Feb १५, २०१७ १४:०९ Asia/Kolkata

किसी भी देश में होने वाले परिवर्तन, निश्चित रूप से उस देश की कला और संगीत को भी प्रभावित करते हैं।

इस्लामी क्रांति के दौरान भी संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  उस काल में जो तराने बनाए गए थे वे आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं।

इस्लामी गणतंत्र ईरान में क्रांतिकारी तरानों को शौर्य गीत भी कहा जाता है।  इस प्रकार के गीत या तराने, इस्लामी क्रांति के दौरान और उसकी सफलता के बाद क्रांति के समर्थन और अत्याचारी शासन व्यवस्था का विरोध करने के लिए तैयार किये गए थे।  इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले यह तराने क्रांति के समर्थकों ने तैयार किये थे।  इनमें से बहुत से तराने भूमिगत स्टूडियो में रेकार्ड किये गए जो बाद में आम लोगों तक पहुंचे।  इस्लामी क्रांति की सफलता के दशकों बाद भी यह तराने पसंद किये जाते हैं जो क्रांति के वर्षगांठ के अवसर पर सुनाई देते हैं।

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले दूसरी अन्य चीज़ों की तरह संगीत भी अपने मुख्य मार्ग से हट चुका था।  उस काल में ईरान में प्रचलित संगीत मूल्यहीनता की ओर बढ चुका था और पारंपरिक संगीत को लगभग भुलाया जा चुका था।  फरवरी 1979 में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद न केवल यह कि इसे बचाया गया बल्कि इसे विश्व स्तर पर भी प्रचलित किया गया।  देश की सामाजिक एवं राजनीतिक घटनाओं में ईरान के पारंपरिक संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इस बारे में ईरान के क्रांतिकारी गायक मुहम्मद गुलरेज़ कहते हैं कि ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता का एक आधार, जनता की एकता थी।  वे कहते हैं कि जनता द्वारा एकजुट होकर अत्याचारी शासन के विरुद्ध नारों और तरानों के कारण राजशाही सरकार का अंततः पतन हो गया।  अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि निश्चित रूप से इस एकता के कई कारक हैं जिनकी भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।  मुहम्मद गुलरेज़ कहते हैं कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में वर्षों के अनुभव के बाद यह कहा जा सकता है कि लोगों को एकजुट करने और इस्लामी क्रांति की आकांक्षाओं की प्राप्ति में तरानों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।  उन्होंने कहा कि गीतकारों और संगीतकारों ने तालबद्ध ढंग से क्रांतिकारी गीत तैयार किये।

यह एक वास्तविकता है कि ईरान का पारंपरिक संगीत, सदैव ही जनता के बीच रहा है और उसने सामाजिक घटनाओं को दृष्टिगत रखा है।  यह संगीत ईरान की इस्लामी क्रांति के दौरान और उसके बाद जनता के साथ उनका सहायक बना रहा।

एक ईरानी संगीतकार एवं संगीत मामलों के विशेषज्ञ पीरूज़ अर्जमंद का मानना है कि इस्लामी क्रांति ने ईरान के पारंपरिक संगीत को मुक्ति दिलाई।  वे कहते हैं कि इसने ईरानी पारंपरिक संगीत को पतन से बचा लिया।  पीरूज़ अर्जमंद के अनुसार पहलवी शासनकाल में ईरानी संगीत बहुत तेज़ी से पश्चिमी संगीत को ओर बढ़ रहा था।  यह पश्चिम के पाप संगीत की ओर इतना अधिक बढ़ चुका था कि पारंपरिक संगीत के कई लोगों का यह मानना था कि जल्द ही यह संगीत समाप्त हो जाएगा।  इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले ईरान में पाप संगीत इतना बढ़ चुका था कि इसे मुहल्लों के गली-कूचों मे सुना जा सकता था।  यही कारण था कि पारंपरिक संगीत के ज्ञानियों में इस बात की चिंता पाई जाती थी कि कहीं हमारा पारंपरिक संगीत सदा के लिए समाप्त न हो जाए।

पीरूज़ अर्जमंद

 

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभिक वर्षों में शौर्य संगीत प्रचलित रहा।  इस्लामी क्रांति की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि उसने पारंपरिक संगीत को जीवित रखा और उसको समाप्त करने वाले कारकों को ही समाप्त कर दिया।  वर्तमान समय में ईरान का पारंपरिक संगीत पूर्ण रूप से राष्ट्रीय संगीत है।

जब हम क्रांति के तरानों को सुनते हैं तो यह पाते हैं कि उनके भीतर एक प्रकार के संदेश निहित हैं।  यह निहित संदेश बताते हैं कि लोगों में क्रांति के प्रति किस प्रकार का प्रेम पाया जाता था।  इन तरानों को तैयार करने वाले आम कवि नहीं थे बल्कि जानेमाने और अनुभवी कवियों और साहित्यकारों ने इनमें अपना योगदान दिया है।

इस्लामी क्रांति के दौरान के संगीत के बारे में पारंपरिक संगीत के गीतकार हेसामुद्दीन सेराज कहते हैं कि यह वास्तविकता है कि इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले और बाद दोनों समय क्रांतिकारी संगीत मौजूद रहा है।  वे कहते हैं कि उस समय जो काम किये गए वैसे काम मैं नहीं सोचता कि ईरान के संगीत के इतिहास में बाद में दोहराए जा सकेंगे।  इस संबन्ध में उन्होंने कुछ क्रांतिकारी तरानों के नाम गिनवाते हुए कहा कि चावूश संगीत केन्द्र ने बहुत से क्रांतिकारी तराने तैयार किये जो लोगों में बहुत पसंद किये गए।  वे कहते हैं कि यह सफलताएं निश्चित रूप में क्रांतिकारी वातावरण के कारण ही संभव हो सकीं।  उनका कहना है कि उस समय ऐसा वातावरण था जिसमें शौर्य गीतों और कविताओं की आवश्यकता थी।  उस काल के कवि, शौर्य गीत कहा करते थे जिसे लोग दिल की गहराइयों से पसंद करते थे।

हेसामुद्दीन सेराज

 

निःसन्देह, यह कहा जा सकता है कि उस काल के शेरों और कविताओं में जो विषय उठाए जाते थे वे ध्यान योग्य हैं जैसे नेतृत्व की सराहना, अच्छे भविष्य का भरोसा दिलाना, तानाशाही से मुक़ाबला, लोकतंत्र की प्रशंसा, प्रतिरोध का नियंत्रण, एकता का आह्वान, षडयंत्रों से मुक़ाबला, शहादत की भावना को जागृत करना और अंततः ईश्वर की संप्रभुता पर बल आदि।  उसकाल के तरानों में विशेष प्रकार का आकर्षण पाया जाता था जो आज भी बाक़ी है।

इस्लामी क्रांति का इतिहास बताता है कि उस काल के क्रांतिकारी तराने, लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित करते थे।  इन तरानों को सुनकर लोगों में एक विशेष प्रकार का जोश भर जाता था।

इस्लामी क्रांति की सफलता के कुछ महीने पहले ईरान का पारंपरिक संगीत, क्रांतिकारी जनता की ज़बान बन चुका था।  उस समय ईरान के प्रथम श्रेणी के गीतकार और संगीतकार जैसे दिवंगत मुहम्मद रज़ा लुत्फ़ी, परवीज़ मिश्कातियान और कई अन्य संगीतकारों ने क्रांति में एक नया जोश भर दिया।  इस दौरान जो तराने पेश किये गए वे जनता में बहुत प्रचलित हुए।  यही वे तराने हैं जो अब भी सुने और पसंद किये जाते हैं।

सन 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ ही देश में पारंपरिक संगीत को नई दशा और दिशा मिली।  इस्लामी क्रांति का साहित्य पर प्रभाव यह पड़ा कि कविताओं और संगीत ने नया रूप धारण किया।  ईरान पर इराक़ की ओर से थोपे गए युद्ध के बाद से क्रांतिकारी संगीत और साहित्य एक नए चरण में प्रविष्ट हो गया।

निःसन्देह, यह बात कही जा सकती है कि इस्लामी क्रांति से पहले और बाद तथा इसी प्रकार से 8 वर्षीय प्रतिरक्षा के दौरान ईरान का क्रांतिकारी संगीत, बहुत सक्रिय रहा जिसका प्रभाव आज भी ईरानी संगीत पर पाया जाता है और आगे भी स्पष्ट रूप में दिखाई देगा।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           

 

 

 

टैग्स