Nov १९, २०१८ १७:३२ Asia/Kolkata

एक व्यक्ति दूर से बहुत ही क्रोध भरी नज़रों से उन लोगों को देख रहा था जो आपस में बैठे बहुत ही सौहार्दपूर्ण माहौल में बातें कर रहे थे।

वह यह दृष्य देख कर बहुत क्रोधित था। लोगों की मुस्कुराहट उसे और क्रोधित कर रही। उसे याद आ रहा था कि कुछ समय पहले तक इसी मदीना नगर में यही लोग किस तरह आपस में एक दूसरे से लड़ते और रक्तरंजित जंगें करते थे। यह व्यक्ति क्रोध में अपनी मुट्ठियां भींचता था। ख़ुद से कहता था कि यह कैसे मुमकिन है कि इतने कम समय में वह दुश्मनी व द्वेष शांति व प्रेम में बदल जाए? उस व्यक्ति ने ख़ुद से कहाः "अगर यह सब मोहम्मद के नेतृत्व में जो नए धर्म के पैग़म्बर हैं, इसी तरह आगे बढ़ता रहा तो यहूदियों का वजूद पूरी तरह ख़तरे में पड़ जाएगा। मगर मोहम्मद ने क्या किया कि मदीने के दो बड़े क़बीले औस व ख़ज़रज की पुरानी लड़ाई दोस्ती व भाईचारे में बदल गयी? यह व्यक्ति मदीने में इस्लाम के तेज़ी से फैलने की वजह से भयभीत था और उसका वजूद इस्लाम के ख़िलाफ़ द्वेष से जल रहा था।" इस व्यक्ति का नाम शास बिन क़ैस था जो यहूदी था।

शास बिन क़ैस इस सोच में डूबा हुआ था कि अगर मुसलमान एकजुट हो गए तो मदीना में उसकी कोई दाल नहीं गलेगी। उसने एक चाल सोची। तेज़ी से मदीने की गलियों से गुज़रता हुआ एक जवान यहूदी के पास पहुंचा। उसने कहाः तुम मुसलमानों के बीच में जाओ, उनके मन विगत के मतभेदों व जंगों की याद ताज़ा कराओ। औस और ख़ज़रज के बीच बोआस नामक रक्तरंजित घटना सहित जंगों की याद दिलाओ। ऐसा करो कि ये दोनों क़बीले फिर एक दूसरे से भिड़ जाएं।

बोआस वह जगह थी जहां अज्ञानता के दौर में मदीने के दो क़बीलों औस और ख़ज़रज के बीच आख़री जंग हुयी थी। इस युद्ध में औस क़बीला विजयी हुआ था। यह बहुत ख़तरनाक जंग थी जो इन दोनों क़बीलों के बीच अभूतपूर्व थी जो कई महीने चली थी। यहूदी जवान ने औस और ख़ज़रज क़बीले के लोगों के बीच बोआस जंग सहित दूसरी जंगों की याद छेड़ दी और दोनों क़बीलों ने जो शेर कहे थे वे पढ़े। इस षड्यंत्र का असर हुआ और अंसार का एक समूह गर्व की बातें करने लगा जो विवाद का रूप धारण कर गया। यहां तक कि औस और ख़ज़रज के कुछ लोग एक दूसरे को धमकी देने लगे। उनमें से एक ने कहा कि अगर चाहो तो फिर से लड़ लो। दो गुटों में एक दूसरे के ख़िलाफ़ क्रोध भड़क उठा। लड़ने का फ़ैसला किया और लड़ने के लिए वे हर्रा नामक स्थान की ओर निकल पड़े।

जब यह ख़बर पैग़म्बरे इस्लाम तक पहुंची तो आप तेज़ी से अपने कुछ अनुयाइयों के साथ उनके पाई गए और कहाः "हे मुसलमानो! ख़ुदा को याद करो। क्या फिर अज्ञानता की ओर जाना चाहते हो जबकि मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूं।"

पैग़म्बरे इस्लाम ने उन लोगों को ईश्वरीय मार्गदर्शन और अनेकेश्वरवाद से मिली मुक्ति तथा उनके बीच आपस में मेल मोहब्बत के ज़रिए अपनी ओर आकृष्ट किया। जैसे ही मुसलमानों को समझ में आया कि ये शैतानी ख़्याल था जो घात लगाए दुश्मन ने उनके मन में पैदा किया, वे रोने लगे। लोगों का यह गुट पैग़म्बरे इस्लाम की बातों से प्रभावित होकर अपने फ़ैसले से पलट गया, दन्होंने हथियार फेंक दिए और एक दूसरे को गले लगा लिया। उन्हें समझ में आ गया कि यह इस्लाम के दुश्मनों की साज़िश थी। वे सबके सब पैग़म्बरे इस्लाम के साथ मदीना पलट आए।                   

इससे पहले कि कुछ कहें यह बताना ज़रूरी लगता है कि ईरान की इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने मुसलमानों के बीच एकता के लिए 12-17 रबीउल अव्वल को एकता सप्ताह घोषित किया था। अगरचे इस्लामी जगत की मौजूदा स्थिति के मद्देनज़र एकता एक कठिन उद्देश्य लगे लेकिन यह बात नहीं भूलना चाहिए कि मुसलमानों के बीच एकता पैदा करने वाले अनेक न्दु हैं कि इनमें से एक ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम का वजूद है।

पैग़म्बरे इस्लाम के चचेरे भाई हज़रत जाफ़रे बिन अबी तालिब जो मुसलमानों के एक समूह के साथ हबशा अर्थात मौजूदा अफ़्रीक़ा महाद्वीप के इथोपिया, एरिट्रिया, जिबूती और सोमालिया पर आधारित क्षेत्र पलायन कर गए थे, हबशा के बादशाह के लिए अपने समाज की स्थिति की व्याख्या करते हुए कहा थाः "हम ऐसे लोग थे कि अज्ञानता के काल में मूर्ति पूजा करते थे, मुर्दा जानवर खाते थे, बुरे कृत्य करते थे, संबंधियों से संबंध विच्छेद रखते थे, पड़ोसियों और संधि करने वालों के साथ बुरा व्यवहार करते थे, हमारा ताक़तवर कमज़ोर के माल को हड़प कर जाता था, हमारी हालत ऐसी ही रही यहां तक कि ईश्वर ने हमारे बीच में हममें से एक पैग़म्बर भेजा जिसे में सच्चाई, अमानतदारी और चरित्रता जैसी विशेषताओं से पहचानते हैं। उसने हमें ईश्वर की ओर बुलाया ताकि हम उसे अनन्य पहचान कर उसकी पूजा करे।"

ऐसे भ्रष्ट व पतन का शिकार समाज में जहां किसी एक का शासन न था, पैग़म्बरे इस्लाम ईश्वर पर आस्था के साथ मदीना को एकता का आदर्श बनाना चाहते थे।

जब तक किसी समाज की मानसिकता व संस्कृति न बदले इस समय तक उसके सदस्यों के बीच एकता व समरस्ता पैदा करना मुमकिन नहीं है। यही वजह है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने सबको ईश्वर की ओर बुलाया। उन्होंने लोगों को उस ईश्वर की ओर बुलाया जो अकेला है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के आले इमरान सूरे की आयत नंबर 103 में ईश्वर कह रहा है

"ईश्वर की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो, पृथक मत रहो और ईश्वर की उस नेमत को याद करो कि तुम आपस में एक दूसरे के दुश्मन थे और उसने तुम्हारे मन में एक दूसरे के लिए प्रेम जगाया और उसकी नेमत की वजह से एक दसूरे के भाई बन गए।"

इस बात में शक नहीं कि पैग़म्बरे इस्लाम के सामने एकेश्वरवाद के विस्तार और उसके आधार पर इस्लामी समाज में एकता पैदा करने के मार्ग में कुछ रुकावटें थीं जिनमें सबसे बड़ी रुकावट क़बायली व जातीय भेदभाव था। वह अपनी बातचीत और व्यवहार में अज्ञानता के दौर के इस विचार का कड़ाई से विरोध करते थे और ईश्वर से डर को एक दूसरे से बेहतर होने का मानदंड बताते हुए फ़रमाया थाः "मुसलमान आपस में भाई हैं और किसी को किसी पर वरीयता नहीं है।" पैग़म्बरे इस्लाम ने बिलाल हबशी को अपना मोअज़्ज़िन नियुक्त किया। वे अज़ान देते थे। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम ने बहुत से लोगों को जिनका वंश मशहूर न था, अलग अलग तरह की ज़िम्मेदारियां सौंपी थीं और उन्हें वे अहमियत देते थे। शायद इन्हीं लोगों में सलमान फ़ारसी भी थे जिनकी महानता का पैग़म्बरे इस्लाम ने इन शब्दों में वर्णन किया हैः "सलमान हमारे परिजनों में हैं।"

एक दिन हज़रत सलमान फ़ारसी पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ साथियों के साथ बैठे हुए थे। हर कोई अपने वंश का गुणगान कर रहा था। जब हज़रत सलमान की बारी आयी तो उन्होंने बहुत ही विनम्रता से कहाः "मेरा नाम सलमान है। ईश्वर के बंदों में से एक बंदे का बेटा हूं। पथभ्रष्ट था, ईश्वर ने मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के ज़रिए मेरा मार्गदर्शन किया। मैं निर्धन था ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम के ज़रिए मुझे आवश्यकता मुक्त कर दिया। मैं दास था ईश्वर ने मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के ज़रिएस मुझे आज़ाद किया। यह मेरा वंश व कुल है।" जब यह ख़बर पैग़म्बरे इस्लात तक पहुंची तो आपने सलमान फ़ारसी की बात की पुष्टि करते हुए दूसरों को क़बायली भेदभाव की बातें करने से मना दकिया और धर्म, ईश्वर से डर, नैतिकता, पुरुषार्थ तर्क और समझबूझ को वरीयता का आधार बताया।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम अपनी बातचीत  और व्यवहार में दासों व वंचितों को धनवानों का धार्मिक बंधू बनाते और ख़ुद भी उनके बीच बैठते थे, उनके जैसा कपड़ा पहनते और उन्हीं के जैसा जीवन व्यतीत करते थे। वह मालिकों को दासों के साथ अच्छा व्यवहा करने और उन्हें आज़ाद करने के लिए प्रेरित करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम के इस व्यवहार का तत्कालीन मदीना के समाज पर बहुत असर पड़ा।

एक दिन एक धनवान व्यक्ति बड़े अच्छे लेबास में पैग़म्बरे इस्लाम के पास बैठा हुआ था। उसके बग़ल में एक निर्धन व्यक्ति बैठ गया। धनवान व्यक्ति ने अपना लेबास समेटा ताकि निर्धन व्यक्ति के लेबास से वह छू न जाए। पैग़म्बरे इस्लाम ने जब यह देखा तो उस धनवान व्यक्ति से नाराज़ हुए। वह शर्मिंदा हुआ और अपनी आधी संपत्ति उस निर्धन व्यक्ति को देने के लिए तय्यार हो गया लेकिन उस निर्धन व्यक्ति ने इसे स्वीकार न किया और कहाः मुझे डर है कि कहीं इस व्यक्ति की गर्व करने वाली भावना मेरे मन में जागृत न हो जाए।  ऐसी संस्कृति के नतीजे में जो धन संपत्ति को नकारे और ईश्वर से डर व सदाचारिता को वरीयता का आधार बनाए, समाज में न्याय व बराबरी की भावना मज़बूत होती है और जब ऐसा होता है तो समाज के सभी लोग चाहे स्वामी हो या दास, निर्धन हो या समृद्ध, सभी लोग समाज के निर्माण और उसकी एकता की रक्षा के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार समझते हैं।

मदीना में लोगों के बीच एकता व समरस्ता पैदा करने और इस शहर के बेहतर संचालन के पैग़म्बरे इस्लाम ने एक और बहुत अहम क़दम उठाया। आपने ऐसी संधियां की जिन्से मदीने में मौजूद क़बीलों के आपसी संबंध व्यवस्थित हुए और आपसी मेल जोल का मार्ग समतल हुब। इन संधियों ने मदीना के भीतर मौजूद क़बीलों के आपसी संबंध, मक्का से मदीना पलायन करने वाले मुसलमानों और मदीना के आस पस के मुसलमानों व यहूदियों के बीच संबंधों का स्वरूप तय किया और लड़ाई झगड़े व भेदभाव की रोकथाम की। इस तरह मदीने में बाहरी ख़तरों के ख़िलाफ़ एक संगठित मोर्चा वजूद में आया। यह मोर्चा ख़ास तौर पर क़ुरैश के अनेकेश्वरवादियों के ख़िलाफ़ वजूद में आया। यह भी सच्चाई है कि यहूदियों ने विभिन्न मौक़ों पर इन संधियों का उल्लंघन किया और उन्हें दुश्मन के साथ सहयोग व संधि के उल्लंघन का अंजाम भी भुगतना पड़ा।

पैग़म्बरे इस्लाम ने इस्लामी समाज में एकता के लिए एक और अहम क़दम जो उठाया वह यह था कि आपने मक्का से मदीना पलायन करने वाले मुसलमानों और मदीना में रहने वाले मुसलमानों में से हर एक के बीच बंधुत्व का बंधन क़ायम किया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के साथ अपने बंधुत्व का बंधन क़ायम किया। पैग़म्बरे इस्लाम ने मदीना पहुंचने के पहले ही साल यह क़दम उठाया था। इस बंधुत्व का नजीता यह हुआ कि हर मुसलमान दूसरे मुसलमान भाई को ख़ुद पर वरीयता देता था। जैसा कि इस्लामी इतिहास में है कि बनी नुज़ैर क़बीले के यहूदियों के ख़िलाफ़ जंग में मिलने वाली संपत्ति के बंटवारे के दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने मदीनावासियों से कहा कि चाहो इस माल में मुहाजिरों को भी शामिल कर लो और चाहो तो सारा माल आपस में बांट लो, लेकिन मदीना वासियों ने कहा कि हम न सिर्फ़ जंग में प्राप्त संपत्ति को अपने मोहाजिर भाइयों को देंगे बल्कि अपनी संपत्ति व घर में भी उन्हें अपना भागीदार बनाएंगे। पैग़म्बरे इस्लाम की बंधुत्व पर आधारित दूरदर्शिता भरी सूझबूझ से औस और ख़ज़रज के बीच मतभेद ख़त्म हो गए, मोहाजिर और मदीनावासी, निर्धन व धनवान आपस में भाईचारे का एहसास करने लगे। इस तरह इस्लामी समाज की एकता व समरसता की दिशा में बड़ा क़दम उठा।

 

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