Feb १५, २०१७ १३:४० Asia/Kolkata

हमने इस्लामी क्रान्ति की आकांक्षा में स्वाधीनता के स्थान पर चर्चा की और यह बताया कि ईरानी राष्ट्र ने इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को क़ायम कर स्वाधीनता का मज़ा चखा और अब वह किसी भी क़ीमत पर इसे छोड़ने के लिए तय्यार नहीं है।

इसी प्रकार इस बात का भी उल्लेख किया कि स्वाधीनता और आज़ादी का ईरानी जनता के पूरे संघर्ष के दौरान चोली दामन का साथ था और ईरानी राष्ट्र जिस हद तक विदेशियों के हस्तक्षेप के संबंध में संवेदनशील था उसी तरह वह आज़ादी की प्राप्ति व आंतरिक अत्याचार से निपटने के लिए भी चिंतित था। इस तरह इस्लामी क्रान्ति ईरान में स्वाधीनता और स्वतंत्रता दोनों के एक साथ व्यवहारिक होने का मंच बनी।

इस्लामी क्रान्ति मोहम्मद रज़ा शाह के अत्याचारी व पिट्ठू शासन के ख़िलाफ़ जनता की क्रान्ति थी। ऐसी क्रान्ति जिसने ईरान से 2500 साल पुरानी शाही व्यवस्था को उखाड़ फेंका और पहली बार इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था क़ायम की। ऐसी व्यवस्था जिसमें जनता को ध्रुव की हैसियत हासिल है और यह व्यवस्था पूरे राष्ट्र के लिए आज़ादी की गैरंटी है। रोचक बिन्दु यह है कि चूंकि क्रान्ति का स्वभाव धार्मिक था, अत: इससे क़ायम होने वाली व्यवस्था और उसकी विचारधारा भी पूरी तरह धार्मिक स्वाभाव रखती है। नतीजे के तौर पर इससे हासिल आज़ादी भी धार्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। यही कारण है कि 1979 की क्रान्ति की इस्लामी विचारधारा स्वतंत्रता को सबसे क़ीमती मानवीय मूल्य मानती है कि जिसके बिना किसी भी मानव समाज का विकास व उन्नति संभव नहीं है।

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इस्लाम और इस्लामी क्रान्ति के विचार उदारवाद और समाजवाद जैसे अन्य वैचारिक व दार्शनिक मतों के विपरीत आज़ादी को इंसान के उत्थान के लिए ईश्वरीय अनुकंपा मानते हैं। यही कारण है कि इस्लाम आज़ादी के अन्य आयाम के साथ साथ आध्यात्मिक आज़ादी की भी बात करता है। इस्लाम की नज़र में आध्यात्मिक आज़ादी इंसान की आत्मा को लालच, वासना, क्रोध और विशिष्टता पाने की इच्छा के बंधन से आज़ादी दिलाती है। इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की आज़ादी के संबंध में मुख्य सोच यह है कि आज़ादी ऐसी हो जिससे इंसान का उत्थान हो। आज़ादी सिर्फ़ सामाजिक मंच तक सीमित नहीं है बल्कि एक ईश्वरीय अनुकंपा है जिसकी इंसान को परलोक में मुक्ति पाने के लिए ज़रूरत है इसलिए आज़ादी से लाभ उठाने के संबंध में उस पर ज़िम्मेदारी भी है। इस दृष्टिकोण के तहत इंसान का यह अधिकार है कि वह आज़ाद हो लेकिन अपने, ईश्वर, दूसरों, समाज और आने वाली पीढ़ियों के संबंध में भी उस पर कुछ ज़िम्मेदारी बनती है।

इस्लामी क्रान्ति का एक सिद्धांत यह है यह क्रान्ति आज़ादी और स्वाधीनता को एक दूसरे का अभिन्न अंग मानती है। यह सिद्धांत ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित है। क्योंकि अगर एक देश की स्वाधीनता व संप्रभुता ख़तरे में पड़ जाए और एक समाज के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मामलों पर विदेशियों के वर्चस्व का मार्ग समतल हो जाए तो स्वाभाविक सी बात है कि विदेशी दबाव से वजूद में आयी पिट्ठू सरकार राष्ट्र की स्वतंत्रता को ख़त्म कर देगी जबकि इसके विपरीत एक सरकार उस समय विदेशियों के प्रभाव का मुक़ाबला कर सकती है जब वह लोकप्रिय हो और उसके पास जनाधार हो और यह चीज़ सिर्फ़ और सिर्फ़ उस वक़्त हासिल होगी जब समाज के विभिन्न वर्गों को आज़ादी हासिल हो और इस आज़ादी से उसमें आत्म विश्वास पैदा हुआ हो।                    

इस्लामी क्रान्ति के सिद्धांत में सुरक्षा और आज़ादी के बीच संतुलन पर ध्यान दिया गया है। ऐतिहासिक घटनाएं दर्शाती हैं कि बहुत से मौक़ों पर सरकारों ने सुरक्षा व्यवस्था क़ायम रखने के बहाने जनता की आज़ादी को सीमित किया या कुछ विरोधी गुटों द्वारा आज़ादी के दुरुपयोग के कारण देश की सुरक्षा ख़तरे में पड़ गयी। लेकिन इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में सरकार को इस बात की इजाज़त नहीं है कि वह क़ानून व्यवस्था के नाम पर जनता की आज़ादी को सीमित करे। यहां तक कि संकटमयी स्थिति में अस्थायी सीमित्ता के लिए उसे संसद से इजाज़त लेने की ज़रूरत है। मिसाल के तौर पर अगर चुनने और चुने जाने के अधिकार को राजनैतिक आज़ादी के एक आयाम के तौर पर मानते हैं तो हम थोपी गयी जंग के दौर की ओर संकेत कर सकते हैं कि उस संकटमयी दौर में भी ईरान में चुनावों का आयोजन हुआ और जनता का मतदान करने और प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार सीमित न हुआ।

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इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान ने कि जिसका आधार इस्लामी क्रान्ति के सिद्धांत हैं, आज़ादी को उसके सभी आयामों के साथ सुनिश्चित किया है। संविधान में आस्था की आज़ादी को मान्यता दी गयी है। संविधान में आस्था की आज़ादी का इन शब्दों में उल्लेख है, “किसी से आस्था के बारे में पूछताछ वर्जित है और किसी व्यक्ति को उसकी आस्था के कारण प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।”  ईरान में आस्था की आज़ादी की सबसे अच्छी मिसाल विभिन्न आसमानी धर्मों के अनुयाइयों को धार्मिक सभाओं व सामाजिक संस्कारों के आयोजन की आज़ादी है। हालांकि ईरान में इस्लाम आधिकारिक धर्म और शिया मत इस देश की जनता का आधिकारिक मत है लेकिन संविधान में स्पष्ट शब्दों में आया है कि ईसाइयों, यहूदियों और ज़र्तुश्तियों को उनके धार्मिक संस्कारों के आयोजन का अधिकार है। इसी प्रकार इन मतों के अनुयाइयों को ईरानी संसद में भी प्रतिनिधित्व हासिल है। इस बिन्दु का उल्लेख भी रोचक होगा कि अन्य ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों के साथ ईरानी जनता के सामाजिक संबंध पूरे सम्मान और नागरिक व मानवाधिकारों के पालन पर आधारित हैं। इस तरह के व्यवहार से आपस में इतना अच्छा सौहार्दपूर्ण संबंध क़ायम हुआ कि ईरान पर इराक़ के हमले के समय दूसरे धर्मों के अनुयायी भी ईरानी राष्ट्र के अन्य अंग की तरह देश की रक्षा के लिए आगे आए।              

अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी ईरान में अहमियत दी गयी है। यह भी इस्लामी क्रान्ति के सिद्धांत में शामिल है।

इस्लामी क्रान्ति से पहले के वर्षों में देश में अत्याचारी राजशाही व्यवस्था के कारण प्रिंट मीडिया पर बहुत सेंसर था लेकिन क्रान्ति की सफलता के बाद प्रिंट मीडिया गुणवत्ता और संस्था की दृष्टि से बहुत विकसित हुआ है। मीडिया की यह शाखा हालिया दशक में ज़्यादा विकसित हुयी और नागरिक समाज की ओर से सरकार के क्रियाकलापों पर नज़र रखने वाले के रूप में सरकार पर खुल कर टिप्पणी करती है। इस्लामी गणतंत्र के संविधान में साफ़ तौर पर आया है कि प्रिंट मीडिया को आज़ादी है मगर यह कि इस्लामी आधारों या नागरिक अधिकारों को नुक़सान पहुंचाने वाली बातें न लिखे।

ईरान में अन्य विकसित देशों की तरह ही अदालत में प्रिंट मीडिया की ओर से उल्लंघन की सुनवाई होती है। इस समय ईरान में सैकड़ों पत्रिकाएं, न्यूज़ एजेंसियां और वेबसाइटें राजनैतिक व सामाजिक मंच पर सक्रिय हैं। ईरानी जनता का बड़ा भाग सामाजिक साइटों का सदस्य है। 

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सभी विकसित देशों में राजनैतिक दल व संगठन के वजूद को राजनैतिक आज़ादी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। ईरान में भी राजनैतिक दल के गठन की आज़ादी है इस शर्त के साथ कि व्यवस्था के फ़्रेमवर्क में रहते हुए देश की संप्रभुता व स्वाधीनता को नुक़सान न पहुंचाए। इन  दलों को संविधान के अनुसार सभाओं व रैली के आयोजन की आज़ादी है इस शर्त के साथ कि हथियार लेकर न चलें और उनकी गतिविधियों से इस्लामी नियमों का उल्लंघन न होता हो। यह ऐसी हालत में है कि इस्लामी क्रान्ति की सफलता से पहले ईरान में अत्याचारी शासन की ओर से राजनैतिक दलों को सामाजिक गतिविधियों की आज़ादी नहीं थी और आलोचना करने वाले राजनेताओं को जेल भेज दिया जाता था।

राजनैतिक भागीदारी के अधिकार को भी इस्लामी क्रान्ति के विचारों में आज़ादी के एक अन्य आयाम के रूप में स्वीकार किया गया है। इस्लामी क्रान्ति की सफलता को लगभग 4 दशक का समय होने को है, इस दौरान ईरान में हर साल औसतन एक चुनाव आयोजित होता आया है। यहां तक कि जंग जैसी संकटमय स्थिति में भी कि जब ईरानी शहर दुश्मन की बमबारी के निशाने पर थे, ईरान में चुनाव का आयोजन नहीं रुका। इस्लामी क्रान्ति के विचार के अनुसार, सभी नागरिकों को चाहे वे किसी भी धर्म, मत, जाति, भाषा या राजनैतिक विचारधारा के अनुयायी हों, मतदान का समान अधिकार हासिल है। इस बिन्दु का उल्लेख भी रोचक है कि ईरान में वरिष्ठ नेता से लेकर राष्ट्रपति, संसद, नगर परिषद, विशेषज्ञ परिषद सहित सत्ता के सभी स्तंभ सीधे तौर पर या अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

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सामाजिक आज़ादी व नागरिक अधिकार के पालन को भी इस्लामी क्रान्ति के विचार में अहमियत दी गयी है। इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार, भाषा, नस्ल व राष्ट्रीयता नागरिकों के बीच अंतर का मानदंड नहीं है इसलिए सामाजिक संस्कृति के हर भाग को ईरान में समान अधिकार हासिल है। इस्लामी गणतंत्र के संविधान में सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया गया है। सभी धार्मिक व जातीय अल्पसंख्यकों को इस बात की इजाज़त है कि वे अपनी अपनी स्थानीय ज़बान में मीडिया चला सकते हैं यहां तक कि अपने अपने क्षेत्रों में फ़ारसी भाषा के साथ अपनी स्थानीय भाषा में शिक्षा दे सकते हैं।

 

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