Apr ०४, २०२१ १७:२४ Asia/Kolkata

अमरीका में जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद, उनके और उनके मंत्रीमंडल के सदस्यों के बयान व रवैये को देखने से, बीजिंग-वॉशिंग्टन के बीच तनाव के नए दौर के शुरू होने का पता चलता है।

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने चुनावी प्रचार के दौरान बाइडेन पर चीन की ओर रुझान रखने का इल्ज़ाम लगाया था और बाइडेन के सत्ता में पहुंचने पर चीन ने ख़ुशी ज़ाहिर की थी लेकिन इसके बावजूद, बाइडेन के वाइट हाउस पहुंचने के बाद से चीन-अमरीका संबंध का ग्राफ़ दिन ब दिन नीचे की तरफ़ जा रहा है।

इस वक़्त बीजिंग-वॉशिंग्टन संबंध विभिन्न क्षेत्रों में संकटग्रस्त हो गए हैं। वॉशिंग्टन आर्थिक़ व्यापारिक, सैन्य, सुरक्षा और मानवाधिकार के क्षेत्र में चीन की कार्यवाहियों की आलोचना कर रहा है। चीन के संबंध में बाइडेन के नज़रिये में बदलाव, चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग से टेलीफ़ोन पर हुयी बातचीत के बाद सामने आया। 11 फ़रवरी 2021 को बाइडेन ने इस बात को बताते हुए कि शी जिन पिंग के साथ उनकी दो घंटे तक टेलीफ़ोन पर बातचीत हुयी, दावा कियाः“अगर अमरीका ने चीन की नीति के संबंध में कोई क़दम न उठाया तो वे हमारा हिस्सा खा जाएंगे।”

बाइडन इससे पहले भी चीन पर अपना दृष्टिकोण बहुत खुलकर बयान करते आए हैं।

वाइट हाउस ने भी जो बाइडेन और शी जिन पिंग के बीच टेलीफ़ोन पर हुयी बातचीत के बारे में एक बयान में कहाः “राष्ट्रपति बाइडेन ने बीजिंग की अन्यायपूर्ण आर्थिक शैली, हांग कॉन्ग में दमन, सिन कियांग में मानवाधिकार के उल्लंघन, ताइवान सहित क्षेत्र में उसकी दुस्साहस भरी कार्यवाहियों पर गहरी चिंता जतायी।” यह ऐसी हालत में है इससे पहले बाइडेन, चीन के संबंध में ट्रम्प के कड़े रवैये की आलोचना किया करते थे और ट्रम्प के दौर में चीन पर लगाए गए टैरिफ़ और वॉशिंगटन के कड़े रवैये को ग़ैर ज़रूरी और बेनतीजा बताते थे। इस तरह चीन के बारे में बाइडेन का नज़रिया, 2019 के उनके भाषण की तुलना में मूल रूप से बदल गया है।       

आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में अब बाइडेन का भी ट्रम्प की तरह यह मानना है कि अमरीका के मुक़ाबले में चीन की कार्यवाही और रवैये से बहुत ज़्यादा आर्थिक नुक़सान हुआ है और वह बीजिंग की आर्थिक शैली को क़ुबूल करने के लिए तय्यार नहीं है। 2018 में ट्रम्प की ओर से चीन के ख़िलाफ़ शुरू की गयी व्यापारिक जंग और दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौते के नतीजे में चीन को अमरीकी उत्पादों के निर्यात बढ़ने के बावजूद, आंकड़ा बताता है कि अभी भी दोनों देशों के बीच बैलेन्स ऑफ़ पेमन्ट चीन के हित में झुका हुआ है। अस्ल में ट्रम्प ने चीन के साथ व्यापारिक नुक़सान ज़्यादा होने के बहाने उसके ख़िलाफ़ व्यापारिक जंग शुरू की और चीन से वस्तुओं के आयात पर टैरिफ़ बढ़ाने से इसके इन्डेक्स में कमी आने का अनुमान था, लेकिन चीन के कोरोना वायरस को क़ाबू में करने के बाद, चीनी मेडिकल उपकरणों और घर से बैठ कर काम करने में सहायक मशीनों की अमरीका में मांग बढ़ी जिसकी वजह से बढ़ा हुआ टैरिफ़ भी चीनी माल के अमरीका में आयात को बढ़ने से नहीं रोक पाया, इसी वजह से चीन के साथ अमरीका का बैलेन्स ऑफ़ ट्रेड फिर चीन के हित में झुक गया।

वन मिनट इकानामिक्स नाम के यूट्यूब चैनल ने अपनी संक्षित रिपोर्ट में यह समझाने की कोशिश की कि दोनों देशों के बीच आर्थिक युद्ध की वजह क्या है।

रिपोर्ट में यह बताया गया कि चीन और अमरीका के बीच व्यापार तो 737 अरब डालर का होता है मगर चीन ने वर्ष 2018 में हुए इस व्यापार में अमरीका को 558 अरब डालर का सामान और सेवाएं निर्यात कीं जबकि अमरीका चीन को केवल 179 अरब डालर का ही निर्यात कर पाया।

अमरीका इस असंतुलन तो ठीक करने के लिए चीनी उत्पादों पर भारी टैक्स लगाने की नीति पर चल रहा था लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या अमरीका इस रास्ते से व्यापार के इस असंतुलन को ठीक कर पाएगा? रिपोर्ट तो यही कहती है कि यह संभव नहीं होगा

दरअस्ल दोनों देशों के बीच व्यापार के मामले में बहुत सी पेचीदगियां हैं जो इतनी आसानी से दूर होने वाली नहीं हैं।

वॉशिंगटन-बीजिंग के बीच प्रतिस्पर्धा का दूसरा क्षेत्र सैन्य है। इस बारे में अमरीकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने 4 मार्च 2021 को अमरीकी सशस्त्र बल के नाम संदेश में, चीन को इस मंत्रालय की सबसे बड़ी चुनौती क़रार दिया और कहाः “चीन के संबंध में हमारा रवैया, अमरीका की आंतरिक व विदेशी नीति को आगे बढ़ाने पर आधारित होगी।” पेन्टगॉन के प्रमुख ने बल दियाः “चीन को अपनी चुनौतियों में सबसे ऊपर क़रार दें।” अलबत्ता ऐसे बयान सिर्फ़ अमरीकी रक्षा मंत्री तक मित नहीं हैं, अमरीकी विदेश मंत्री ऐन्टोनी ब्लिन्केन भी इससे पहले कह चुके हैः “चीन पहली चुनौती है जिसका अमरीका को सामना है।”

एक अवसर पर तो चीन और अमरीका के अधिकारियों के बीच आमने सामने आरोपों का आदान प्रदान हुआ। अमरीकी विदेश मंत्री ब्लिंकन ने कई मुद्दे उठाए।

जवाब में चीन के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने अमरीका पर साबइर हमलों में लिप्त होने सहित अनेक आरोप लगाए।

इन्डो पेसिफ़िक क्षेत्र में अमरीकी सेना के कमांडर ऐडम फ़िलिप डेविड्सन ने भी अभी हाल में चीन के मुक़ाबले में अमरीका की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने पर बल दिया। डेविडसन ने एक सम्मेलन में कहा थाः “हिन्द व प्रशांत महासागर क्षेत्र में अमरीका के सामने सबसे बड़ा ख़तरा, चीन के मुक़ाबले में प्रतिरोधक शक्ति में कमी है। यह सच्चाई है।”

चीन के बारे में बाइडेन सरकार की नीति में ताज़ा बदलाव, अमरीकी विदेश मंत्री ऐन्टोनी ब्लिन्केन का 13 मार्च को ताइवान के बारे में बयान है जिसमें उन्होंने ताइवान को एक देश कहा है। उनका यह बयान 1970 के दशक में निक्सन के राष्ट्रपति काल से अखंड चीन का समर्थन करने की अमरीकी नीति के ख़िलाफ़ है। ब्लिन्केन ने ताइवान के बारे में अमरीकी अधिकारियों की ओर से इस्तेमाल होती आ रही शब्दावली के ख़िलाफ़ जाते हुए उसे देश कहा, जबकि अमरीकी अधिकारी ताइवान को द्वीप ही कहा करते थे। ब्लिन्कन का ताइवान को देश कहना, अमरीका की ओर से चीन की सबसे बड़ी लाल रेखा को नज़रअंदाज़ करने के अर्थ में है जो बीजिंग की ओर से कड़े रिएक्शन का कारण बनेगी।

एक और चीज़ जिसकी बाइडेन सरकार कोशिश कर रही है वह इन्डो-पेसिफ़िक क्षेत्र में चीन के ख़िलाफ़ गठबंधन बनाना है, जिसका प्रतीक गुट-4 का गठन है जिसके सदस्य अमरीका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत हैं। इस गुट के गठन का लक्ष्य चीन की कार्यवाहियों का मुक़ाबला करना है और इसका पहला शिखर सम्मेलन 12 मार्च को वर्चुअल तरीक़े से आयोजित हुआ।

ऐसा लगता है कि इस तरह के बयानों से हट कर अगर देखें तो वॉशिंगटन की अस्ल चिंता अगले कुछ साल में चीन का आर्थिक सुपर पावर के रूप में उदय और दिन ब दिन उसकी बढ़ती सैन्य ताक़त है जिससे पूर्वी एशिया में अमरीका के सामने चुनौती खड़ी हो गयी है। इस वक़्त अमरीका-चीन के बीच तनाव आर्थिक, व्यापारिक़ भूराजनैतिक और रणतैनिक विषयों को लेकर है, जिसमें, हॉन्ग कॉन्ग, सिन कियांग, ताइवान, दक्षिणी व पूर्वी चीन सागर में जलक्षेत्र को लेकर मतभेद जैसे मामलों में वॉशिंगटन के बारंबार हस्तक्षेप से तेज़ी आ रही है। इसलिए ऐसा लगता है कि बाइडेन के सत्ताकाल में वॉशिंगटन-बीजिंग के बीच तनाव का नया दौर शुरू होगा।

राजनैतिक टीकाकार मोहसिन शरीअत के मुताबिक़, चीन प्रतिद्वंदवी बनने में रूचि नहीं रखता लेकिन अमरीका आंतरिक तकाज़ों के तहत इसे हवा देगा। इसी वजह से चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिन्ग ने बाइडेन और उनके मंत्रीमंडल के वरिष्ठ सदस्यों के बयान की प्रतिक्रिया में अमरीका को दुनिया में अस्त व्यस्तता का स्रोत बताते हुए उसे चीन की सुरक्षा व विकास के लिए सबसे बड़ा ख़तरा कहा है।

 

 

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