Jul ०४, २०२१ १५:५९ Asia/Kolkata
  • शौर्यगाथा 40ः वल्फ़ज्र आप्रेशन जिसमें ईरानी जियालों ने दिखाई यादगार बहादुरी

आप जानते हैं कि हम प्रोग्राम शौर्यगाथा में 80 के दशक में ईरान पर इराक़ के बासी सद्दाम शासन के हमले के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की पवित्र प्रतिरक्षा और इस दौरान ईरानी राष्ट्र के वीर सपूतों के शौर्य के बारे में आपको बता रहे हैं।

पिछले प्रोग्राम में आपको यह बताया था कि ईरान के दक्षिणी इलाक़ों में ऐसे ऑप्रेशन की संभावना ख़त्म हो गयी थी जिसकी दुश्मन को भनक न लगने पाए। इसी तरह इराक़ की सरदह से मिले ईरान के पश्चिमोत्तरी इलाक़ों पर सैन्य ऑप्रेशन के केन्द्रित होने के बारे में बताया। इराक़ के सुलैमानिया इलाक़े में वलफ़ज्र-10 सैन्य ऑप्रेशन इन्हीं ऑप्रेशनों में था।

वलफ़ज्र-10 सैन्य ऑप्रेशन, सैन्य नज़र से एक सफल ऑप्रेशन था जिसके दौरान हलब्चा शहर और उसके आस-पास के इलाक़े ईरानी फ़ोर्सेज़ के नियंत्रण में आ गए थे। इस ऑप्रेशन का मुख्य लक्ष्य सुलैमानिया प्रांत के पीछे के रास्ते और सुलैमानिया प्रांत के लिए रसद को रोकना था। लेकिन कुछ तत्वों की वजह से इस्लामी जियाले सुलैमानिया शहर पर नियंत्रण सहित बड़े लक्ष्य हासिल नहीं कर सके।

बासी सद्दाम शासन की सेना ने अपनी शैली के विपरीत, ईरानी वीरों पर शेलिंग नहीं की बल्कि स्थानीय फ़ोर्सेज़ और पहली डिविजन की तीन ब्रिगेड पर आधारित फ़ोर्सेज़ के साथ ईरानी फ़ोर्सेज़ पर केमिकल हमले किए। इराक़ की बासी सेना ने वलफ़ज्र-10 सैन्य ऑप्रेशन के स्थान पर मुख्य फ़ोर्सेज़ को न भेजने का फ़ैसला लिया। इसी तरह इराक़ी फ़ोर्सेज़ ने वलफ़ज्र-10 सैन्य ऑप्रेशन की प्रतिक्रिया में ईरानी फ़ोर्सेज़ और कुर्द बाहुल इलाक़े तथा हलब्चा शहर पर केमिकल बमबारी की। 70 हज़ार की आबादी वाला हलब्चा शहर सुलैमानिया प्रांत में, दरबंदीजान बांध के दक्षिण पूर्व में स्थित है। यह शहर जलवायु की नज़र से इराक़ के कुर्दिस्तान क्षेत्र का सबसे अच्छा इलाक़ा है।

वलफ़ज्र-10 सैन्य ऑप्रेशन में ईरान की कामयाबी के बाद, इराक़ की बासी सेना ने सद्दाम के सीधे आदेश पर 16 मार्च 1988 को हलब्चा शहर पर आम लोगों पर बड़े पैमाने पर केमिकल हमला किया। यह केमिकल बमबारी, सरदश्त पर केमिकल हमले के क़रीब 7 महीने बाद हुयी थी। इस दिन फ़्रांस के 50 बमबार विमान मीराज और सुपर इटेन्डार्ड ने जिनमें से हर एक पर 500 किलो के 4 केमिकल बम लदे थे, हलब्चे और उसके आस-पास के गावों पर गिराए। इन बमों में मस्टर्ड गैस, नर्व एजेन्ट और साइनाइड गैस भरी हुयी थी। इराक़ी बमबार विमानों ने उस वक़्त बमबारी शुरू की जब बड़ी तादाद में दुजैला की जनता जिसमें मर्द, औरत बूढ़े, जवान और बच्चे सभी थे, हलब्चा जा रही थी। हलब्चा शहर और उसके आस-पास के गांव का थोड़ी ही देर में मंज़र बदल गया। शहर और गांव में घर, गलियां और सड़कें, शवों से भर गए। ये शव विभिन्न हालत में अकड़े हुए, मूर्ति की तरह नज़र आर रहे थे।        

हलब्चे शहर पर केमिकल बमबारी, सद्दाम शासन का सबसे बड़ा युद्ध अपराध था। 2 घंटे में हलब्चा और उसके आस-पास के गांव के क़रीब 5000 लोग, ज़हरीली गैस की सांस लेने से मौत के मुंह में चले गए जबकि 7000 लोग घायल हुए। हलब्चे में केमिकल हथियारों से हमला, पहले विश्व युद्ध से अब तक केमिकल हथियारों का सबसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल था। जो त्रासदी हलब्चे में घटी, उसकी जापान के हिरोशीमा और नागासाकी शहरों पर हुयी परमाणु बमबारी से तुलना की जानी चाहिए। केमिकल बमबारी के बाद, हलब्चे शहर की बची हुयी जनता ने ईरान में शरण लिया और ईरान ने केमिकल हमले के पीड़ितों का इलाज किया और कुछ को इलाज के लिए यूरोप भेजा।

तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जॉर्ज शुल्ट्ज़ ने सद्दाम शासन द्वारा केमिकल हथियारों के इस्तेमाल के बारे में कहा थाः “हम केमिकल हथियारों के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ थे और इराक़ पर ईरान की जीत नहीं चाहते थे। इसी वजह से आधिकारिक तौर पर इराक़ की भर्त्सना नहीं की।” सद्दाम शासन द्वारा ईरानी शहरों और आर्थिक मूल रचनाओं पर बमबारी व मीज़ाईल हमले और केमिकल हथियारों का इस्तेमाल और जंग के ख़र्च की आपूर्ति के लिए ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक पाबंदियों की वजह से, जंग का संतुलन इराक़ के हित में मुड़ गया।

सद्दाम शासन ने ताकीद की थी कि ज़मीनी मोर्चों पर बासी सेना के ठिकानों की रक्षा और ईरानी फ़ोर्सेज़ के जमीनी हमलों के मुक़ाबले में बड़े पैमाने पर जवाबी हमले हों। वल-फ़ज्र-10 ऑप्रेशन पर इराक़ की बासी सेना की अपेक्षाकृत कमज़ोर प्रतिक्रिया से यह लगा कि इराक़ी सेना दक्षिणी इलाक़े को जंग का मुख्य मोर्चा मानती है और उसका यह भी मानना था कि पश्चिमी मोर्चे पर ईरान के सैन्य ऑप्रेशन का लक्ष्य दक्षिणी मोर्चे पर सैन्य कार्यवाही का रास्ता खोलना था। इसी वजह से वलफ़ज्र-10 सैन्य ऑप्रेशन के आग़ाज़ में इराक़ी सेना ने अपनी फ़ोर्सेज़ को बांटा नहीं, बल्कि उसे दक्षिणी मोर्चे पर तैनात किए रखा। ईरानी फ़ोर्सेज़ की इकाइयों की पश्चिम में सैन्य ऑप्रेशन अंजाम देने के लिए तैनाती के बावजूद, इराक़ की बासी सेना ने पश्चिमी मोर्चे पर अतिरिक्त सैन्य इकाई नहीं भेजी, बल्कि वहां पहले से मौजूद इकाइयों से केमिकल हथियार से ईरानी फ़ोर्सेज़ का मुक़ाबला किया।

सद्दाम समझ चुका था कि ईरान ज़मीनी हमला जारी रखेगा ताकि इराक़ी सेना के क़ब्ज़े से अहम इलाक़े निकाल पर अपने नियंत्रण में ले ले। ईरानी फ़ोर्सेज़ को इस रणनीति को अपनाने से रोकने के लिए, इराक़ की बासी सेना ने अपनी लड़ाई क्षमता बढ़ाने की कोशिश की और नई योजना के ज़रिए फ़ाओ, ख़ैबर द्वीप समूह, शमल्चे और हलब्चे इलाक़े को ईरानी फ़ोर्सेज़ के नियंत्रण से निकालना और मोर्चों पर पहल को अपने हाथ में लेने चाहा।        

मार्च महीने के अंत और अप्रैल महीने में, बदलते हुए हालात की वजह से, थोपी गयी जंग पर ऐक्शन और रिएक्शन के छाए हुए स्वरूप में बदलाव आया। इराक़ की बासी सेना ने आक्रामक मुद्रा अपनायी और ईरानी शहरों व मूल रचनाओं पर क्रूरता के साथ बमबारी व मीज़ाईल हमले जारी रहे।

इराक़ी की बासी सेना ने 29 फ़रवरी 1988 से 21 अप्रैल 1988 के बीच कुछ दिनों को छोड़, लगातार 51 दिन ईरानी शहरों पर हमले किए। इस दौरान इराक़ी शासन ने तेहरान पर 100 मीज़ाईल और ईरान के केन्द्रीय शहरों पर क़रीब 100 मीज़ाईल से हमले कर बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया। इसके साथ ही सद्दाम शासन ने जंग के मोर्चे का रुख़ बदलने के लिए बड़े पैमाने पर केमिकल हथियारों से हमले की नीति अपनायी। जंग के आख़िरी साल में सद्दाम शासन ने ईरानी नागरिकों के ख़िलाफ़ केमिकल हमले बढ़ा दिए। इराक़ की बासी सेना ने जंग के दौरान, ईरान में नागरिक लक्ष्यों पर 30 बार से ज़्यादा केमिकल हमले किए।

थोपी गयी जंग के दौरान, 1 लाख 10 हज़ार ईरानी केमिकल हमलों का निशाना बने। सद्दाम शासन के पास कच्चे केमिकल माल के 48 फ़ीसदी हिस्से को 1980 में हॉलैंड के व्यापारी फ़्रांस वान अनरात ने मुहैया कराया था। सद्दाम शासन के पतन के बाद, हॉलैन्ड की देनहाग अदालत ने इस व्यापारी को सद्दाम शासन को केमिकल पदार्थ बेचने के जुर्म में 17 साल जेल की सज़ा सुनायी। इस व्यापारी की ओर से बेचे गए केमिकल पदार्थ को सद्दाम शासन ने हलब्चे पर बमबारी में इस्तेमाल किए थे।

जंग के आख़िरी दिनों ख़ास तौर पर 1988 के जाड़े के मौसम में इराक़ की बासी सेना ने ईरानी वीरों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर साइनाइड गैस का इस्तेमाल किया। यूएन के आंकड़े के मुताबिक़, इराक़ के बासी शासन ने जंग के दौरान, कुल 1800 टन मस्टर्ड गैस, 600 टन सरीन गैस और 140 टन नर्व एजेन्ट ताबून गैस, क़रीब 1 लाख बम, रॉकेट और गोलों में इस्तेमाल किए। सद्दाम ऐसी हालत में बड़े पैमाने पर केमिकल हथियार इस्तेमाल कर रहा था कि मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाले, इराक़ी तानाशाह के अपनी ही देश की जनता के ख़िलाफ़ खुले अपराध पर ख़ामोश रहे और उसे केमिकल हथियार बनाने के लिए ज़रूरी पदार्थ मुहैया कराते रहे।

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