Feb १५, २०१७ १७:२५ Asia/Kolkata

बुद्धिजीवियों ने क्रांति की विभिन्न परिभाषाएं की हैं।

संक्षेप में क्रांति की परिभाषा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि क्रांति के लक्ष्यों की परिधि में अपने देश में नयी संस्था और वैकल्पिक व्यवस्था तथा देश के सामाजिक व राजनैतिक ढांचों में आधार भूत परिवर्तनों के लिए किसी भी देश की जनता के प्रयासों को क्रांति कहा जाता है। स्वभाविक सी बात है कि जनता द्वार अल्पाविध में इस व्यापक परिवर्तन को सत्ताधारी पार्टी और लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है जो वर्तमान स्थिति के जारी रहने पर बल देते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञों का मानना है कि क्रांति के दौरान भीषण झड़पों का होना स्वाभिक सी बात है और यह एक ऐसी वास्तविकता है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अमरीका के विशेषज्ञ सैमुएल हटिंग्टन क्रांति को एक आंतरिक, हिंसक, आधारभूत और तेज़ प्रक्रिया मानते हैं। जर्मन विशेषज्ञ आर्थर बायोर क्रांति को एक सफल या असफल प्रयास मानते हैं जो हिंसा के माध्यम से समाज के ढांचे में परिवर्तन करने के प्रयास से किया जाता है।

इस प्रकार से राजनैतिक व सामाजिक विशेषज्ञों के अनुसार, क्रांति के दौरान हिंसा का होना एक अटल सच्चाई है और फ़्रांस, रूस, क्यूबा, अलजीरिया और इस जैसी अन्य क्रांतियों के दौरान भी इस विषय की पुष्टि होती है किन्तु इस्लामी क्रांति के दौरान इस सिद्धांत या क़ानून को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस महाक्रांति ने यद्यपि शाही व्यवस्था को धराशायी कर दिया और अमरीका, ब्रिटेन जैसे उसके बड़े समर्थकों के मुक़ाबले में डट गयी किन्तु जनता के संघर्ष के दौरान बहुत ही कम हिंसा देखने में मिली और ईरानी जनता की यह एक बहुत बड़ी सफलता दर्ज हुई। अब यह प्रश्न उठता है कि ईरानी जनता की महा क्रांति इस प्रकार और कम से कम हिंसा में सफल क्यों हुई और उसने अपने लक्ष्य कैस प्राप्त कर लिए? क्या शाही सरकार ने जनता से नर्म बर्ताव किया था या इमाम ख़ुमैनी का नेतृत्व और उनकी शैली ऐसी थी जिसने शाही सरकार से व्यापक अत्याचारों को अंजाम देने का अवसर ही छीन लिया था?

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दुनिया की हर क्रांति की भांति ईरान की इस्लामी क्रांति भी अत्याचारी शासन का पतन और अपनी उमंगों को स्थापित करने के उद्देश्य आई जिसमें जनता ने इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर न्यायप्रिय सरकार के गठन की मांग की थी। निसंदेह पहलवी शासन अपनी पूरी शक्ति के साथ क्रांति की इस लहर के सामने डट गया। पहलवी शासन की दमनात्मक कार्यवाहियों से पता चलता है कि वह किसी भी स्थिति में जनता के साथ नर्म और शांतिपूर्ण व्यवहार के पक्ष में नहीं था और जनता की छोटी से छोटी मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। वर्ष 1953 में तेल के राष्ट्रीयकरण के लिए राष्ट्रीय आंदोलन का दमन, अमरीका और ब्रिटेन की सहायता से किया गया और वर्ष 1960 के आरंभिक दशक में इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में जनता का स्वतंत्रता प्रेमी आंदोलन का दमन, सरकार द्वारा जनता के दमन का स्पष्ट उदाहरण है। इसी प्रकार पहलवी शासन ने अमरीका और इस्राईल की सहायता से वर्ष 1960 और 1970 के दशक में हज़ारों लोगों को राजनैतिक गतिविधियों के आरोप में जेल में डाला गया, यातनाएं दी गयी, मौत की सज़ा दी गयी या देश निकाला दे दिया गया। इस आधार पर रक्तपिपासु शासन अपनी सत्ता को बचाने के लिए किसी भी प्रकार की कार्यवाही से संकोच नहीं किया और निश्चित रूप से उसका इरादा था कि वह जनता की क्रांति का कड़ाई से दमन कर दे।

निसंदेह वर्ष 1978 में इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरानी जनता की क्रांति के दौरान सबसे कम ख़ून बहा है। इमाम ख़ुमैनी वरिष्ठ धर्म गुरू थे और इस्लामी सिद्धांतों पर पूरी तरह कटिबद्ध थे और वे इस्लामी शिक्षाओं और नियमों को लागू करने पर बल देते थे। उनका कहना था कि हमारे धार्मिक आदेशों ने जो सबसे अच्छे और सर्वोच्च हैं, हमारे मार्ग को निर्धारित कर दिया है। हमने दुनिया के सबसे श्रेष्ठ और महान व्यक्ति मुहम्मद सलल्लाहो अलैह के नेतृत्व में और उनके नियमों पर कटिबद्ध होकर उन समस्त शक्तियों से संघर्ष करें गे जो हमारे राष्ट्र और देश पर अतिक्रमण करेंगे। इस्लाम धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं में सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा हिंसा से दूरी और शांतिपूर्ण ढंग से समस्याओं के समाधान के प्रयास पर बल देती है क्योंकि यह ईश्वरीय धर्म दयालुता और कृपा का प्रतीक है और इसी आधार पर इस्लाम धर्म की पहचान रखने वाले के रूप में इमाम ख़ुमैनी स्वयं को इस्लामी क़ानूनों के क्रियान्वयन पर कटिबद्ध समझते थे और क्रांति की सफलता के लिए उन्होंने अपनी रणनीति को ऐसा बनाया था जितना संभव हो सके कम से कम जनता को नुक़सान पहुंचे। अलबत्ता यह कार्य बहुत ही कठिन था क्योंकि दुश्मन किसी भी प्रकार के अपराध में तनिक भी संकोच नहीं कर रहा था।

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पहलवी शासन से संघर्ष में इमाम ख़ुमैनी की महत्वपूर्ण रणनीति हथियारों के प्रयोग के बिना जनता का व्यापक प्रदर्शन था। उनको पता था कि हर प्रकार की हथियारबंद कार्यवाही, जनता के जनसंहार के लिए शासन को बहाना प्रदान करेगी और इसी लिए उन्होंने जनता से केवल सड़कों पर निकलकर प्रदर्शन करने और विदेशियों की पिट्ठु सरकार का विरोध करने की अपील की थी। पूरे ईरान में होने वाले प्रदर्शन उस सरकार के लिए जो जनता को अपना समर्थक दर्शाने का प्रयास कर रही थी, असहनीय हो गया था। यही कारण था कि उसने जनता के दमन के लिए सेना और पुलिसकर्मियों का सहारा लिया किन्तु इमाम ख़ुमैनी ने दूरदर्शिता और सूझबूझ का प्रदर्शन करते हुए सेना के विरुद्ध जो जनता का ही भाग हैं हर प्रकार की हिंसा से रोका था। वास्तविकता यह है कि बहुत से सैनिक और पुलिसर्मी तथा उनके कमान्डर जो स्वयं भी मुसलमान थे, अत्याचार और विदेशियों की पिट्ठु सरकार के विरुद्ध उठ खड़े हुए। उनमें वह लोग भी थे जो क्रांतिकारी परिवार से सैन्य सेवा के लिए आए थे। इमाम ख़ुमैनी ने भी इसी वास्तविकता को समझते हुए जनता से अपील की थी कि ईरानी राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है कि वह सैन्य सारजेंट, अधिकारियों और उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों का सम्मान करें, यह बात ध्यान योग्य है कि सेना में कुछ विश्वासघाती लोग पूरी सेना को दूषित नहीं कर सकते। इन कुछ रक्तपिसासु लोगों का हिसाब किताब, ईरान की सेना से अलग है, सेना हमारा हिस्सा है और राष्ट्र सेना का भाग है।

दूसरी ओर जनता ने अपने प्रदर्शन के माध्यम से सैनिकों से संपर्क साध लिया और हिंसा का रास्ता लगभग बंद हो गया। प्रदर्शनों के दौरान जब लोगों की नज़र सैनिकों और पुलिसकर्मियों पर पड़ती थी कि तो वे नारे लगाते थे कि “इमाम ख़ुमैनी के अनुसार, सैनिक हमारे भाई” जब सैनिक अपने कमान्डरों के भीषण दबाव में आकर फ़ायरिंग करने पर विवश हो जाते थे तब जनता का नारा इस प्रकार होता था, “सैनिक भाई, अपने भाई की हत्या क्यों” इस प्रकार से जनता ने सशस्त्र सेना को यह संदेश दिया कि हम सब आपके भाई हैं और हमारे संयुक्त शत्रु शाह और अमरीका हैं। सैनिकों की धार्मिक आस्थाओं के दृष्टिगत यह नारे इतने अधिक प्रभावशाली हुए कि जैसा कि इमाम ख़ुमैनी ने भविष्यवाणी की थी, कुछ फ़रार होकर जनता के साथ मिल गये। यहां तक कि कुछ स्थानों पर उन्होंने लोगों का जनसंहार करने वाले कमान्डरों को ही मौत के घाट उतार दिया और जनता के शरण में आ गये।

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इमाम ख़ुमैनी ने जिन्हें सशस्त्र सेना की पूरी पहचान थी, सैनिकों को छावनी छोड़कर भागने और जनता का साथ देने के लिए प्रेरित किया। उनको पता था कि सेना और मध्यवर्ग के सैन्य अधिकारी धर्मपरायण और शाह ही तानाशाही के विरोधी हैं और सेना के कुछ ही वरिष्ठ कमान्डर ही उसके वफ़ादार हैं। यही कारण था कि इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी क्रांति की सफलता के कुछ महीने पहले अपने एक घोषणापत्र में सैन्य अधिकारियों को सबोधित करते हुए कहा कि ईरान आपका देश है, ईरानी राष्ट्र आपका राष्ट्र है, अपने राष्ट्र से जुड़ जाइए, मैं जानता हूं कि आप में से बहुत से अपने राष्ट्र, देश और धर्म के प्रति वफ़ादार हैं और इन जनसंहारों, विश्वासघाती शाह और उसके पिट्ठुओं की लूट पाट और उसके अंतर्राष्ट्रीय अपराधों से आप चिंतित हैं। इसी प्रकार उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में भविष्य के कार्यक्रम के बारे में बताया कि यह बात स्पष्ट है कि सेना में कुछ पदाधिकारी ऐसे हैं जो निश्चेतना के कारण शाह का समर्थन कर रहे हैं और इसी प्रकार यातनाओं और जनसंहारों में एक दूसरे का साथ दे रहे हैं किन्तु सैनिक और बहुत से मध्यवर्ग के सैन्य अधिकारी ऐसे भी हैं जिनके दिल अब भी राष्ट्र के साथ हैं और शाह से विशेषकर उस पर अमरीकी सलाहकारों के वर्चस्व के कारण दुखी हैं और यह लोग जनता से भारी लगाव के कारण, देर या सवेर जनता से आ मिलेंगे और अब उसके प्रभाव दिखने लगे हैं।

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इस प्रकार से इमाम ख़ुमैनी ने युक्ति के साथ और जनता ने धैर्य का प्रदर्शन करते हुए शाह के दमन के सबसे बड़े हथकंडे अर्थात सेना को पंगु बना दिया और अब वह अपनी मर्ज़ी सेना द्वारा जनता का दमन नहीं कर सकता था। मुहम्मद रज़ा शाह के फ़रार होने से पहले और अमरीकी जनरल राबर्ट हाइज़र के देश में प्रविष्ट होने के दृष्टिगत, बहुत से लोगों का यह कहना था कि अमरीका, ईरान में रक्तरंजित विद्रोह के प्रयास में है किन्तु इमाम ख़ुमैनी ने जो सेना से भलिभांति परिचित थे, उसी समय कहा कि संभावना इस बात की है कि शाह फ़रार होने से पहले एक बड़ा अपराध अंजाम देना चाहता है और वह सैन्य विद्रोह है जिसके बारे में मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं, यह उसकी अंतिम चाल है किन्तु साहसी जनता जानती है कि सेना में कुछ पिट्ठु अधिकारियों और खूंख़ारों के अतिरिक्त जो उक्त आदेश से महत्वपूर्ण पदों पर बिठाए गये हैं, जिसके बारे में मुझे भी बताया गया है, सेना की सज्जन टुकड़ी इन पिट्ठुओं को इस प्रकार के अपराधों को अंजाम देने की कदापि अनुमति नहीं देगी जो उनके राष्ट्र और धर्म के विरोधी हो। इमाम ख़ुमैनी इस विश्वास के साथ कुछ साप्ताह बाद फ़्रांस से स्वदेश लौटे और उसके बाद उन्होंने बल दिया कि देर या सवेर से सेना, जनता के साथ हो जाएगी और सैद्धांतिक रूप से कुछ लोगों को छोड़कर बाक़ी राष्ट्र के रास्ते पर विश्वास रखते हैं और मैं उनमें से बहुत से लोगों के विचारों से अवगत हूं।

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इमाम ख़ुमैनी की युक्तिपूर्ण शिक्षाओं और जनता द्वारा सैनिकों के प्रति भाईचारे से इस्लामी क्रांति के दौरान हिंसा का स्तर और जनसंहार न केवल कम हुआ बल्कि यह शाही ताबूत में आख़िरी कील थी। वायु सेना की ओर से वफ़ादारी की घोषणा के बाद, तेहरान में वायु सेना की छावनी में कुछ वायु सेना के जवानों ने शाह के विरुद्ध प्रदर्शन किए और जब उन्होंने स्वयं को ख़तरे में देखा तो उन्होंने हथियार उठा लिए और जनता से अपनी सहायता की गुहार लगाई। यह सुनते ही जनता का एक बड़ा भाग उनकी सहायता के लिए पहुंच गया। तेहरान की कुछ छावनी छिटपुट घटनाओं और झड़पों के बाद जनता के नियंत्रण में आने लगीं और इस प्रकार धीरे धीरे एक महा क्रांति सफलता की ओर अग्रसर होने लगी।               

 

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