Dec ०३, २०१९ १५:४४ Asia/Kolkata

फ़िरदौसी ने शाहनामे में इस बात का उल्लेख किया है कि इस किताब की रचना में उन्हें तीस साल का समय लगा और इसके लिए उन्हें बहुत कठिनाइयां सहन करनी पड़ीं। वे कहते हैं।

"इन तीस बरसों में मैंने बहुत अधिक कष्ट उठाए हैं, इस पारसी के माध्यम से मैंने ईरान को जीवित कर दिया है, मैंने पद्य द्वारा एक ऐसे बड़े महल का आधार रखा है जिसे तेज़ हवाओं और बारिश से कुछ नुक़सान नहीं होगा। मैं अब नहीं मरूंगा और जीवित रहूंगा क्योंकि मैंने कथनों के बीज बो दिए हैं।"

हमने पिछले कार्यक्रमों में बताया कि फ़िरदौसी की काव्य रचना शाहनामे को तैयार होने में तीन दशक से अधिक का समय लग गया। इस किताब के संबंध में जो बात सबसे अहम है वह यह है कि इतनी बड़ी किताब में, अनेक घटनाओं और कहानियों के बावजूद विचारों, आत्मा और आयडियालोजी की एकता पूरी तरह से स्पष्ट है। पूरी किताब में एक ही विचार और एक ही आयडियालोजी को भली भांति देखा जा सकता है। पूरी किताब में मूल विचार की एकता व एकजुटता ऐसी है कि मानो इस किताब को शायर ने कई दशकों में नहीं बल्कि एक ही दिन में लिखा है।

विषय व विचार की यह एकता, कवि की दक्षता का परिणाम है। फ़िरदौसी ने अबू मंसूर के शाहनामे जैसे अपने मुख्य स्रोतों के अलावा प्राचीन कहानियों के कभी न ख़त्म होने वाले ख़ज़ाने से भी भरपूर लाभ उठाया है। जो चीज़ भी उनकी आयडियालोजी में समा सकती थी उसे उन्होंने ले लिया और बाक़ी को छोड़ दिया।

हकीम अबुल क़ासिम फ़िरदौसी ने अपनी काव्य रचना में धर्म, ज्ञान व बुद्धि को कल्याण के तीन मुख्य कारक बताया है और इन पर बहुत अधिक बल दिया है। इन तीन कारकों पर उन्होंने इतना अधिक बल दिया है कि इनके बारे में शाहनामे से विस्तृत उदाहरण पेश करके एक अलग किताब लिख जा सकती है। उदाहरण स्वरूप वे एक स्थान पर कहते हैं। "धर्म व ज्ञान तुम्हें सही मार्ग पर ले जाएंगे और इनके माध्यम से कल्याण का मार्ग तुम्हें मिल जाएगा। अपने पैग़म्बर के कथनों से मार्ग तलाश करो और इस पानी से अपने दिल के अंधेरों को धो लो।"

उर्दू शायरी में भी बुद्धि, ज्ञान व धर्म के बारे में हज़ारों शेर लिखे गए हैं। रोचक बात यह है कि आम तौर पर उर्दू में बुद्धि या अक़्ल को ईश्वर से सच्चे प्रेम की राह में रुकावट बताया गया है और उसके स्थान पर दिल को ईश्वर से निकट होने का उचित माध्यम बताया गया है। लेकिन यह बात भी ध्यान योग्य है कि दिल और बुद्धि में अंतर केवल सावधानी बरतने का है अन्यथा दोनों एक ही हैं जिसे मन कहा जा सकता है। बुद्धि हर काम में सावधानी बरतने पर बाध्य करती है जबकि दिल किसी भी काम में विशेष कर इश्क़ में बेधड़क कूद पड़ने पर तैयार करता है और अक़्ल को जहां पहुंचने में सदियां लग जाती हैं, दिल वहां पलों में पहुंच जाता है।

इश्क़ की एक जस्त ने तै कर दिया क़िस्सा तमाम   इस ज़मीनो आसमां को बेकरां समझा था मैं

ख़िरद ने कह भी दिया ला इलाह तो क्या हासिल   दिलो निगाह मुसलमां नहीं तो कुछ भी नहीं

फ़िरदौसी द्वारा कल्याण के इन स्तंभों पर बल दिए जाने और विशेष ध्यान देने की वजह उनके विचारों व आयडियालोजी में निहित है। वे अनन्य ईश्वर के अलावा किसी भी अन्य वस्तु की उपासना और इसी तरह अज्ञान को ऐसी ज़ंजीरें बताते हैं जो इतिहास में अनेक जातियों व राष्ट्रों के लिए बेड़ियां हैं और उनके पतन का कारण बनी हैं। फ़िरदौसी इस वास्तविकता को समझ गए थे कि अंधविश्वास और अनेकेश्वरवाद का जन्म अज्ञानता से होता है। उन्होंने उस काल में जब बुद्धि के विरोधियों का शासन था, अपने विचारों व आस्थाओं के प्रचलन के लिए ज्ञान व बुद्धि की बात कही और बुद्धि की रचना करने वाले ईश्वर का गुणगान करते हुए अपनी किताब का आरंभ किया।

मैं अपनी रचना का आरंभ आत्मा व बुद्धि के रचयिता ईश्वर के नाम से कर रहा हूं कि इन दोनों चीज़ों से बेहतर किसी चीज़ तक मनुष्य का विचार नहीं पहुंच सकता। इस शेर का एक अर्थ यह भी बताया गया है कि मैंने अपनी रचना का आरंभ आत्मा व बुद्धि के रचयिता ईश्वर के नाम से किया है क्योंकि मनुष्य का विचार इससे आगे नहीं बढ़ सकता और ईश्वर की वास्तविकता तक नहीं पहुंच सकता। बहरहाल फ़िरदौसी ने ऐसे समय में बुद्धि की प्रशंसा की कि जब उनके समय का शासक यानी महमूद ग़ज़नवी, बुद्धि और बुद्धिमानों को पैसों से ख़रीदा किया करता था। अबू अली सीना जैसे लोग, जो इस सौदेबाज़ी के लिए तैयार नहीं होते थे, वे या तो अपना घर-बार छोड़ कर कहीं और जा कर बसने पर मजबूर हो जाते थे या फिर उनकी हत्या करवा दी जाती थी।

फ़िरदौसी ने शाहनामे को बुद्ध व आत्मा के रचयिता ईश्वर के नाम से शुरू किया है। वे आत्मा की रचना और बुद्धि प्रदान करने जैसी ईश्वर की दो विशेषताओं पर बल देकर, शाहनामे के मुख्य संदेश यानी बुद्धि और बुद्धि से काम लेने को पाठक तक पहुंचाते हैं। वे अपनी किताब के पाठक को आरंभ से ही यह बता देते हैं कि जीवन, बुद्धिमत्ता के साथ बिताया जाना चाहिए। पूरे शाहनामे में जीवन, इंसान के आराम, उसके सौभाग्य व कल्याण से प्रेम और इसी तरह दूसरों को यातना देने, घृणा करने, युद्ध, रक्तपात और विध्वंस से दूरी की बात कही गई है। फ़िरदौसी का मानना है कि लोगों के जीवन, उनके विचारों और उनके व्यवहार का आधार बुद्धि होना चाहिए और बुद्धि से मुंह मोड़ना, मनुष्य की बर्बादी का कारण है।

उर्दू भाषा की शायरी विशेष कर ग़ज़लों में अक़्ल, बुद्धि और विवेक पर बहुत बल दिया गया है लेकिन अंतर यह है कि प्रायः उर्दू में अक़्ल के बजाए दिल और इश्क़ की प्रशंसा की गई है। इसका कारण यह है कि बुद्धि हर चीज़ में तर्क तलाश करती है जबकि दिल को तर्क की ज़रूरत नहीं होती वह तो हर अच्छी चीज़ को पसंद करता है। दिल को नतीजे की परवाह नहीं होती वह तो बस प्यार में फ़ना हो जाना चाहता है।

बेख़तर कूद पड़ा आतिशे नमरूद में इश्क़ अक़्ल है मह्वे तमाशाए लबे बाम अभी।

लाज़िम है दिल के साथ रहे पासबाने अक़्ल लेकिन कभी कभी उसे तन्हा भी छोड़ दे।

शाहनामे ईरान के वैचारिक व सांस्कृतिक उत्थान और बुद्धिमत्ता के काल की यादगार है। चौथी शताब्दी हिजरी वह काल है जिसमें ज़करिया राज़ी, इब्ने सीना और अलबीरूनी जैसे विद्वानों का प्रशिक्षण हुआ। यह वह काल था जिसमें सोचने और बुद्धि से काम लेने की शक्ति सरकार और शासकों के दिलों पर राज करती थी। फ़िरदौसी की यह किताब भलाई व बुराई और प्रकाश व अंधकार के बीच हमेशा जारी रहने वाली लड़ाई पर आधारित है। अन्याय, झूठ, तबाही व बर्बादी जैसे दुष्टता के बल, प्राकृतिक आपदाओं, देवों व तूरानियों के रूप में प्रकट होते हैं और न्याय, प्रेम, प्रसन्नता और विनम्रता जैसे सद्गुण ईरानी पहलवानों के अस्तित्व में प्रकट होते हैं।

बुद्धिमत्ता से काम लेने वाले एक व्यक्ति के रूप में फ़िरदौसी न केवल यह कि स्वयं बुद्धि का सम्मान करते हैं बल्कि दूसरों को भी इसकी अनुशंसा करते हैं। वे ज्ञान प्राप्ति के लिए हर प्रकार के दुख व कठिनाई सहन करने को उचित मानते हैं और उनका कहना है कि एक क्षण के लिए भी ज्ञान प्राप्ति से दूर नहीं होना चाहिए। फ़िरदौसी कहते हैं कि हर मनुष्य के जीवन में उसकी सबसे अच्छी व मूल्यवान कोशिश, ज्ञान बढ़ाने के लिए की जाने वाली कोशिश है क्योंकि उनके विचार में ज्ञान और ईश्वर की रचनाओं की पहचान मनुष्य को अंधविश्वास से दूर रखती है। फ़िरदौसी का कहना है कि हर वह चीज़ निंदनीय और अनुचित है जो बुद्धि व विचारों पर नकारात्मक प्रभाव डाले। उनके अनुसार मनुष्य और पशु के बीच एकमात्र अंतर सोच-विचार और बुद्धि का है और जो भी ज्ञान हासिल करने के लिए अपने विचारों को इस्तेमाल न करे वह उस जानवर की तरह है जिसका मूल्य केवल खाने और सोने की हद तक है।

फ़िरदौसी ने पूरे शाहनामे में इंसानों को टिकाऊ नैतिक मान्यताओं का निमंत्रण दिया है। वे इन मान्यताओं से रिक्त संसार को एक अंधेरे और डरावने जंगल की तरह बताते हैं जबकि इन मान्यताओं का पालन न करने वाले लोगों को वे इंसान ही नहीं समझते। इसी आधार पर उन्होंने हमेशा इंसानों को ज्ञान प्राप्ति, न्याय और सच्चाई का निमंत्रण दिया है। शाहनामे के पहलवानों के अस्तित्व में पाए जाने वाले सद्गुणों में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और नैतिक मान्यताएं शामिल हैं। फ़िरदौसी जिस बुद्धि की सिफ़ारिश करते हैं वह रुस्तम जैसे पहलवान में पाई जाती है जिसके माध्यम से वह ज़ोर-ज़बरदस्ती व अन्याय के सामने डट जाता है, आपत्ति करता है और लड़ता है ताकि अन्य व अत्याचार को समाप्त कर सके और अपने समय की स्थिति को बेहतर बना सके।

समकालीन साहित्यकार और शाहनामे के विशेषज्ञ मुहम्मद अमीन रियाही लोगों के जीवन में शाहनामे की भूमिका और उसके महत्व के बारे में कहते हैं कि अगर हम शाहनामे को पढ़ें और उसकी कहानियों के संदेशों को समझें तो हमारी इंसानियत बेहतर होती जाएगी और हमारे लिए जीवन का अर्थ अधिक सुंदर हो जाएगा। शाहनामे, शासकों के लिए न्याय के साथ देश के संचालन का पाठ है जबकि आम लोगों के लिए बेहतर भविष्य तक पहुंचने के लिए प्रयास के साथ जीवन का पाठ है। भलाई व बुराई के बीच निरंतर संघर्ष और बुद्धि का पालन, शाहनामे विशेष कर उसके पहलवानी वाले भाग का सबसे बड़ा पाठ है। (HN)

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