Feb १८, २०१७ १३:१९ Asia/Kolkata

हमने इस्लामी क्रान्ति की आकांक्षाओं व उपलब्धियों के बारे में चर्चा की। इस कार्यक्रम में ईरान में इस्लामी क्रान्ति के मूल्यों व आकांक्षाओं के आधार पर अस्तित्व में आए धार्मिक प्रजातंत्र के बारे में चर्चा करने का इरादा है।

यह व्यवस्था एक ओर पश्चिम में प्रचलित लिब्रल डेमोक्रेसी और सोशल डेमोक्रेसी तो दूसरी ओर वंशानुगत राजशाही का विकल्प है जो ईरान सहित पूर्वी समाजों में लंबे समय से छायी रही। यह आदर्श धीरे-धीरे इस्लामी देशों सहित बहुत से समाजों के लिए आदर्श बनने की राह पर अग्रसर है। इस शासन व्यवस्था के मॉडल से अधिक परिचित होने के लिए हमारे साथ रहे। ऐसा मॉडल जो धार्मिक शिक्षाओं और इस्लामी समाजों की स्थानीय परिस्थिति के अनुसार है।

 

धार्मिक प्रजातंत्र ऐसा आदर्श है जो इस्लामी क्रान्ति से प्रेरित है। ऐसी क्रान्ति जो न सिर्फ़ ईरान में छायी अत्याचारी राजशाही व्यवस्था के ख़िलाफ़ थी बल्कि दुनिया में प्रचलित दो शासन व्यवस्था लिब्ररल डेमोक्रेसी और सोशल डेमोक्रेसी की भी आलोचक थी। इन दोनों ही व्यवस्था के उस समय बहुत समर्थक मौजूद थे। इस्लामी क्रान्ति ने ऐसे समय धार्मिक प्रजातंत्र व इस्लामी गणतंत्र की बात की और उसे ईरान के राजनैतिक व क़ानूनी तंत्र पर लागू किया जब राजनैतिक हल्क़ों में धार्मिक प्रजातंत्र शब्दावली के बहुत ज़्यादा समर्थक नहीं थे क्योंकि पूरब और पश्चिम के बहुत से देशों में लोगों को राजनैतिक व सामाजिक मंच पर धार्मिक शासन का अच्छा अनुभव न था। पश्चिम में धार्मिक शासन और गिरजाघर मध्ययुगीन शताब्दियों के काले दौर की याद दिलाता था जब ईसाइयत जनता को लूटने व ठगने और गिरजाघर अत्याचारी व्यवस्थाओं को वैधता प्रदान करने का साधन बन गया था। पूरब में भी धर्म और शासन के बीच संबंध के कारण धर्म अत्याचारी शासन की सेवा में लग गया। ऐसे हालात में इमाम ख़ुमैनी ने धार्मिक प्रजातंत्र का विचार पेश किया जो वैचारिक और व्यवहारिक राजनीति के क्षितिज पर भी अद्वितीय आदर्श समझा जाता है।

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इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने ऐसे हालात में ऐसी शासन व्यवस्था के विचार को पेश किया जब धर्म विरोधी विचारधारा लेइसिज़्म और धर्म को राजनीति से अलग रखने वाली विचाराधारा सेक्युलरिज़्म राजनीति के मंच पर सक्रिय थी। यहां तक कि धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों के बीच भी धार्मिक प्रजातंत्र के विचार को बहुत ज़्यादा प्रोत्साहित नहीं किया जाता था जैसे शिया संप्रदाय के तत्कालीन वरिष्ठ धर्मगुरु आयतुल्लाह नाइनी और सुन्नी विचारक अब्दुर्रहमान कवाकेबी जैसी हस्ती भी धार्मिक प्रजातंत्र के समर्थक नही थीं। ऐसे हालात में एक धर्मगुरु इस तरह के विचार को पेश करे और उसे लागू करने की दिशा में क़दम उठाए। धार्मिक प्रजातंत्र और ख़िलाफ़त को जीवित करने के विचार के बीच बहुत फ़ासला था। इसी प्रकार धार्मिक प्रजातंत्र ने शिया धर्मगुरुओं के बीच प्रचलित उस विचार से भी दूरी बनाए रखी जिसका मानना था कि मानवता के अंतिम मोक्षदाता हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबत के काल में शासन का गठन अवैध है।

इमाम ख़ुमैनी ने धार्मिक प्रजातंत्र या इस्लामी गणतंत्र का विचार पेश करके उन विचारकों और अपने बीच रेखा खींच दी जो इस्लाम और प्रजातंत्र के बीच साठगांठ की कोशिश में थे। इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि इस्लाम के स्वभाव में प्रजातंत्र है। इस्लाम प्रजातंत्र का समर्थक है। इस धर्म में जनता की राय को अहमियत एक दिखावा नहीं बल्कि एक सच्चाई है जिसकी जड़ इस्लामी सिद्धांतों से मिली हुयी है। इमाम ख़ुमैनी की नज़र में इस्लाम में प्रजातंत्र और धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था संयोगवश घटना नहीं है जिसे पश्चिम से लिया हो और उसे ज़बरदस्ती आपस में समन्वित किया हो बल्कि प्रजातंत्र और धर्म एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं। इस व्यवस्था में इमाम महदी अलैहिस्सलाम की अनुपस्थिति में सरकार के गठन का आधार जनता की राय है। इमाम ख़ुमैनी की नज़र में इमाम महदी अलैहिस्सलाम की अनुपस्थिति में वरिष्ठ धर्मगुरु की हुकूमत वैध है लेकिन इसका गठन जनता की मर्ज़ी पर निर्भर है यहां तक कि जनता की राय के बिना वरिष्ठ धर्मगुरु जिसमें सभी शर्तें पायी जाती हों सरकार का गठन नहीं कर सकता।

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धार्मिक प्रजातंत्र व्यवस्था में जनता की राय सरकार के गठन का आधार है लेकिन जनता की भूमिका सिर्फ़ नेताओं को चुनने तक सीमित नहीं है बल्कि जनता शासन को चलाने में भी प्रभावी भूमिका निभाती है। इस बिन्दु से यह पता चलता है कि जोज़फ़ शुम्पिटर जैसे कुछ पश्चिमी विचारक प्रजातांत्रिक व्यवस्था और ग़ैर प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अंतर को सिर्फ़ नेताओं के चयन के लिए चुनाव के आयोजन को मानते हैं। उनका मानना है कि प्रजातंत्र का अर्थ चुनने और चुने जाने के अधिकार से संपन्न होना है, इससे आगे कुछ नहीं। लेकिन धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता की भूमिका सिर्फ़ चुनाव में भाग लेने तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्र के सभी वर्ग को सरकार के क्रियाकलाप पर नज़र रखने और उसके कार्यक्रमों के लागू होने की समीक्षा करने का अधिकार है। इस व्यवस्था में सभी अधिकारी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप में जनता द्वारा चुने जाते हैं लेकिन जनता की भागीदारी सिर्फ़ मतपेटियों तक ख़त्म नहीं हो जाती बल्कि छोटी सी छोटी चीज़ में उसकी भागीदारी होती है।

इमाम ख़ुमैनी धार्मिक प्रजातंत्र में जनता और शासक के बीच संबंध की व्याख्या में जनता और अधिकारियों के बीच हार्दिक संबंध पर बल देते हैं और उन्होंने राष्ट्र को शासक का अन्नदाता माना है। उनका मानना है कि जनता ही धार्मिक प्रजातंत्र को अत्याचारी शासन का रूप धारण करने से रोकती है क्योंकि इस व्यवस्था में जनता सरकार के क्रियाकलापों पर नज़र रखती है। इस संदर्भ में इमाम ख़ुमैनी कहते हैं, “अगर व्यवस्था कोई चीज़ थोपना चाहे तो राष्ट्र उसका रास्ता रोक देता है।” वह धर्मशास्त्र के अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के सिद्धांत के संबंध में देश के शासन तंत्र की निगरानी को जनता का अधिकार नहीं बल्कि कर्तव्य मानते हैं। वह कहते हैं, “पूरे राष्ट्र का कर्तव्य है कि सभी मामलों पर नज़र रखे। मेरे ऊपर भी नज़र रखे।”    

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धार्मिक प्रजातंत्र के बारे में आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई का मानना है कि धार्मिक प्रजातंत्र में जनता का योगदान सिर्फ़ व्यवस्था के गठन तक सीमित नहीं है बल्कि यह भूमिका योजना बनाने, निर्णय लेने और उसे लागू करने में भी है। उनका मानना है कि जनता की राय को सिर्फ़ मतपेटियों तक सीमित करना धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था के आधार में विघ्न पैदा करता है। उनका मानना है कि जनता सरकार और सत्ताधारियों के बीच सभी चरणों में संवाद व सहयोग होना चाहिए। वरिष्ठ नेता इस बारे में कहते हैं, “जनता के मत हासिल करने के लिए प्रचार और उसे भुला देना, जनता के सामने जवाबदेह न होना धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है।”

धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता का योजना बनाने, निर्णय लेने और उसे लागू करने में योगदान वह विशेषता है जो इसे लोकाधिकारवादी व दूसरी प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं से अलग करती है।

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इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान में जनता का स्थान धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता की अहमियत को दर्शाता है। जनता वरिष्ठ नेता, राष्ट्रपति, संसद सभापति, वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली परिषद के सदस्यों और नगर व ग्रामीण परिषदों के सदस्यों को चुनती है। इसी प्रकार अहम राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक विषयों में रेफ़्रेंडम के ज़रिए जनता की राय पूछी जाती है। इसी प्रकार पालिकाओं का स्वाधीन होना भी ईरान में प्रजातांत्रिक व्यवस्था की विशेषता है। इसके साथ ही ईरान के संविधान के तीसरे अध्याय में जो पूरी तरह ईरानी राष्ट्र के अधिकार से विशेष है, साफ़ तौर पर जनता की जान, माल, घर, अधिकार, और रोज़गार की रक्षा, जाति, भाषा और रंग के आधार पर भेदभाव न होना, क़ानून के सामने सभी नागरिकों का बराबर होना, लोगों से उनकी आस्था की पूछताछ न करना, प्रिंट मीडिया और राजनैतिक व नागरिक संगठन बनाने की आज़ादी, संसद के सामने वरिष्ठ नेता और राष्ट्रपति की जवाबदेही, राष्ट्रपति के शासन काल की अवधि का तय होना, अधिकारियों से सवाल करना, उनके ख़िलाफ़ अभियोग चलाना यहां तक कि उन्हें पद से हटाना, वरिष्ठ नेता, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री और उनके बीवी बच्चों की संपत्ति की जांच करना, वे बिन्दु हैं जिनका संविधान में प्रावधान है।

धार्मिक प्रजातंत्र के स्वभाव का तक़ाज़ा है कि ये सभी बिन्दु धार्मिक सिद्धांतों व मूल्यों के आधार पर लागू हों, यही कारण है कि इस्लामी गणतंत्र के संविधान में इस महत्वपूर्ण तत्व का विभिन्न नियमों में पालन किया गया है कि इसके पालन की सबसे अहम मिसाल वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व का गठन है। वरिष्ठ नेता व्यवस्था के इस्लामी व गणतांत्रिक स्वरूप की रक्षा करते हैं। यूं तो धार्मिक प्रजातंत्र की जड़ इस्लामी इतिहास से मिलती है लेकिन इसे लागू हुए अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है और इसी कम समय में इसने राजनैतिक विचारधाराओं में अपनी जगह बनायी है और उम्मीद है कि इस्लामी जगत में प्रशासनिक व्यवस्थाओं में अपना स्थान पहले से ज़्यादा बनाएगी।

 

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