Jul ११, २०२१ १७:५५ Asia/Kolkata
  • ईरान में आतंक का बज़ार गर्म करने वाले आतंकी गुट से मिलिए जिसने 17 हज़ार बेगुनाह ईरानियों को मौत के घाट उतार दिया, बड़ी बड़ी ताक़तों का था आर्शिवाद...

दुनिया में आतंकवाद की सबसे ज़्यादा बलि चढ़ने वाला देश ईरान को माना जाता है क्योंकि ईरान एमकेओ सहित अनेक आतंकवादी गुटों से मुक़ाबले में राष्ट्र के 17000 सपूतों की क़ुर्बानी दे चुका है जिसमें आम नागरिकों से लेकर बड़ी बड़ी हस्तियां शामिल हैं।

शहीद आयतुल्लाह बहिश्ती की देश के 72 अधिकारियों के साथ हत्या, राष्ट्रपति शहीद रजाई, प्रधान मंत्री मोहम्मद जवाद बाहुनर, आयतुल्लाह मदनी, आयतुल्लाह दस्तग़ैब शीराज़ी, आयतुल्लाह क़ुद्दूसी, आयतुल्लाह अशरफ़ी इस्फ़हानी, आयतुल्लाह सदूक़ी, शहीद लाजवर्दी, शहीद सय्याद शीराज़ी और हालिया बरसों में शहीद होने वाले परमाणु वैज्ञानिक वे हस्तियां है जो एमकेओ, अमरीका या उसके तत्वों के हाथों आतंकवाद की बलि चढ़े हैं।

20 जून 1981, एमकेओ का इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के ख़िलाफ़ आतंकवादी कृत्य और आम लोगों के नरसंहार से इस गुट का आतंकवादी चेहरा सामने आया। इस गुट ने सद्दाम की बासी सेना के हमले के साथ, अनेक सार्वजनिक स्थलों पर बम धमाकों, आतंकवादी कृत्यों, गलियों और बाज़ारों में आम लोगों के नरसंहार कर देश की सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया और देश से ग़द्दारी करते हुए व्यवहारिक रूप से हमलावर बासी शासन के लिए काम करने लगा।

ईरान के ख़िलाफ़ जंग में बासी सेना और सद्दाम के हाथ में हाथ देना, देश के भीतर विध्वंसक गतिविधियां व सैन्य गतिविधियों की जासूसी करना, सैन्य व आर्थिक जानकारी दुश्मन को देना और ईरान के ख़िलाफ़ 100 से ज़्यादा ऑप्रेशन में शामिल होना, इस आतंकवागी गुट की ईरानी राष्ट्र के ख़िलाफ़ काली करतूतें हैं।

एमकेओ बासी दुश्मन के साथ सैन्य सहयोग करने के साथ साथ ईरानी वीरों पर आत्मिक दवाब बढ़ाने के लिए बंदियों को पूछताछ के दौरान यातना देने में इराक़ी शासन के साथ सहयोग करता था। एमकेओ के अपराधियों ने बड़ी तादाद में ईरानी क़ैदियों को रेड क्रेसेंट की लिस्ट में दर्ज होने से पहले शहीद कर दिया था जिसे साबित करने वाले दस्तावेज़ मौजूद हैं।

1988 को एमकेओ ने जंग की प्रक्रिया पर असर डालने के लिए सद्दाम को उकसाते हुए तीन अपेक्षाकृत बड़े सैन्य ऑप्रेशन किए जिसके दौरान बड़ी तादाद में आम लोग और फ़ौजी शहीद हुए। इस भयानक संगठन ने अपनी पत्रिका में 1981-82 की अपनी सालाना रिपोर्ट में अपने सशस्त्र कृत्यों में 12000 लोगों और दूसरे साल यानी 1982-83 में 7000 लोगों की हत्या का उल्लेख किया था। इस गुट ने बहुत सी हत्याएं अंधाधुंध तरीक़े से की थीं।

यह काली करतूत बताती हैं कि आतंकवादी गुट एमकेओ अपने बुरे लक्ष्य को साधने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। ये आतंकवादी तत्व शहीद अली मोहम्मदी, शहीद शहरयारी और शहीद अहमदी रौशन जैसे परमाणु उद्योग के वैज्ञानिकों की हत्या में भी लिप्त थे।   

एमकेओ संगठन इराक़ के भीतर, अन्फ़ाल ऑप्रेशन में सद्दाम शासन के विरोधी कुर्द लोगों के नरसंहार में लिप्त था। इसी तरह एमकेओ ने दक्षिणी इराक़ में शियों के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन को दबाने के लिए सद्दाम शासन का साथ दिया था। एमकेओ ने सुबूत व दस्तावेज़ के मुताबिक़, 25000 से ज़्यादा इराक़ियों को शहीद किया है। इन्हीं दस्तावेज़ों के मुताबिक़, सद्दाम इराक़ी कुर्दों के नरसंहार व दमन के बाद, हर महीने 3 करोड़ डॉलर एमकेओ को देता था।

एमकेओ बरसों अमरीकी विदेश मंत्रालय की आतंकवादियों की लिस्ट में था लेकिन अब इसी गुट के वॉशिंगटन और यूरोपीय देशों में लॉबिंग करने वाले दफ़्तर हैं। राजनैतिक टीकाकार सैयद रज़ा क़ज़वीनी ग़राबी एमकेओ में वैचारिक मतभेद का ज़िक्र करते हुए कहते हैः इस गुट के सरग़ना किसी ज़माने में साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ नारा लगाते थे, लेकिन थोड़ी ही मुद्दत बाद इस गुट ने, लॉबिंग के लिए वॉशिंगटन में आधिकारिक तौर पर अपना दफ़्तर खोल लिया। ये गुट एक ओर प्रजातंत्र की बात करता है तो दूसरी ओर अपने ही सदस्यों के मूल अधिकारों की अनदेखी करता है।

राजनैतिक टीकाकार सैयद रज़ा क़ज़वीनी ग़राबी ने जो आतंकवाद के क्षेत्र में टीकाकार हैं, इस बात का ज़िक्र किया कि अमरीका और यूरोपीय देशों ने यह दर्शा दिया कि आतंकवादी गुटों के संबंध में वे अपने हितों के आधार पर न कि नियम व नैतिक मूल्यों के आधार पर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि एक गुट जो बरसों पश्चिमी देशों की आतंकवादी गुटों की लिस्ट में था, अचानक उसे लिस्ट से निकाल दिया जाता है, जैसे कोई बात ही नहीं हुयी। 

दोस्तो, प्रोग्राम के इस भाग में इस बात का उल्लेख करेंगे कि किस तरह इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद, ईरानी राष्ट्र, दुश्मन की ओर से बड़े पैमाने पर हत्या का निशाना बना। इस बात के ठोस सुबूत हैं कि एमकेओ सहित दूसरे आतंकवादी गुटों ने, क्षेत्रीय देशों में अमरीका, इस्राईल और सऊदी अरब की ओर से वित्तीय व सैन्य मदद से बहुत से अपराध किए हैं। एमकेओ ने 1979 से 1981 के दौरान, इस्लामी व्यवस्था के बहुत से अधिकारियों, क्रान्तिकारी फ़ोर्सेज़ और जनता के विभिन्न वर्ग के लोगों की हत्या  की।

26 जून 1981 को सुप्रीम लीडर आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई, तेहरान में अबूज़र मस्जिद में भाषण के दौरान आतंकवादी कृत्य का निशाना बने। इस घटना के बाद, 27 जून 1981 को इस्लामी गणतंत्र के इतिहास में सबसे बड़ा आतंकवादी धमाका हुआ। इस घटना के साथ ही, आतंकवादी कृत्य नए चरण में दाख़िल हो गए। इस दिन तेहरान में जुम्हूरी इस्लामी पार्टी की बैठक में बहुत ख़तरनाक धमाका हुआ जिसमें देश के चीफ़ जस्टिस सैयद मोहम्मद हुसैनी बहिश्ती देश के 72 अधिकारियों के साथ शहीद हुए। शहीद होने वालों में 4 मंत्री, 12 उपमंत्री और क़रीब 30 सांसद थे। कुछ महीने के बाद, 29 अगस्त 1981 को एक आतंकवादी धमाके में तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई और तत्कालीन प्रधान मंत्री मोहम्मद जवाद बाहुनर शहीद हुए। इस आतंकवादी अपराध की याद ईरानी राष्ट्र के मन से कभी नहीं मिटेगी।

असोसिएटेड प्रेस ने आतंकवाद को अमरीकी समर्थन के एक भाग का ख़ुलासा करते हुए, अमरीका के कुछ सेनेटरों के एमकेओ के सरग़नाओं से रिश्वत लेने का पर्दाफ़ाश किया। इस न्यूज़ एजेंसी ने लिखाः पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के मंत्रीमंडल में शामिल एक मंत्री और उनके एक सलाहकार ने पैसों के बदले में एमकेओ के लिए भाषण दिया था। इस न्यूज़ एजेंसी ने साफ़ तौर पर एलियन चाओ का नाम लिया जो ट्रम्प की सरकार में परिवहन मंत्री थे। इस न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, उन्होंने 2015 में एमकेओ की एक शाखा के लिए 5 मिनट की स्पीच के लिए 50 हज़ार डॉलर लिए थे।
इसी तरह कुछ सूत्रों ने इस बात का पर्दाफ़ाश किया कि न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर रूडी जूलियानी ने पैसे लेकर इस गुट के लिए स्पीच दी थी। एमकेओ के इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि यह आतंकवादी गुट अमरीका सहित कुछ यूरोपीय देशों का घटक बन चुका है।          

अमरीकी विदेश मंत्रालय ने बरसों पहले एमकेओ का नाम आतंकवादी गुट की लिस्ट में शामिल किया था, लेकिन जब उसे इस गुट को हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल करने की ज़रूरत महसूस हुयी तो उसने इसका नाम अपनी लिस्ट से निकाल दिया ताकि यह दर्शाए कि अमरीका के लिए लक्ष्य तक पहुंचना अहमियत रखता है, साधन नहीं, चाहे लक्ष्य तक पहुंचने के लिए किसी आतंकवादी संगठन की ही मदद क्यों न लेनी पड़े।

इसी परिप्रेक्ष्य में एमकेओ ने 2009 के फ़ितने में तेहरान को उपद्रव को आग में झोकने के लिए आदेश जारी किया, उपद्रवियों का समर्थन किया और व्यवस्था, सार्वजनिक संपत्ति और बेगुनाह लोगों को नुक़सान पहुंचाया।

दिसंबर 2017 को जब लोग देश के बुरे आर्थिक हालात पर आपत्ति जता रहे थे, व्यवस्था के दुश्मनों ने विरोध को इस्लामी व्यवस्था के ख़िलाफ़ मुक़ाबले के लिए मोड़ने की कोशिश की। एमकेओ की सरग़ना मरयम रजवी ने सऊदी अरब से प्रकाशित अख़बार अकाज़ से इंटरव्यू में बडी बेशर्मी से कहा था कि दिसंबर के उपद्रव उसी के संगठन ने किया था।

आतंकवाद से संघर्ष का दावा करने वाले अमरीका सहित कुछ यूरोपीय देशों की नज़र में, एमकेओ के हाथों 12000 ईरानियों की हत्या कोई बात नहीं है। अमरीका ने इसी नज़र से हज़ारों की तादाद में इराक़ी और कुर्द लोगों के दमन में एमकेओ के कृत्य को देखा और उसे अपनी छत्रछाया में कर लिया।

अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व सदस्य व एमकेओ के समर्थक रेमंड टैन्टर ने एक किताब संकलित की जिसमें इस गुट की हत्या के समर्थकों की लिस्ट से अपना नाम निकालने की गतिविधियों का ज़िक्र किया है। रेमंड टैन्टर का कहना हैः वे (एमकेओ) ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए पाबंदी और जंग से बेहतर विकल्प है।

एलियन चाओ

अमरीका और कुछ यूरोपीय देशों ने यह जानते हुए कि इस आतंकवादी गुट के हाथ हज़ारों बेगुनाह ईरानियों के ख़ून से सने हैं, जब इस गुट ने ईरान से फ़रार किया तो उसका समर्थन किया। एमकेओ ने कुछ मुद्दत फ़्रांस में बितायी और जैसे ही इराक़ ने ईरान पर जंग थोपी यह गुट इराक़ पहुंचा ताकि ईरान के ख़िलाफ़ दुश्मन का साथ दे। इराक़ पर अमरीका के हमले और सद्दाम शासन के पतन के बाद, इस आतंकवादी गुट के तत्वों को अमरीका और यूरोप का संरक्षण हासिल रहा और पश्चिम के समर्थन व मदद से अल्बानिया चले गए ताकि वहाँ से अपनी गतिविधियां जारी रखें।

अल्बानिया के कुछ पुलिस अधिकारियों और पत्रकारों ने जिस बिन्दु पर ध्यान दिया वह यह है कि इस देश में एमकेओ की बेस इस गुट के विशेष नियम के तहत संचालित होती है न कि अल्बानिया के क़ानून के तहत।

इस वक़्त एमकेओ एक मिलिशिया व आतंकवादी गुट के रूप में अल्बानिया में मौजूद है जो पैसों की मदद से बाल्कान क्षेत्र में अपनी पैठ मज़बूत करने में लगा हुआ है। एमकेओ के आतंकवादी कृत्यों के पुराने रेकॉर्ड और इस गुट का अल्बानिया के माफ़िया गुटों के साथ संपर्क इस देश और बाल्कान क्षेत्र के नागरिकों के लिए गंभीर ख़तरा हो सकता है।

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