने सिर्फ़ इराक़ और ईरान से केमिकल हथियार इस्तेमाल न करने के लिए कहा। यूएन इराक़ को युद्ध अपराधी ठहारने के लिए तय्यार न हुआ, क्योंकि यूएन सुरक्षा परिषद के मुख्य सदस्य इराक़ के घटक थे।

ईरान से इराक़ की आठ साल की जंग के दौरान, अमरीका ने इराक़ के क़रीब 5 अरब डॉलर और बड़ी तादाद में जैविक हथियार दिए थे। इसी तरह अमरीका ने अपने पश्चिमी घटकों को इराक़ को अरबों डॉलर की सैन्य मदद देने के लिए प्रेरित किया। ब्रिटेन ने टैंक, मीज़ाईल सिस्टम और तोपख़ाना के उपकरण इराक़ को दिए। फ़्रांस ने गाइडेड मीज़ाईल और फ़ाइटर जेट इराक़ भेजे। जर्मनी ने मस्टर्ड गैस और नर्व गैस बनाने की टेक्नॉलोजी देकर इराक़ की मदद की। इन सब मदद की वजह से ईरान में एक लाख से ज़्यादा लोग घायल हुए और आज भी उनमें बहुत से केमिकल हमले के साइड इफ़ेक्ट में ग्रस्त हैं और उन्हें देखभाल की ज़रूरत होती है। अब जबकि जंग को ख़त्म हुए दसियों साल हो चुके हैं, शायद ही कोई दिन हो जब ईरान के किसी इलाक़े से केमिकल हमले के किसी पीड़ित की मौत की ख़बर न आती हो।

अंत में ईश्वर से प्रार्थना है कि वह मानवता के अंतिम मुक्तिदाता हज़रत इमाम महदी को जल्द से जल्द प्रकट करे, ताकि मानव समाज से अन्याय का अंत हो, दुनिया के पीड़ितों को अत्याचारियों से राहत मिले।

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