May ०३, २०२० १९:०१ Asia/Kolkata

हम इस कार्यक्रम में 1980 के दशक में इस्लामी गणतंत्र ईरान पर इराक़ की सद्दाम सरकार की ओर से थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध की महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बता रहे हैं।

पिछले कार्यक्रम में हमने फ़त्हुल मुबीन नामक सैनिक सैनिक आप्रेशन के बारे में चर्चा की जो युद्ध शुरू होने के बाद के 18 महीनों के भीतर ईरान की ओर से अंजाम दिए जाने वाले तीन बड़े सैनिक आप्रेशनों में से एक था। यह आप्रेशन इराक़ी सेना के क़ब्ज़े में जाने वाले ईरानी इलाक़ों को आज़ाद कराने के लिए अंजाम दिए गए थे। फ़त्हुल मुबीन बहुत बड़ी सफलता दिलाने वाले आप्रेशन था इससे ख़ुर्रमशहर को इराक़ी सेना के क़ब्ज़े से आज़ाद कराने का रास्ता साफ़ हुआ। यह आप्रेशन वास्तव में युद्ध में जनता की केन्द्रीय भूमिका और सहयोग का दर्पण है और इससे साबित हुआ कि लोग जब ईमान की ताक़त के सहारे आगे बढ़ते हैं तो कितनी बड़ी सफलताएं मिलती हैं। इस आप्रेशन में सेना और पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स का अदभुत समन्वय भी स्पष्ट रूप में दिखाई दिया। पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स ने जिसकी लगभग 32 बटालियनों ने तरीक़ुल क़ुद्स नामक आप्रेशन में हिस्सा लिया था फ़त्हुल मुबीन आप्रेशन में अपनी 135 बटालियनों के साथ मैदान में क़दम रखे तथा उसने अपनी पहली बक्तरबंद ब्रिगेड भी मैदान में उतारी। जब फ़त्हुल मुबीन आप्रेशन ख़त्म हुआ तो ईरानी सैनिकों के हाथ में 2500 वर्ग किलोमीटर का एक बड़ा इलाक़ा वापस आ चुका था। उन्होंने देज़फ़ूल, शूश और अंदीमिश्क जैसे शहरों को इराक़ी सैनिकों के हमलों की रेंज से बाहर निकाल लिया था तथा इराक़ी सेना को बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुंचाया  था। न्यूयार्क टाइम्ज़ ने लिखा कि युद्ध की शुरुआत से अब तक की इराक़ियों की यह सबसे शर्मनाक हार थी। इराक़ी सैनिकों को संयुक्त सीमा तक पीछे हटना पड़ा था और उनकी तीन बटालियनें पूरी तरह ध्वस्त हो गई थीं। नस्र छावनी के सैनिकों ने आप्रेशन शुरू होने से पहले बहुत तेज़ गति से ख़ुद को इराक़ी सेना के तोपख़ाने के क़रीब पहुंचा दिया और इस बात का ध्यान रखा कि इस बीच उनकी इराक़ी सैनिकों से कोई झड़प न हो। उन्होंने इराक़ी सैनिकों के तोपख़ाने पर नियंत्रण कर लिया। तोपख़ाने के कमांडर ने हाई कमान को सूचना दी कि तोपख़ाने पर ईरानी सैनिकों ने क़ब्ज़ा कर लिया है। हाई कमांड से उसे फटकार पड़ी कि जब तुम्हारे सामने हमारी कई बटालियनें मौजूद हैं तो यह कैसे संभव है कि तोपख़ाने पर हमला हो गया हो? ईरान की थल सेना के कमांडर शहीद अली सय्याद शीराज़ी फ़तहुल मुबीन आप्रेशन के बारे में कहते हैं कि इस आप्रेशन के नतीजे में इराक़ी सेना के जो सैनिक भारी संख्या में घायल हुए थे और क़ैदी बनाए गए थे उनके स्थानान्तरण में कठिनाई आ रही थी। देज़फ़ूल के मोमिन लोगों ने सेना के साथ सहयोग किया और अपनी गाड़ियों और पिकअप्स के साथ आ गए और उन्होंने हमारा हाथ बंटाया। वह घायल और क़ैदी बनाए गए इराक़ी सैनिकों को अपने साथ ले जाते थे।

 

अगर यह देखा जाए कि इराक़ की बास सरकार की सेना को इस आप्रेशन के नतीजे में कितने बड़े पैमाने का नुक़सान उठाना पड़ा तो फ़तहुल मुबीन आप्रेशन का महत्व और भी स्पष्ट हो जाता है। इस आप्रेशन के नतीजे में एक तो 2500 वर्ग किलोमीटर का बड़ा इलाक़ा इराक़ी सेना के क़ब्ज़े से आज़ाद हुआ। ईरानी सैनिक इस आप्रेशन के नतीजे में शूश  और देज़फ़ूल से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय सीमा तक पहुंच गए। राडार केन्द्र4 और 5 को आज़ाद करा लिया गया कई गांव और महत्वपूर्ण इलाक़े इराक़ी सेना के क़ब्ज़े से स्वतंत्र हुए। देज़फ़ूल-दिलहुरान राजमार्ग को भी आज़ाद कराया गया जो स्ट्रैटैजिक महत्व रखता था। देज़फ़ूल, अंदीमिश्क, शूश तथा दूसरे कई महत्वपूर्ण शहर इराक़ी सेना की गोलियों और हमलों की पहुंच से दूर हो गए। इस आप्रेशन में इराक़ी सेना को बहुत बड़े पैमाने पर नुक़सान उठाना पड़ा था। इराक़ी सेना की कम से कम चार कंपनियां पूरी तरह ध्वस्त हो गईं। इराक़ी सेना के 15 हज़ार से अधिक सैनिक तथा अफ़सर क़ैदी बना लिए गए। इराक़ी सेना के 361 टैंक और बक्तरबंद गाड़ियां ध्वस्त हुईं। इराक़ी सेना के 18 युद्धक विमान और 3 हेलीकाप्टर मार गिराए गए। 300 गाड़ियां ध्वस्त कर दी गईं। 50 तोपें भी नष्ट कर दी गईं। यह फ़तहुल मुबीन से इराक़ी सेना को पहुंचने वाले बड़े नुक़सान थे। इसी तरह इराक़ी सेना के 320 टैंक और बक्तरबंदी गाड़ियां, 500 गाड़ियां, 165 तोपें तथा दूसरे अनेक सैन्प उकपरण ईरानी जियालों के हाथ में आ गए। इस आप्रेशन के नतीजे में हताहत और घायल होने वाले इराक़ी सैनिकों की संख्या 25 हज़ार से अधिक थी। इस आप्रेशन का नतीजा यह निकला कि इराक़ी सेना बिखराव का शिकार हो गई। यह देखते हुए इराक़ी शासकों की चिंता बढ़ गई। ईरान की यह बड़ी सफलता  सद्दाम के क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समर्थकों की नज़र से भी दूर नहीं थी। उन्हें नज़र आने लगा था कि सद्दाम की स्थिति डावांडोल हो चुकी है। सद्दाम सरकार की कमज़ोर स्थिति और शक्ति का संतुलन इस्लामी गणतंत्र ईरान के पक्ष में हो जाना विदेशी मीडिया की नज़रों से भी छिपा हुआ नहीं था यह हक़ीक़त विदेशी मीडिया में नज़र आने लगी। जैसे कि बैरूत में टाइम्ज़ अख़बार के पत्रकार राबर्ट फ़िस्क ने लिखा कि हालिया घटनाओं के मूल्यांकन से जिनके कारण इराक़ भी काफ़ी डरा हुआ है यही नतीजा निकाला जा सकता है कि दोनों पक्षों के बीच शक्ति का संतुलन न होने और ईरान का पलड़ा भारी होने के कारण आगे चल कर ईरान यह युद्ध जीत सकता है। अब हालत यह है कि सद्दाम अरवंद नदी को इराक़ का हिस्सा नहीं कह रहे हैं बल्कि ईरान से वार्ता शुरू करने की राह तलाश कर रहे हैं और यदि वार्ता शुरू हो जाए तो कुछ चरणों में सद्दाम सरकार अपने सैनिकों को ईरान की धरती से बाहर निकालने पर तैयार हो जाएगी।

 

फ़त्हुल मुबीन आप्रेशन के नतीजे में बड़े पैमाने पर इलाक़ों की आज़ादी के बाद बीबीसी के रेडिया प्रसारण ने कहा कि पश्चिमी इंटेलीजेन्स विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया झड़पों में इराक़ के मुक़ाबले में ईरान की स्थिति बहुत मज़बूत हो चुकी है और वह युद्ध जीत रहा है। पश्चिम में सामरिक मामलों के विशेषज्ञ इस आप्रेशन को ईरान की बहुत बड़ी सफलता के रूप में देख रहे हैं। ईरान की सशस्त्र फ़ोर्सेज़ की संख्या बहुत अधिक है और उनका मनोबल बहुत बढा हुआ है। बीबीसी ने ईरानी जियालों की विजय की बात करते हुए इलाक़े में इस विजय से पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन करते हुए कहा कि ईरान की शानदार विजय और सद्दाम शासन के पतन का पता देने वाली गिनती शुरू हो जाने के बाद यह समझा जा रहा है कि इलाक़े के बहुत से देशों के लिए ख़तरे की घंटी बज चुकी है। सद्दाम की यह बड़ी पराजय इस पूरे इलाके में एक नई सामरिक सच्चाई को स्थापित कर सकती है जिसके बड़े गहरे राजनैतिक और स्ट्रैटेजिक प्रभाव होंगे। इस प्रकार के हालात में सद्दाम सरकार संघर्ष विराम की कोशिश में लग गई हालांकि अभी स्थिति यह थी कि ईरान के कई शहर इराक़ी सैनिकों के क़ब्ज़े में थे तथा ईरान का कई सौ वर्ग किलोमीटर का भूभाग़ इराक़ी सेना के नियंत्रण में था। 27 मार्च 1982 को रोयटर्ज़ ने इराक़ की समाचार एजेंसी के हवाले से लिखा था कि आज सद्दाम ने ईरान के साथ संघर्ष विराम करने और विवादों को शांतिपूर्ण मार्गों से हल करने की इच्छा जताई है जिससे दोनों देशों के एतिहासिक और क़ानूनी अधिकारों की न्यायपूर्ण रूप से रक्षा हो। मिस्र के तत्कालीन तानाशाह हुस्नी मुबारक ने अमरीका तथा पश्चिमी देशों से मांग की कि वह फ़ौरन कुछ करें। मोरक्को के नरेश हसन और सूडान के शासक जाफ़र नुमैरी भी सद्दाम के पक्के समर्थकों में थे। वह भी सद्दाम को बचाने के लिए हरकत में आ गए। सद्दाम के समर्थकों ने अब शांति और राजनैतिक समाधान की बातें शुरू कर दीं। वह ईरान की सेना के एतिहासिक बैतुल मुक़द्दस आप्रेशन का रास्ता बंद करना चाहते थे। यह आप्रेशन ख़ुर्रमशहर को आज़ाद कराने के लिए किया  गया  था। जहां एक तरफ़ सद्दाम और उसके समर्थकों ने शांति और संघर्ष विराम की बातें शुरू कर दीं वहीं इराक़ के लिए चारों तरफ़ से भारी सामरिक सहायताएं पहुंचने लगीं। मिस्र जार्डन, सूडान और मोरक्को ने अपने हज़ारों सैनिक इराक़ भेजे।

इराक़ ने अपनी सैनिक शक्ति दक्षिणी इलाक़ों में केन्द्रित कर दी और हर तरह से यह कोशिश की कि ईरान के निर्णायक सैनिक आप्रेशन का रास्ता रोक दे मगर फ़त्हुल मुबीन आप्रेशन से इराक़ी सेना पर इतना गहरा आघात लगा कि वह अपने सैनिक तथा उपकरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में असमर्थ हो गई। इस सब के बावजूद दक्षिणी इलाक़े में ख़ुर्मशहर जाने वाले रास्ते एक गंभीर समस्या बने हुए थे और जटिलता बढ़ती जा रही थी। इराक़ी सैनिकों ने इलाक़े में बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं और हर तरह से इस इलाक़े को अपने नियंत्रण में रखने के लिए हर ज़रूरी तैयारी कर रखी थी। उन्होंने ख़ुर्रमशहर के आस पास के इलाक़ों में अपने सैनिक तैनात करके और बंकर बनाकर अपनी अवधारणा के अनुरूप इसे मज़बूत दुर्ग बना लिया था। एक के पीछे दूसरा बंकर बनाया गया था। बारूदी सुरंगे बिछाने के बाद उन इलाक़े के पीछे बड़ी संख्या में सैनिकों को तैनात किया गया था। पूर्स सोवियत संघ ने उस समय इराक़ की मदद करते हुए उसे युद्धक विमान दिए। जर्मनी और इटली ने बड़ी संख्या में टी-72 टैंक दिए। इसी तरह कई प्रकार के मिसाइल तथा दूसरे बहुत से सैन्य उपकरण सद्दाम को दिए गए। कुवैत, सऊदी अरब तथा फ़ार्स खाड़ी के अन्य धनवान देशों ने भारी मात्रा में अपने पेट्रो डालर सद्दाम को दिए थे। विदित रूप से तो यह तैयारी पूरी हो चुकी थी कि ईरान किसी भी मोर्चे पर कोई प्रगति न कर सके लेकिन इस्लामी गणतंत्र ईरान के नेताओं, जनता और सैनिकों की ईमान की शक्ति और ठोस इरादों ने अपना जौहर दिखाया।

 

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