Feb १५, २०१७ १३:५३ Asia/Kolkata

हर क्रांति के आने के साथ ही उसका सबसे अधिक व सबसे तीव्र प्रभाव उस देश के राजनैतिक व सामाजिक ढांचों पर पड़ता है लेकिन समय बीतने के साथ साथ संस्कृति व साहित्य के क्षेत्रों पर क्रांति का प्रभाव विस्तृत होता जाता है और धीरे-धीरे नए नए विचार और मत सामने आने लगते हैं।

कहानी और कविता सहित कला की विभिन्न शाखाओं में इस्लामी क्रांति ने जो मूल परिवर्तन पैदा किए हैं उनका किसी भी तरह से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह परिवर्तन इस प्रकार का है कि ईरान के साहित्य व कला को इस्लामी क्रांति से पहले और बाद के दो भागों में बड़ी सरलता से बांटा जा सकता है और दोनों के अंतर को समझा जा सकता है। इस्लामी क्रांति ने साहित्य के क्षेत्र में कोई नई शैली उत्पन्न नहीं की क्योंकि नई शैली प्रायः किसी ढांचे या तकनीक तक सीमित होती है लेकिन इस्लामी क्रांति ने साहित्य व कला के क्षेत्र में मूल परिवर्तन कर दिया।

साहित्य, शायर और लेखक के आस-पास घटने वाली घटनाओं के बारे में उसके विचारों, भावनाओं व अनुभवों को साहित्य कहा जाता है। निश्चित रूप से जब भी समाज में सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक मान्यताएं बदलती हैं तो वे कवि व लेखक के दृष्टिकोणों, विचारों और भावनाओं में भी परिवर्तन पैदा कर देती हैं। इसका कारण यह है कि कवि व लेखक के विचार, समाज के वातावरण में मौजूद प्रक्रियाओं व घटनाओं से प्रेरित हो कर उनकी कविताओं व लेखों में उजागर होते हैं। ईरान में इस्लामी क्रांति के आरंभ में जो राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन आए, उन्होंने न केवल देश के राजनैतिक चेहरे व सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से बदल कर रख दिया बल्कि शेर, कविता, साहित्य व कला के क्षेत्र में भी बहुत अधिक बदलाव कर दिये यह परिवर्तन, किताबों, लेखों व कविताओं के स्वरूप और ढांचे में भी देखे जा सकते हैं और उनकी भाषा, विषय वस्तु और संदेश में भी दिखाई पड़ते हैं। इस्लामी क्रांति के बाद फ़ारसी भाषा के साहित्य में नए विचार, नई सामग्री और नए स्वरूप सामने आए जिनमें से अधिकतर राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तनों से प्रेरित थे।

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अगर किसी क्रांति के राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तन गहरे हों तो वे उस देश के साहित्य में गहन बदलाव का कारण बनते हैं क्योंकि समाज विशेष कर कटिबद्धता और ज़िम्मेदारी से कला व साहित्य का रिश्ता जग ज़ाहिर है। इस्लामी क्रांति का साहित्य, कटिबद्ध साहित्य है जो जनता के बीच से जनता की समस्याओं को बयान करने के लिए निकला है। यह साहित्य मनोरंजक और दायित्वहीन नहीं है बल्कि उन कवियों व लेखकों के आवेग व आक्रोश का वर्णन है जो लोगों के बीच से आए हैं और बलिदान और शौर्य ने उनके व्यक्तित्व को निखारा है। इस साहित्य का लक्ष्य, उच्च मानवीय मान्यताओं को संसार के लोगों तक पहुंचाना है अतः इसके पास कहने के लिए नई बात है।

इस्लामी क्रांति के दौरान शायद ही कोई ऐसी कविता मिल पाए जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस समय की घटनाओं की ओर संकेत न किया गया हो या उसमें उन घटनाओं की निशानियां न दिखाई पड़ती हों। क्रांति की कविताएं स्वरूप और तकनीक की दृष्टि से क्रांति से पहले की कविताओं का ही क्रम हैं लेकिन विचारों व विषय वस्तु के मैदान में राजनैतिक मामलों व सामाजिक परिवर्तनों ने, जो इस्लामी क्रांति का फल हैं, इन कविताओं को विशेष रूप प्रदान कर दिया और यह रूप प्रतिबद्ध कवियों की रचनाओं में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ता है। वर्ष 1961 में ईरान में पहलवी शासन के ख़िलाफ़ एक ऐसा साहित्य सामने आया जो प्रतिरोध के साहित्य के नाम से मशहूर हुआ और सामाजिक और धार्मिक दोनों धड़ों में इस्लामी क्रांति की सफलता तक जारी रहा। पहलवी शासन के ख़िलाफ़ राजनैतिक संघर्ष फैलने के साथ ही लगभग सभी बुद्धीजीवी और नवीन शैली के शायर, तानाशाही शासन के विरुद्ध संघर्ष में जनता के साथ जुड़ गए। इस बात का प्रमाण क्रांति की वे असंख्य कविताएं हैं जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

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क्रांति की कविताएं, शायरों के दो गुटों की ओर से फली फूलीं। पहला गुट उन बुज़ुर्ग शायरों का था जो इस्लामी क्रांति से पहले या क्रांति के दौरान उससे जुड़ गए थे उन्होंने अतीत में जो कलात्मक रचनाएं तैयार की थीं उन्हें क्रांति के साहित्य की मज़बूत शाखाओं के साथ जारी रखा। इस गुट के साथ ही युवा कवियों का एक गुट भी तैयार हुआ। ये ऐसे युवा शायर थे जिन्होंने जनता के संघर्ष और क्रांति के दौरान अपनी साहित्यिक गतिविधियां शुरू कीं और चूंकि वे क्रांति के सिद्धांतों पर विश्वास रखते थे अतः स्वाभाविक रूप से वे क्रांति के विचारों व संदेशों के ध्वजवाहक बन गए।

इस्लामी क्रांति की कविताओं की ढांचे व तकनीक की दृष्टि से भी और विषय वस्तु की दृष्टि से भी कुछ अहम विशेषताएं हैं। ढांचे की दृष्टि से युवा शायर कविता के परांपरागत ढांचों की ओर उन्मुख हुए और ग़ज़ल तथा रुबाई या चौपाई में विशेष रूप से काम किया। विषय वस्तु की दृष्टि से उसकी सबसे बड़ी विशेषता इस्लामी शिक्षाओं का प्रतिबिंबन था। ईरान की इस्लामी क्रांति ने इंसान को अपने जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण दिया। इस्लामी क्रांति के आने से धर्म और साहित्य के रिश्ते को एक नया रूप मिल गया। इस्लामी क्रांति की कविताओं ने इस्लामी शिक्षाओं और धार्मिक विषय वस्तु का भरपूर रूप से प्रचलिन किया। आज के शायर की दृष्टि में, आशूरा की घटना, केवल एक घटना नहीं है बल्कि एक संस्कृति है और इस क्रांति का एक एक क्षण इस संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

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अभी ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता को अधिक समय नहीं गुज़रा था कि इराक़ ने ईरान पर हमला कर दिया। लोग अपने देश की रक्षा के लिए रणक्षेत्रों में जाने लगे। लोगों के प्रतिरोध ने फ़ारसी कविता व साहित्य के सामने एक नया मैदान खोल दिया और फ़ारसी शायरी में नए नए विषय और नए नए शब्द जुड़ने लगे। आठ साल तक अतिक्रमणकारियों के मुक़ाबले में ईरान की जनता का साहसिक प्रतिरोध, युद्ध की संस्कृति के अस्तित्व में आने का कारण बना। इस संस्कृति ने फ़ारसी शायरी पर अत्यधिक प्रभाव डाला और उसे परिवर्तित कर दिया। प्रतिरोध के काल के शेरों की साहसिक आत्मा ने फ़ारसी की शायरी की भाषा और उसकी विषय वस्तु को बड़ी हद तक बदल दिया।

युद्ध की कविताओं के संबोधक आम लोग हैं। पवित्र प्रतिरक्षा काल के शेर हालिया दशकों में फ़ारसी भाषा के सबसे मूल्यवान और मनमोहक शेरों में से हैं। सादा व सरल भाषा, आध्यात्मिक व अपनाइयत वाला वातावरण और समृद्ध इस्लामी संस्कृति से लाभ उठाना, युद्ध की कविताओं की विशेषता है। दुख झेल चुके लोगों का चित्रण, संघर्ष का निमंत्रण, अतिक्रमणकारी शत्रु के अपराधों व अत्याचारों का वर्णन और संघर्षकर्ताओं व शहीदों की शौर्यगाथा का चित्रण पवित्र प्रतिरोध और उसके बाद के काल के शेरों की मुख्य विषय वस्तु है।

इस बात के दृष्टिगत कि वास्तविक घटनाएं और नए नए विचार कहानियों से संबंधित साहित्य का मूल आधार होते हैं और क्रांतियां इस प्रकार के शब्दों का मुख्य स्रोत हैं इस लिए लेखक व कवि उनकी सहायता से अनेक रचनाएं तैयार करते हैं। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता और उचित व स्वतंत्र वातावरण बनने के साथ ही, उन दक्ष लेखकों व कवियों ने जो इस्लामी क्रांति से पहले वैचारिक परिपूर्णता को पहुंच चुके थे, अपने युवा शिष्यों के साथ, साहित्यिक मंच को अपने नियंत्रण में ले लिया और क्रांति के खुले वातावरण से लाभ उठाते हुए ऐसी रचनाएं तैयार कीं जो एक तरह से क्रांति व युद्ध की गाथा सुनाती हैं।

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क्रांति की कहानियों से संबंधित साहित्य के स्थान की समीक्षा के लिए सबसे पहले इस्लामी क्रांति के मूल तत्व अर्थात वर्ष 1963 में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के आंदोलन पर ग़ौर करना होगा। उन वर्षों में ठहराव और जड़ता का शिकार हो चुके इस प्रकार के साहित्य को जलाल आले अहमद जैसे लेखकों ने परिवर्तित व गतिशील कर दिया। जलाल एक ऐसे गद्य और भाषा के आविष्कारक थे जो ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद युवा लेखकों के लिए आदर्श के रूप में सामने आई। उनकी भाषा और उनका गद्य, ईरानी जनता के स्थानीय गद्य से जुड़ा हुआ था और यही विशेषता इस बात का कारण बनी कि उनकी रचनाएं, ईरान की इस्लामी क्रांति के कहानियों से संबंधित साहित्य में एक नया मोड़ बन जाएं। उनकी कहानियों और अन्य विषयों से संबंधित किताबों ने इस्लामी व राष्ट्रीय साहित्यिक क्रांति के दीप जलाए। यह आंदोलन अन्य लेखकों के माध्यम से इस्लामी क्रांति की सफलता तक जारी रहा और युवा लेखकों के सामने आने और उनके द्वारा विभिन्न प्रकार की कहानियों और किताबें लिखे जाने के बाद इस्लामी क्रांति के कहानियों से संबंधित साहित्य में एक नई जान पड़ गई।

इराक़ की ओर से वर्ष 1970 में ईरान पर थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध की आरंभ होने के साथ ही पवित्र प्रतिरोध का कहानियों से संबंधित साहित्य अस्तित्व में आया और युद्ध की समाप्ति और उसके बाद के वर्षों तक उसने इस्लामी क्रांति की कहानियों से संबंधित साहित्य का स्थान ले लिया। यद्यपि आरंभ में पवित्र प्रतिरोध का कहानियों में वैचारिक शक्ति और तकनीक की कमी थी और यह अधिकतर देश की रक्षा के लिए पाठक की भावनाओं को उभारती थीं लेकिन धीरे धीरे इसने फ़ारसी साहित्य में अपना स्थान बना लिया और युवा व सक्षम लेखकों को इस मैदान में उतार दिया। इन लेखकों ने, जो अब भी लिख रहे हैं युद्ध के मोर्चों पर अपनी उपस्थिति के दृष्टिगत, पवित्र प्रतिरक्षा के विषयों को अपनी रचनाओं में प्राथमिकता दी और मूल्यवान रचनाओं को अस्तित्व प्रदान किया।

 

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