Feb २३, २०२१ १३:१० Asia/Kolkata

20 जनवरी को अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण के ठीक एक महीने बाद जो बाइडन ने पहली बार एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंच से अमरीका इज़ बैक के साथ विश्व में अमरीका के वनवास की समाप्ति का एलान किया। 

ईरान के परमाणु समझौते समेत अमरीका को महत्वपूर्ण वैश्विक समझौतों और संस्थाओं से बाहर निकालने वाले अपने पूर्ववर्ती डोनल्ड ट्रम्प की अलगाववादी विदेश नीति से अलग, वर्चुअल म्यूनिख़ सुरक्षा सम्मेलन में जी-7 के नेताओं को संबोधित करते हुए बाइडन ने पेरिस जलवायु संधि समेत बहुपक्षीय समझौतों में वाशिंगटन की वापसी की बात दोहराई।  बाइडन का कहना था कि उनका प्रशासन 5+1 देशों के अंतर्गत फिर से वार्ता में शामिल होने के लिए तैयार है। दरअसल, बाइडन और उनके अधिकारी यूरोपीय देशों के साथ मिलकर परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने की तो बात कर रहे हैं, लेकिन इस बारे में वह अमरीका की स्थिति को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर रहे हैं और तेहरान की शर्त का सीधा जवाब देने से भी कतरा रहे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर राष्ट्रपति और विदेश मंत्री तक साफ़ तौर पर यह एलान कर चुके हैं कि मनमाने ढंग से किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते की धज्जियां उधेड़ना और फिर बिना कोई व्यवहारिक क़दम उठाए उसमें वापस लौटने की बात करना, इतना आसान नहीं होना चाहिए। अमरीका और यूरोप द्वारा तेहरान से परमाणु समझौते पर पुनः पूर्ण रूप से अमल की मांग के जवाब में ईरानी अधिकारियों का कहना है कि समझौते का उल्लंघन अमरीका ने किया है, इसलिए पहले वह अपनी ग़लती सुधारे और ट्रम्प द्वारा लगाए गए सभी प्रतिबंध हटाए, उसके बाद एक बार फिर ईरान समझौते को पूर्ण रूप से लागू करने के लिए तैयार है। इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता ने कहा कि अमेरिका और तीन यूरोपीय देशों को यह हक़ ही नहीं है कि वह परमाणु समझौते को लेकर कोई शर्त रखें, क्योंकि उन्होंने इस समझौते के प्रति अपने वादों पर किसी भी तरह का कोई अमल ही नहीं किया है। 

लेकिन बाइडन प्रशासन हाथ में फूल और बग़ल में छुरी लेकर विश्व में अमरीका की ख़राब छवि में सुधार करने और ट्रम्प नामक भूत से छुटकारा हासिल करने का प्रयास कर रहा है। इसीलिए ईरानी अधिकारियों को वाशिंगटन की नीयत पर संदेह है, जो किसी हद तक बिल्कुल जायज़ है। अमरीका कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधियों को लेकर, विश्व समुदाय का भरोसा तोड़ चुका है और अब उसे एक भरोसेमंद पक्ष के रूप में नहीं देखा जाता है। इसके बावजूद, बाइडन प्रशासन घिसीपिटी चालों और कूटनीतिक हथकंडों के ज़रिए विश्व समुदाय की आंखों में धूल झोंकना चाहता है। हालांकि ईरानी अधिकारी विशेष रूप से सुप्रीम लीडर विश्व समुदाय को यह समझाने की कोशिश करते रहे हैं कि अमरीका किसी भी स्थिति में भरोसेमंद नहीं है, इसलिए वे बातों और वादों के झांसे में आने वाले नहीं हैं, बल्कि उनकी निगाहें क़दमों पर होंगी कि वह उठ भी रहे हैं या नहीं। आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने कहा कि अमेरिका पहले सभी प्रतिबंधों को समाप्त करे और उसके बाद हम उसकी वास्तविक्ता की जांच करेंगे और अगर वास्तव में प्रतिबंध समाप्त हो गए होंगे तब हम भी अपने वादों पर अमल करेंगे। बाइडन जब यह कहते हैं कि अमरीका, परमाणु समझौते में शामिल होना चाहता है, और उनके विदेश मंत्री यह एलान करते हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ ग़ैर परमाणु प्रतिबंध यथावत जारी रहेंगे, तो वाशिंगटन के प्रति तेहरान द्वारा अविश्वास जताने पर पश्चिमी दुनिया में हाय-तौबा मच जाती है। प्रतिबंध हटाने से पहले तेहरान द्वारा वार्ता के प्रस्ताव को रद्द करने पर अमरीका में फ़्रांस के राजदूत रह चुके जेरार्ड अरॉद का कहना थाः किसी भी बातचीत से पहले सीना पीटने का चरण होता है, जो हम ईरान की ओर से देख रहे हैं।

वास्तविकता तो यह है कि परमाणु समझौते में शामिल तीन यूरोपीय देश, ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी ट्रम्प प्रशासन के सामने कठपुतली बने रहे और उन्होंने बातों और दावों से बढ़कर इस समझौते को बचाने के लिए कोई व्यवहारिक क़दम नहीं उठाया। परमाणु समझौते में वापसी की इच्छा जताने भर से ही यूरोपीय देश इतने उतावले हो गए कि उन्होंने तेहरान पर पूर्ण रूप से अपनी परमाणु प्रतिबद्धताओं पर अमल करने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया और अमरीकी प्रतिबंधों के जारी रहने की स्थिति में ईरानी संसद द्वारा आईएईए के साथ सहयोग में कमी के लिए निर्धारित की गई समयसीमा को लेकर धमकी दे डाली। हालांकि ईरानी अधिकारी कई बार तीनों यूरोपीय देशों के अधिकारियों को आईना दिखा चुके हैं और यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वे इस स्थिति में नहीं हैं कि ईरान के लिए ज़िम्मेदारी का निर्धारण करें। भारत के वरिष्ठ राजनीतिक टीकाकार सौरभ कुमार शाही से जब पूछा गया कि परमाणु समझौते को लेकर फिर क्यों अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से दोबारा वार्ता की बात कही जा रही है तो उन्होंने इस बारे में जवाब देते हुए कहा कि ईरान परमाणु समझौते को लेकर हमेशा से कटिबद्ध रहा है और यही वजह है कि आजतक पश्मिचमी मीडिया भी ईरान पर किसी तरह का कोई आरोप नहीं लगा सका है।   

कुल मिलाकर यूरोपीय संघ को चाहिए कि अगले क़दम के तौर पर तत्काल रूप से एक बैठक का आयोजन करे, जिसमें अमरीका से ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों को हटाने की मांग रखी जाए। अमरीका ने यूरोप के साथ मिलकर परमाणु समझौते पर फिर से काम करने की सहमति भी जता दी है। यूरोप को चाहिए कि इस ऐतिहासिक अवसर से लाभ उठाए और पूर्व की अपनी ग़लतियों में किसी हद तक सुधार करे।शुक्रवार को ईरानी विदेश मंत्री ज़रीफ़ ने एक ट्वीट के ज़रिए यह सुझाव दिया कि अमरीका अभी बहुत दूर नहीं गया है और वह चाहे तो परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने के लिए तत्काल रूप से कुछ उपाय कर सकता है। साथ ही उन्होंने दोहराया कि ईरान पहले प्रतिबंध को हटाने की अपनी शर्त से पीछे नहीं हटेगा। ज़रीफ़ ने हैशटैग #CommitActMeet का इस्तेमाल भी किया, जिसका अर्थ है कि अमरीका को पहले अमल करना होगा, उसके बाद ही बात आगे बढ़ सकती है।

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