Dec ०७, २०१९ १५:४४ Asia/Kolkata

सोलह आज़र सन 1332 हिजरी शम्सी बराबर सात दिसम्बर सन 1953 ईरान के इतिहास में एक बहुत अहम दिन है और इसे छात्र दिवस का नाम दिया गया है।

यह दिन ईरानी राष्ट्र के साम्राज्य विरोधी आंदोलन की याद दिलाता है। यह दिन ईरान के छात्रों और युवाओं की ओर से वर्चस्ववादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी आंदोलन के आरंभ बिंदु में ईरानी राष्ट्र के संघर्ष के इतिहास में अंकित हो चुका है। सोलह आज़र सन 1332 को तेहरान विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने ईरान में अमरीका की हस्तक्षेपपूर्ण नीतियों के ख़िलाफ़ एक क्रांतिकारी क़दम उठाया जिसके प्रभाव छात्र समाज से भी आगे तक दिखाई दिए और इसी दिन की वजह से अमरीका से ईरानी राष्ट्र की घृणा की आवाज़ अधिक स्पष्ट रूप से दुनिया के कानों तक पहुंच गई। इस आधार पर सोलह आज़र सन 1332 की घटना को साम्राज्यवादी व्यवस्था और ईरान के आंतरिक मामलों में अमरीकी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिये।

16 आज़र वर्ष 1332 हिजरी शम्सी बराबर सात दिसम्बर सन 1953 को तेहरान विश्व विद्यालय के छात्रों ने तत्कालीन अमरीकी उप राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन की ईरान यात्रा के विरोध में प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन को शाह के पिट्ठू सैनिकों द्वारा कुचले जाने के परिणाम में तीन छात्र शहीद हुए। रिचर्ड निकसन ने ईरान में डाक्टर मुसद्दिक़ की सरकार के विरुद्ध अमरीका की सहायता से कराए गए विद्रोह के साढ़े तीन महीने बाद ईरान की यात्रा की थी। निक्सन की इस यात्रा का लक्ष्य इस विद्रोह के परिणाम से लाभ उठाते हुए वाशिंग्टन के अवैध हितों को हासिल करना था जिसका ईरानी छात्रों ने कड़ाई से विरोध किया। 16 आज़र को शाह के विशेष गार्ड के कुछ सिपाही तेहरान विश्वविद्यालय के परिसर में दाख़िल हुए और उन्होंने छात्रों को मारने पीटने के अतिरिक्त तीन छात्रों को शहीद कर दिया। अगले दिन निक्सन को इसी विश्वविद्यालय में डाक्ट्रेट की मानद उपाधि दी गई।

सोलह आज़र 1332 को तेहरान विश्व विद्यालय के तीन छात्रों को शाह की अत्याचारी सरकार के सुरक्षा कर्मियों ने गोली मार कर शहीद करने की घटना ईरान में ब्रिटेन और अमरीका की मिली भगत से होने वाले विद्रोह के सिर्फ़ साढ़े तीन महीने बाद हुई। सोलह आज़र को साम्राज्यवाद विरोधी जो आंदोलन आरंभ हुआ था वह वास्तव में ईरानी राष्ट्र के ख़िलाफ़ अमरीका की शत्रुतापूर्ण नीतियों की गहरी पहचान का नतीजा था और जब अमरीका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन तेहरान की यात्रा पर आए तो यह शत्रुता खुलकर सामने आ गई। सन 1953 में होने वाले विद्रोह के बाद अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइज़ेन हावर ने इस देश की कांग्रेस में उपराष्ट्रपति के ईरान जाने की सूचना दी और कहा कि निक्सन ईरान जा रहे हैं ताकि जो आशाजनक राजनीतिक सफलता मिली है उसकी निकट से समीक्षा कर सकें। आइज़ेन हावर के इन बयानों ने दर्शा दिया कि ईरान में होने वाले विद्रोह में अमरीका का ही हाथ था। यह बात ईरानी जनता विशेषकर छात्रों के क्रोध कारण बनी। इस विद्रोह के बाद बड़ी संख्या में अमरीका के सैन्य सलाहकार, वाशिंग्टन के अवैध हितों की रक्षा और अमरीकी सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन के लिए तेहरान आने लगे।

सोलह आज़र की घटना छात्रों द्वारा निक्सन की तेहरान यात्रा पर आपत्ति जताने के बाद घटी थी लेकिन वास्तव में यह ईरान में अमरीका की हस्तक्षेपपूर्ण नीतियों की आलोचना में वृद्धि को दर्शाती है। यद्यपि दमनकारी पहलवी शासन ने इस आपत्ति का जवाब गोली से दिया लेकिन इस रक्तरंजित दमन ने अमरीका से ईरानी राष्ट्र की घृणा को और ज़्यादा बढ़ा दिया और उसके ख़िलाफ़ ईरानी जनता की आवाज़ और ऊंची हो गई। इसी लिए कहा जा सकता है कि सोलह आज़र की घटनाओं ने ईरानी राष्ट्र के साम्राज्य विरोधी आंदोलनों को एक नई पहचान प्रदान कर दी। इस दृष्टि से सोलह आज़र की घटना के अनेक अहम संदेश थे क्योंकि यह घटना, ऐसी प्रतिक्रिया थी जो साम्राज्यवादी शक्तियों से ईरानी राष्ट्र के संघर्ष का रंग लिए हुए थी। अमरीका व उसके  क्षेत्रीय पिट्ठुओं के ख़िलाफ़ इस आंदोलन ने यह दिखा दिया कि विश्व साम्राज्य से ईरानी राष्ट्र का संघर्ष, एक गतिशील व अमर संघर्ष है।

1953 में होने वाले विद्रोह के बाद पिट्ठू शाह ने अमरीकी राष्ट्रपति के नाम एक पत्र लिखा जिसमें उसने अमरीका से तुरंत सहायता की अपील की और तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति आइज़ेन हावर ने भी शाह की अपील का सकारात्मक जवाब देते हुए तुरंत ईरान को साढ़े चार करोड़ डालर की सहायता दी। इसके बाद अमरीका और ईरान की शाही सरकार के संबंध गहरे होते गए यहां तक कि ईरान पूरी तरह से अमरीका के चंगुल में आ गया। 1953 में ईरान की क़ानूनी सरकार के ख़िलाफ़ अमरीका और ब्रिटेन ने जिस विद्रोह का षड्यंत्र रचा था उसमें दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि तत्कालीन ईरानी प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्दिक़ को हटा दिया जाएगा और ईरान की सत्ता दोबारा पूरी तरह से शाह के हाथ में दे दी जाएगी। अमरीका और ब्रिटेन की इस साज़िश की वजह से ईरान में फल फूल रहा प्रजातंत्र का पौधा दसियों साल तक के लिए मुरझा गया।

अमरीकी विदेश मंत्रालय ने पंद्रह जून सन 2017 को अपने कूछ गुप्त दस्तावेज़ों को सार्वजनिक किया। इन दस्तावेज़ों में वर्ष 1651 से 1954 के बीच ईरान से अमरीका के संबंधों और इसी तरह डाक्टर मुसद्दिक़ की सरकार को गिराने में अमरीका के गुप्तचर विभाग की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। इन दस्तावेज़ों के एक भाग में कहा गया हैः यद्यपि मुसद्दिक़ के कुछ अहम विरोधी हैं लेकिन जब तक तेल का विषय एक विवादित समस्या के रूप में बाक़ी रहेगा तब तक उन्हें सत्ता से हटाना संभव नहीं लगता। इन दस्तावेज़ों में उस समय के ईरान के हालात की समीक्षा करते हुए आंतरिक समस्याओं समेत कई अन्य बिंदुओं की ओर इशारा किया गया है और लिखा गया है कि मुसद्दिक़, राजनीति के क्षेत्र में शाह के अधिकारों को समाप्त किए जाने और संसद को सत्ता का मुख्य केंद्र बनाए जाने के इच्छुक हैं इस लिए यह ख़तरा मौजूद है कि मुसद्दिक़ अपने राष्ट्रप्रेमी संघर्ष को अमरीका के ख़िलाफ़ मोड़ कर अपनी सत्ता को बाक़ी रखने की कोशिश करें। यह भी संभव है कि वे अमरीका की ओर से और अधिक सैन्य सहायता को स्वीकार न करें और अमरीकी सैन्य सलाहकारों को ईरान से निकल जाने का आदेश दे दें।

इन दस्तावेज़ों में 19 अगस्त सन 1953 को ईरान में हुए विद्रोह से पहले के हालात के बारे में कहा गया है कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ब्रिटेन, शाह और सांसद जल्द या कुछ समय बाद मुसद्दिक़ की पोज़ीशन कमज़ोर करने की कोशिश करेंगे लेकिन मुसद्दिक़ को हासिल जन समर्थन के दृष्टिगत जब तक तेल के मुद्दे पर तनाव बाक़ी है तब तक इस बात की संभावना कम ही है कि शाह और संसद उनके विरोध की हिम्मत जुटा पाएंगे। इस लिए इस समय मुसद्दिक़ की सरकार को गिराने की संभावना न होने के बराबर है लेकिन अगर हिंसा से काम लिया जाए या फिर शाह की निगरानी में एक अर्ध तानाशाही सरकार का गठन कर दिया जाए तो यह संभव है। ये दस्तावेज़ और कुछ अन्य ठोस ऐतिहासिक प्रमाण भली भांति यह दर्शाते हैं कि 19 अगस्त सन 1953 के विद्रोह की साज़िश किस तरह तैयार की गई और किस तरह डाक्टर मुसद्दिक़ की क़ानूनी सरकार को गिराने का मार्ग समतल किया गया।

आज लगभग चालीस साल से अमरीका, ईरानी राष्ट्र के अधिकारों के समर्थन के झूठे दावे की आड़ में हर दिन ईरान के ख़िलाफ़ कोई न कोई चाल चलता है, षड्यंत्र रचता है और इस देश में हस्तक्षेप की कोशिश करता है लेकिन अब ईरान में कोई भी उसके झांसे में आने वाला नहीं है क्योंकि अमरीकी अधिकारी ख़ुद ही अपने बयानों में इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि ईरान में होने वाले उपद्रवों व अशांतियों का उन्होंने समर्थन किया है और इनमें लिप्त लोग उनके संपर्क में हैं। इससे ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की दुश्मनी की सीमा बड़ी हद तक स्पष्ट हो जाती है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने स्वयंसेवी बल बसीज के सदस्यों और समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात में इस बात का उल्लेख करते  हुए कि इस्लामी गणतंत्र ईरान को अमरीका या अमरीकी राष्ट्र से कोई समस्या नहीं है, कहा था कि ईरानी राष्ट्र की समस्या अमरीकी सरकार की ज़ोर-ज़बरदस्ती और अवैध मांगें हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के बयानों में एक अहम बिंदु बार बार दोहराया जाता है और वह इस बात पर ध्यान देना है कि ईरान से अमरीका की दुश्मनी की अस्ल वजह यह है कि ईरान ने अमरीका व इस्राईल के फूट डालने वाले क्षेत्रीय षड्यंत्रों को विफल बना दिया है। यही कारण है कि अमरीका की विदेश नीति निर्धारित करने वालों और उनके क्षेत्रीय घटकों ने अतीत में भी और इस समय भी ईरान को नुक़सान पहुंचाने के लिए अपना हर संभव प्रयास किया है। अलबत्ता ईरानी राष्ट्र अमरीका के मुक़ाबले में पूरी मज़बूती से डटा हुआ है और उसने दिखा दिया है कि इस्लामी क्रांति के सिद्धांतों व उमंगों का पालन करके संसार की बड़ी शक्तियों के वर्चस्ववाद को चुनौती दी जा सकती है। इसी वास्तविकता के दृष्टिगत सोलह आज़र की घटना को बरसों गुज़र जाने के बाद भी यह दिन पिछले पांच दशकों में अमरीका की शत्रुतापूर्ण नीतियों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध और साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास में एक कसौटी का दर्जा रखता है।

ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों ने पिछले 41 साल में विभिन्न प्रकार के षड्यंत्रों के माध्यम से इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को कमज़ोर करने बल्कि उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की कोशिशें की हैं। जब ईरान पर युद्ध थोपने और उसका आर्थिक परिवेष्टन करने की ओर से वे निराश हो गए तो उन्होंने ईरान के ख़िलाफ़ मानसिक युद्ध शुरू कर दिया ताकि अपने विचार में ईरानी जनता को निराश करके और ईरान की स्वाधीनता व सुरक्षा को नुक़सान पहुंचा कर अपने लक्ष्य हासिल कर लेकिन इन सबके बावजूद वे अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सके हैं और इस्लामी क्रांति व इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के स्तंभों को नुक़सान नहीं पहुंचा सके हैं।

वास्तव में सोलह आज़र की घटना ने यह दिखा दिया कि ईरानी राष्ट्र कभी भी अमरीका के हस्तक्षेप और वर्चस्ववाद को सहन नहीं करेगा। स्पष्ट है कि ईरान के मुक़ाबले में अमरीकी सरकार का वास्तविक लक्ष्य इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने के अलावा कुछ नहीं है और इसी लिए 16 आज़र की घटना ईरानी राष्ट्र के इतिहास और उसकी याददाश्त से कभी भी मिट नहीं सकती क्योंकि यह, उस साम्राज्यवादी शक्ति से दुश्मनी का वास्तविक चित्र है जिसने विभिन्न साज़िशों से ईरानी राष्ट्र पर वर्चस्व जमाने की कोशिश की लेकिन कभी भी सफल नहीं हो सकी। (HN)

 

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