Jul ०९, २०२२ १४:१७ Asia/Kolkata

दोस्तो अरफ़ा का दिन एक ऐसा पवित्र दिन है कि जिस दिन हम एक ऐसी मन को सुकून देने वाली दुआ पढ़ते हैं कि जिस दुआ को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अरफ़ात के मरुस्थल में पढ़ी थी।

इमाम सादिक अलैहिस्सलाम से पूछा गया कि अरफ़ा को क्यों अरफ़ा कहा जाता है? इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि अल्लाह के फ़रिश्ते जिब्रईल ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम को अरफ़ा के दिन इस स्थान पर लेकर आए थे। क्यों दोपहर के समय था तो जिब्रईल ने कहा कि हे इब्राहीम अपने ग़लतियों को स्वीकार करो, इसके तरीक़े को सीखो, क्योंकि जिब्रईल ने कहा था कि स्वीकार करो, इसलिए इस स्थान को अरफ़ात के नाम से जाना जाने लगा है। अरफ़ात पवित्र नगर मक्का से 21 किलोमीटर दूर जबलुर्रहमा नामक पहाड़ के आंचल में एक मरूस्थलीय क्षेत्र है। ऐसा विशाल मैदान जहां इन्सान सांसारिक व भौतक चीज़ों को भूल जाता है। हज के अविस्मरणीय संस्कारों में से एक अरफ़ात के मैदान में ठहर कर ईश्वर की उपासना करना भी है। ज़िलहिज्ज महीने की 9 तारीख़ को हाजियों को सुर्योदय से सूर्यास्त तक अरफ़ात के मैदान में ठहरना होता है। जहां वे रुक कर अल्लाह की इबादत करते हैं। अरफ़े का दिन दुआ और इबादत के लिए कुछ ख़ास दिनों में से एक है, विशेषकर जब उस दिन अरफ़ात के मैदान में हों।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) अरफ़े के दिन के महत्व के बारे में बताते हुए फ़रमाते हैं कि “जब लोग अरफ़ात में ठहरते हैं और अपनी मांग को गिड़गिड़ा कर पेश करते हैं तो ईश्वर फ़रिश्तों के सामने इन लोगों पर गर्व करता है और उनसे कहता है, क्या नहीं देखते कि मेरे बंदे बहुत दूर से गर्द में अटे मेरे पास आए हैं। अपना पैसा मेरे मार्ग में ख़र्च किया है और अपने शरीर को थकाया है? मैं अपनी शाम की क़सम खाता हूं कि उन्हें इस तरह पाप से पवित्र कर दूंगा जिस तरह वे मां के पेट से पैदा होते हैं।” यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम बल देते हैं, “अरफ़ात में वह व्यक्ति सबसे बड़ा पापी है जो वहां से लौटे और यह ख़्याल करे कि उसे क्षमा नहीं किया गया है।” इस प्रकार हाजी हज के पहले दिन अरफ़ात के मैदान में पापों से पवित्र हो जाते हैं ताकि हाजी बनने के योग्य हो सके। दुआ अल्लाह के बंदों द्वारा की जाने वाली सबसे निष्ठापूर्ण इबदात है। इसका कारण यह है कि जब इंसान अल्लाह के सामने दुआ करता है तो उस समय वह सबकुछ भूल जाता है अन्य लोगों से दूरी बनाकर केवल और केवल अल्लाह से ही अपने दिल की बात करता है।

इंसान अल्लाह की जो इबादत करता है, उसका मूल तत्व अल्लाह से दुआ करना है। क्योंकि जब इंसान की आशा अल्लाह के अतिरिक्त अन्य चीज़ों से टूट जाती है और ऐसे में वह अपने पालनहार के सामने अपनी विवशता व्यक्त करता, उसी के सामने हाथ फैलाता और अपने दिल को पूरी दुनिया से काटकर उसी से जोड़ लेता है, तो ऐसी स्थिति में इंसान अल्लाह के प्रति संपूर्णता और उसके दुआ ग्रहण करने, सबकी सुनने, सबके निकट होने और हर चीज़ का सामर्थ्य रखने की विशेषताओं को पूरी निष्ठा के साथ स्वीकार करता है। यही इबादत की सच्चाई और एकेश्वरवाद का सार है। दुआ के लिए कहा जाता है कि दुआ उपासना का निचोड़ है, इसका अर्थ यह कि इबादत की मूल आत्मा दुआ है, जिसके बिना उसका ढांचा किसी काम का नहीं है। दुआ किसी भी स्थिति में, किसी भी स्थान पर और किसी भी समय की जा सकती है जिसका असर भी होता है। यह ज़रूर है कि कुछ ऐसे स्थान और ऐसे वक़्त हैं कि अल्लाह ने उस स्थान और उसस समय को महत्व दिया है जहां दुआ के स्वीकार होने और उसके प्रभावी होने की विशेष गारंटी है। यह गुण और श्रेष्ठता मनुष्य के लिए है कि वह समय और स्थान से सर्वोत्तम लाभ प्राप्त करे और जितना संभव हो सके अपनी मानवीय पूर्णता के क़रीब पहुंच सके।

जैसाकि कहा गया है कि कुछ स्थान और समय दुआ के लिए ख़ास हैं। विभिन्न परिस्थितियों और स्थानों के दृष्टिगत दुआ और इबादत का महत्व भी भिन्न होता है। जैसे कि मस्जिदों, उपासना स्थलों और पवित्र काबे की दिशा में दुआ और इबादत का महत्व कुछ और ही है। उचित समय भी दुआ के क़बूल होने का एक महत्वपूर्ण कारण है। कुछ ऐसे दिन होते हैं कि जब ईश्वर से हमारा प्राकृतिक प्रेम जागरुक होता है, जिससे हमारे अस्तित्व में आध्यात्म की ज्योति जागती है। अरफ़े का दिन दुआ और इबादत के लिए कुछ ख़ास दिनों में से एक है, विशेषकर जब उस दिन अरफ़ात के मैदान में हों। अरफ़े के दिन के बारे में इस्लामी किताबों में आया है कि अरफ़ा वह दिन है कि जब ईश्वर अपने बंदों का इबादत और उपासना के लिए आहवान करता है, इस दिन ईश्वरीय कृपा और दया धरती पर फैली हुई होती है और शैतान अपमानित हो जाता है। इसी तरह मासूमीन के कथन में आया है कि जब कोई अरफ़ात में ठहरता है और अल्लाह से दुआ करता है माफ़ी मांगता है तो यदि उस ठहरने वाले के पाप रेत के दानों की संख्या में हो, या आकाश के तारों या वर्षा की बूंदों के समान हैं, तब भी अल्लाह उसे अपने रहमतों से माफ़ कर देगा है।

अरफ़ात का स्थान एक ऐसी जगह है कि जो अल्लाह के चाहने वालों और उसकी इबादत करने वालों के लिए बहुत ही ख़ास है। यह वह भूमि है जिससे हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की यादे जुड़ी हुई हैं। यह हाजियों के लिए विशिष्ट अवसर हैं कि वे अपने पापों का प्रायश्चित करें और अगले दिन मिना के संस्कार के लिए तय्यार हों। 9 ज़िलहिज्ज के दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों के हवाले से बहुत सी दुआएं और संस्कार पेश किए गए हैं ताकि इस पवित्र दिन से ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाया जा सके। इस दिन रोज़ा रखना, स्नान करना, विभिन्न प्रकार की नमाज़ और दुआएं पढ़ने पर बल दिया गया है। इस दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) की दुआ का एक भाग इस प्रकार है, “हर बुराई से पाक ईश्वर का नरक पर अधिकार है। हर बुराई से पाक ईश्वर की स्वर्ग में अनुकंपाएं फैली हुई हैं। हर बुराई से पाक ईश्वर का न्याय प्रलय के दिन ज़ाहिर होगा। इस दिन सबसे व्यापक व मन को सुकून देने वाली दुआ का नाम दुआए अरफ़ा है जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अरफ़ात के मरुस्थल में पढ़ी थी। इस दुआ में अध्यात्म के बहुत गहरे अर्थ मौजूद हैं। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम के दूसरे परपौत्रों ने भी अरफ़ा के दिन की अहमियत पर ज़ोर दिया है और इस दिन से विशेष दुआएं बतायी हैं।

इस बात में शक नहीं कि जो लोग हज के लिए गए हैं उनके लिए अरफ़ा का दिन बहुत ही अध्यात्मिक दिन है। वे अपना हज व्यवहारिक रूप से इस दिन अरफ़ात के मरुस्थल में गुज़ार कर शुरु करते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अरफ़ात के मैदान में जो मक्के से बाहर है, हाजियों के ठहरने का कारण इन शब्दों में बयान किया है, “अरफ़ात हरम की सीमा से बाहर है और ईश्वर के मेहमानों को चाहिए कि दरवाज़े के बाहर इतना गिड़गिड़ाएं कि प्रवेश के योग्य हो जाएं।” इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम अरफ़ात के मैदान की अहमियत के बारे में कहते हैं, “कुछ गुनाहों के प्रभाव इतने गहरे होते हैं कि वे सिर्फ़ अरफ़ात के दिन ही माफ़ किए जाते हैं।” यही कारण है कि इस मरुस्थलीय किन्तु पवित्र भूमि में हाजी ईश्वर से क्षमा की बहुत आशा रखते हैं। हरम पवित्र काबे के आस-पास के उस क्षेत्र को कहते हैं जहां हाजियों पर छोटे से छोटे प्राणि को कष्ट देना वर्जित है। इसी तरह धार्मिक शिक्षाओं में यह कहा गया है कि अल्लाह को यह बिल्कुल पसंद नहीं है कि उसके बंदे एक दूसरे के सामने अपने पापों को स्वीकार करें, क्योंकि एक-दूसरे के राज़ जानने से उनके मान-सम्मान को ख़तरा हो सकता है। चूँकि अल्लाह बहुत दयालु, राज़ों को छिपाने वाला और क्षमाशील है, वह चाहता है कि उसके बंदे अपनी गुनाहों और पापपूर्ण कार्यों को केवल उसी के सामने स्वीकार करें। अल्लाह के सामने यह स्वीकारोक्ति, इंसान के अहंकार को ख़त्म करती है और बंदे को और अधिक विनम्र बनाती है।

रिवायत में आया है कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के एक शिष्य अब्दुल्लाह बिन जंदब «عبدالله بن جندب»  को अरफ़ात के मैदान में देखा गया कि वह लंबे समय तक आसमान में अपना हाथ उठाए हुए हैं, उनकी आंखों से लगातार आंसू निकल रहे हैं और उनके गाल ज़मीन पर लगे हुए हैं, मैं पूरे मैदान में किसी अन्य व्यक्ति को ऐसी स्थिति में दुआ करते नहीं देखा था। शाम के समय जब लोग अरफ़ात के मैदान से मशअर की ओर जाने लगे तो मैंने उनसे कहा, मैंने किसी दूसरे को आपसे अच्छी तरह से दुआ मांगते हुए नहीं देखा। अब्दुल्लाह बिन जंदब «عبدالله بن جندب» ने कहा कि ईश्वर की सौगंध मैं उस समय केवल अपने भाईयों के लिए दुआ कर रहा था, क्योंकि इमाम मूसा काज़िस अलैहिस्सलाम से सुना है, इमाम फ़रमाते हैं कि कोई व्यक्ति आंखों से दूर अपने किसी ईमानी भाई के लिए दुआ करे, तो आसमान से यह आवाज़ दी जाती है कि तूने अपने भाई के लिए जितना मांगा है उससे सैकड़ों हज़ार बराबर तुम्हे मिलेगा, इसलिए, मेरे लिए यह उचित नहीं था कि एक ऐसी दुआ के लिए सैकड़ों हज़ार बराबर स्वीकार होने वाली दुआ को छोड़ दूं कि जिसके बारे में पता भी नहीं कि वह स्वीकार होगी कि नहीं। इसी तरह अरफ़ात की वादी में हाजी, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इस दिन की विशेष दुआ पढ़ते हैं। मानो किसी विशाल समारोह का आयोजन है, जिसमें ईश्वर के बंदे जीवन एवं ब्रह्मांड के रहस्यों को प्राप्त करना चाहते हैं और ईश्वर से निकट होने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं।

अरफ़ात की वादी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इस दिन की विशेष दुआ की याद अपने दामन में समेटे हुए है। अरफ़े के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने बेटों, परिजनों और साथियों के एक समूह के साथ ऐसी स्थिति में अपने ख़ेमे से बाहर आए कि उनके चेहरे से विनम्रता व शिष्टता का भाव प्रकट था। उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जबलुर्रहमा नामक पहाड़ के बाएं छोर पर खड़े हो गए और काबे की ओर मुंह करके अपने हाथों को इस प्रकार चेहरे तक उठाया जैसे कोई निर्धन खाना मांगने के लिए हाथ उठाता है और फिर अरफ़े के दिन की विशेष दुआ पढ़ना शुरु की। यह दुआ शुद्ध एकेश्वरवाद और ईश्वर से क्षमा याचना जैसे विषयों से संपन्न है। वास्तव में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दुआए अरफ़ा द्वारा अनेक नैतिक एवं प्रशैक्षिक बिंदुओं का हमें पाठ दिया है। इस मूल्यवान दुआ में जगह जगह पर नैतिकता के उच्च अर्थ निहित हैं। कभी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ईश्वरीय अनुकंपाओं का उल्लेख करते हैं, कभी ईश्वर से आत्मसम्मान की दुआ मांगते हैं और कभी कर्म में निष्ठा की प्रार्थना करते हैं। दुआए अरफ़ा में अन्य भाग ऐसे भी हैं कि जो केवल ईश्वर से बातचीत, प्रेम और उसकी प्रशंसा पर आधारित हैं। यह दुआ इस बात को दर्शाती है कि दुआ का अर्थ केवल ईश्वर से मांगना ही नहीं है, बल्कि अपने प्रेमी ईश्वर से बातचीत वह भी एक ज़रूरतमंद एवं असहाय बंदे की ओर से, काफ़ी दिलचस्प एवं मनमोहक हो सकती है और उसे आत्मिक प्रसन्नता एवं मानसिक शांति प्रदान कर सकती है। अरफ़े के दिन की आध्यात्मिक दुआ के बारे में आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई कहते हैं कि अरफ़े के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम द्वारा पढ़ी गई दुआ ऐसी दुआ है कि जिसमें अल्लाह से प्रेम, मानवता का उत्थान और सदाचार के बहुत से पाठ निहित हैं। यह ऐसी महत्वपूर्ण दुआ है कि जिसे पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों से प्रेम रखने वालों को इस दिन अवश्य पढ़नी चाहिए, हमे इन दिनों के महत्व को समझना चाहिए।

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