Aug ३१, २०२१ १५:४० Asia/Kolkata
  • अफ़ग़ानिस्तान में ढेर हुआ एक और सुपर पावर

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका और उसके घटकों की सैन्य उपस्थिति के दो दश्कों बाद आख़िरकार वर्चस्वादी सुपरपावर अमरीका यह देश छोड़ने पर मजबूर हो गया जबकि बीस साल पहले वह पूरी ताक़त से इस देश में घुसा था और वाइट हाऊस के अधिकारी भी क्षेत्रीय स्तर पर किसी भी देश को पश्चिम की ग़लत धारणा के नज़दीक नहीं कर सके।

वास्तव में क्षेत्रीय देशों की अमरीका और पश्चिम के साथ सांठगांठ की नीति, दो दश्कों तक लगातार उपस्थित रहने के बाद आख़िरकार विफल हो गयी और अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने वाले देश विशेषकर अमरीका बिना किसी ख़ास नतीजे के इस देश को लज्जाजनक तरीक़े से छोड़ने पर मजबूर हुए।

अमरीका और उसके घटकों ने 2001 में आतंकवाद से संघर्ष और अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा के बहाने इस देश पर चढ़ाई कर दी और इस देश पर क़ब्ज़े की भूमिका तैयार कर ली। अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के लिए जो जंग हुई उसकी वजह से झड़पों में वृद्धि हुई और इस देश का आर्थिक ढांचा बुरी तरह तबाह हो गया। इस देश में शांति की स्थापना और एक स्वतंत्र सरकार के गठन के बजाए, अफ़ग़ानिस्तान और क्षेत्रीय स्तर पर आतंकवाद, अशांति और मादक पदार्थों की पैदावार और तस्करी में वृद्धि ही हुई। वास्तव में अमरीका ने 20 साल अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सैन्य उपस्थिति के बाद आख़िरकार इस देश से निकलने का फ़ैसला कर लिया।

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की सैन्य उपस्थिति के बारे में यूं कहा जा सकता है कि अमरीका और उसके घटकों की सेना ने दो दश्क पहले आतंकवाद और कट्टरपंथ से संघर्ष के नाम पर अफ़ग़ानिस्तान पर चढ़ाई की थी और बीस साल के दौरान उसने काबुल में अपनी एक पिट्ठु सरकार बिठाने की कोशिश की ताकि वह जो कुछ कहे काबुल सरकार उस को बिना कुछ कहे लागू करती रहे लेकिन यह सरकारें न केवल इसमें कामयाब नहीं रहीं बल्कि अफ़ग़ानिस्तान और क्षेत्रीय स्तर पर लोगों की अमरीका से नफ़रत में वृद्धि होती गयी।

यह बात स्पष्ट है कि अमरीका जब अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को निकालेगा तो उसे क्षेत्र में अपने सैनिकों के लिए एक नयी सैन्य छावनी की आवश्यकता पड़ेगी। वाइट हाऊस के अधिकारियों ने पश्चिमी रणनीतिकारों से परामर्श के बाद मध्य एशिया के कुछ देशों को इस संबंध में उचित समझा है और वास्तव में संभव है कि अमरीका की नई सैय छावनी क़ज़ाक़िस्तान, ताजेकिस्तान या उज़्बेकिस्तान में बन जाए।

इसी संबंध में अमरीकी समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्ज़ ने हाल ही में अपने लेख में लिखा कि अमरीका और उसके घटक मध्य एशिया के कुछ देशों के नेताओं के साथ वार्ता कर रहे हैं ताकि अपने सैनिकों को ताजेकिस्तान या उज़्बेकिस्तान पहुंचा सकें। अमरीकी समाचार पत्र ने इसी तरह अधिकारियों की पीठ थपथपाते हुए लिखा कि जब नैटो के घटक देश दो दश्कों में मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंधों को अच्छा करने के प्रयास कर रहे हैं, इस कार्यवाही के व्यवहारिक होने की ज़्यादा संभावना है।

मध्य एशिया के देशों में नयी सैन्य छावनी बनाने के बारे में ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि 1997 से मध्य एशियाई देश यूरो-एटलांटिक कोआपरेशन काउंसिल के सदस्य बन गये। पश्चिमी मीडिया के अनुसार क़ज़ाक़िस्तान और ताजेकिस्तान जो Collective Security Treaty Organization "CSTO" के सदस्य हैं, उज़्बेकिस्तान से अधिक विश्सनीय होंगे।

उज़्बेकिस्तान में होने वाले कुछ परिवर्तन अमरीका के लिए अच्छे नहीं रहे। बहरहाल, सेन्ट्रल एशिया के देशों में अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों को स्थानान्तरित करने के बारे में अनेक तरह के दृष्टिकोण पाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर रूस की विदेशी ख़ुफ़िया एजेन्सी के प्रमुख सर्गेई नारिश्कीन ने इस विषय पर चिंता जताते हुए कहा था कि अमरीका, अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद, अपने सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों में तैनात करने का प्रयास कर रहा है।

रूस की विदेशी ख़ुफ़िया एजेन्सी के प्रमुख सर्गेई नारिश्कीन के कथनानुसार बाइडन सरकार के कुछ अधिकारियों ने वाल स्ट्रीट जरनल समाचार पत्र से बात करते हुए कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद छावनी बनाने के लिए अमरीका का संभावित आप्शन ताजेकिस्तान और उज़्बेकिस्तान हो सकता है।

मास्को से ताशकंद और दोशंबे के निकट संबंधों के दृष्टिगत अमरीकी अधिकारियों का यह सपना साकार होता नज़र नहीं आ रहा है और यह महसूस नहीं होता कि यह योजना अपने किसी नतीजे तक पहुंच सकेगी। इन सबके बावजूद रूस की विदेशी ख़ुफ़िया एजेन्सी के प्रमुख सर्गेई नारिश्कीन भी इस बारे में कहते हैं कि अमरीका, अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को निकालकर रूस के किसी एक पड़ोसी देश में पहुंचाना चाहता है क्योंकि वह अफ़ग़ानिस्तान का नियंत्रण अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता।

मास्को के इस वरिष्ठ अधिकारी ने इसी तरह कहा कि हमारे पास सूचनाएं हैं कि इस तरह की कोशिशें की जा रही हैं और हमें उम्मीद है कि हमारे सहयोगियों के अलावा Collective Security Treaty Organization "CSTO" के सदस्य भी अमरीका की इन कोशिशों का विरोध करेंगे। 

यहां पर यह बात भी कहना ज़रूरी है कि अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के आरंभिक वर्षों में अमरीका की एक छावनी उज़्बेकिस्तान में और दूसरी छावनी क़िरक़िज़िस्तान में थी। अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य कार्यवाही के लिए इन दोनों छावनियों को प्रयोग करता था लेकिन क्षेत्रीय सरकारों, जनता, गुटो और लोगों के भारी दबाव के बाद अमरीका ने 2005 में उज़्बेकिस्तान छोड़ दिया और उसके दस साल बाद अर्थात 2015 में क़िरक़िज़िस्तान की छावनी भी ख़ाली कर दी। 

पिछले कुछ महीनों के दौरान अमरीकी अधिकारियों ने सेन्ट्रल एशिया के देशों की बहुत अधिक यात्राएं कीं और इन देशों के अधिकारियों और नेताओं से अलग अलग तरह के वादे किए और अलग अलग तरह की लालचें दीं ताकि अफ़गानिस्तान से अमरीकी सैनिकों के निकलने के बाद सेन्ट्रल एशिया के किसी एक देश में जगह मिल जाए और उनकी समस्या ख़त्म हो जाए।

लेकिन ऐसा लगता है कि वाइट हाऊस के अधिकारी भी इस मामले में फिर नाकामी का मुंह देखेंगे और उनको एक बार फिर विफलता ही हाथ लगेगी। अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका और उसके घटकों की नाकामी से हटकर यह कहा जा सकता है कि अमरीका, क्षेत्रीय देशों विशेषकर सेन्ट्रल एशिया के देशों के साथ सहयोग के बारे में भी नाकाम रहा है।

यह ऐसी हालत में है कि इस देश में सत्तासीन सरकारों को आम तौर पर वित्तीय और पैसों की समस्याओं का सामना है और वह बहुत अधिक पैसे लेकर भी अमरीका के साथ सहयोग के लिए तैयार नहीं हैं। दुनिया के देशों विशेषकर सेन्ट्रल एशिया के देशों के साथ अमरीकी अधिकारियों की नीतियां तीन चीज़ों पर निर्भर होती हैं, एक लालच देना, दूसरे धमकी देना और तीसरे दंगा फ़साद कराना लेकिन अमरीका इन तीनों चीज़ों में बुरी तरह नाकाम रहा है और इसमें कामयाबी हासिल नहीं कर सका है।

वास्तव में अमरीका और नैटो की रूस के पड़ोसी देशों में उपस्थिति भी बंद गली का शिकार हो गयी लेकिन इस बारे में अर्थात अमरीका की सैन्य उपस्थिति के बारे में रूस और स्वतंत्र देशों के विरोध की अनदेखी नहीं की जा सकती। इन सबके बावजूद पश्चिमी सैनिकों विशेषकर अमरीका और नैटो की सैन्य उपस्थिति के विरोध के बावजूद यह सैनिक सेन्ट्रल एशिया के क्षेत्रो और दक्षिणी काकेशिया में अभी भी मौजूद हैं।

इस संबंध में अफ़ग़ानिस्तान के मामले में रूसी राष्ट्रपति के विशेष दूत ज़मीर काबलोफ़ ने क्षेत्र में अमरीका की सैन्य उपस्थिति को अस्वीकार क़रार दिया और कहा कि अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों के निकलने के बाद एसा नहीं होना चाहिए कि वाशिंग्टन क्षेत्र के किसी और देश में इन सैनिकों को तैनात कर दे और ईरान के पड़ोस में या सेन्ट्रल एशिया के देशों में सैन्य छावनी बना दे।

सेन्ट्रल एशिया के कुछ टीकाकार ताजेकिस्तान और क़िरक़िज़िस्तान के बीच समस्याओं की जड़, अमरीका के कूटनयिक हस्तक्षेप को क़रार देते हैं। क़ज़ाक़िस्तान के राजनैतिक मामलों के विशेषज्ञ तूरार करीमोफ़ का कहना है कि ताजेकिस्तान और क़िरक़िज़्तान के बीच सीमा विवाद का जारी रहना और इसमें किसी भी तरह की सहमति न हासिल होने की वजह, पश्चिम विशेषकर अमरीका का परोक्ष या अपरोक्ष कूटनयिक हस्तक्षेप है।

कज़ाक़िस्तान के इस टीकाकार का कहना है कि पश्चिम, सेन्ट्रल एशिया में नियंत्रण करने योग्य नेटवर्क पैदा करने के प्रयास में है और क़िरिक़िज़िस्तान का इन्टरन्यूज़ का गठन अमरीका के वित्तीय समर्थन से किया गया है जिसमें क्षेत्रीय पत्रकारों का प्रशिक्षण किया जाता है।

बहरहाल पश्चिमी सरकारों और अमरीका की गतिविधियों से यह बात साफ़ हो गयी है कि पश्चिमी नेता और वाइट हाऊस के अधिकारी दुनिया के देशों के संबंध में न तो अपने वादों पर अमल करते हैं और न ही अपनी ज़िम्मेदारियों का उन्हें एहसास होता है बल्कि वह क्षेत्र और दुनिया के दूसरे देशों को नुक़सान पहुंचाकर अपने प्रतिस्पर्धियों को ख़त्म करने के प्रयास में रहते हैं। (AK)

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