Sep ०८, २०१९ १५:१२ Asia/Kolkata

हमने कर्बला की महात्रासदी के समय की परिस्थितियों पर चर्चा की थी और इमाम हुसैन के महा अभियान और उस अभियान के सिपाहियों पर चर्चा की थी जो मौत को बेहद मीठी समझते थे।

मौत और ज़िदंगी के बारे में उनकी राय का सब से अच्छा व स्पष्ट प्रदर्शन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भतीजे हज़रत क़ासिम के उस बयान में हुआ जिसमें उन्होंने मौत को शहद से अधिक मीठा बताया था।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन जिस तरह से अनोखा और एसा उदाहरण था जिसकी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती, उसी तरह उनके साथ कर्बला में मौजूद लोग भी एसे थे जिनकी मिसाल नहीं मिलती। कर्बला में, संयम, धैर्य, साहस, आस्था, विश्वास, सच्चाई, बलिदान और त्याग का एसा रूप नज़र आता है जिसे मानव इतिहास की किसी अन्य घटना में एक साथ और इतनी शिद्दत के साथ देखना संभव नहीं है।

 

वास्तव में इमाम हुसैन ने अपने संघर्ष से यह संदेश दिया कि जब भी असत्य , सत्य का रूप धारण करके , लोगों को धोखा देने लगे और सत्य का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाए तो कुछ लोगों को अपनी जान की परवाह किये बिना आगे आना और उसे बचाना चाहिए । इमाम हुसैन ने एसा किया और पूरी मानवता को शक्तिशाली असत्य के सामने संघर्ष की शैली सिखा दी यही कारण है कि महात्मा गांधी ने कहा कि मैने कर्बला की घटना का अध्ययन किया है यदि भारतवासी अग्रेज़ों से स्वतंत्रता चाहते हैं तो उन्हें इमाम हुसैन की शैली पर संघर्ष करना चाहिए। यह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का वही अमर संदेश है जिसे सब तक पहुंचाने के लिए इमाम हुसैन ने अपने प्राणों की आहूति दी।

कर्बला में इमाम हुसैन और उनके साथियों ने यह सिद्ध कर दिया कि यह संसार ही सब कुछ नहीं होता , यदि उद्देश्य महान हो तो फिर मानवजीवन जैसी बहूमूल्य पुंजी भी लुटाई जा सकती है वह भी वैभव के साथ । ६ मुहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शिविरों में पानी लगभग समाप्त हो चुका था। किंतु अरब के मरुस्थल की तपती हवा के थपेड़ों से भी , इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों के चेहरों पर संतोष , संयम व संकल्प की चमक मांद न पड़ सकी । होंठ प्यास से सूख रहे थे किंतु वह ईश्वर का गुणगान कर रहे थे। यज़ीदी सेना के रूप में मृत्य साक्षात खड़ी थी किंतु वह उसकी आंखों में आखें डाले कर्बला का अमर इतिहास लिख रहे थे । यही कारण है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि जैसे साथी मुझे मिले  न मेरे नाना को मिले, न मेरे बाबा को और न मेरे भाई को। इमाम हुसैन के बहत्तर साथी , इमाम हुसैन के आंदोलन व कर्तव्य परायणता की प्रथम उपलब्धि थे।

 

कर्बला की घटना में जब कर्तव्यपराणता की बात की जाती है और वफादारी की बात होती है तो इस महा त्रासदी की एक एसी हस्ती की याद आती है जिसके बिना कर्बला की घटना का रंग संभवतः दूसरा होता हम कर्बला की उस हस्ती की बात कर रहे हैं जिसे अत्याधिक सदगुणों के कारण अबुलफज़्ल अर्थात गुणों के पितामाह की उपाधि दी गयी थी।

 हम कर्बला के तपते मैदान पर  साहस व वीरता व त्याग के बलिदान की अमर गाथा लिखने वाले हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम की बात कर रहे हैं जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सौतेले भाई थे किंतु सदैव स्वंय को इमाम हुसैन का दास समझा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने , पैग़म्बरे इस्लाम की पुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के शहीद होने के कुछ वर्षों के बाद हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम की माता फातेमा केलाबिया से विवाह किया था । उन के चार बेटे थे और इसे लिए उन्हें उम्मुलबनीन अर्थात पुत्रों की माता की उपाधि दी गयी थी। उम्मुलबनीन के पुत्रों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआन्दोलन में बड़ी वीरता से उनका साथ दिया और सब के सब शहीद हुए।  

 

वे अपने भाई इमाम हसन व इमाम हुसैन अलैहिमुस्सलाम के सेवा में बिना उनकी अनुमति के कभी बैठते नहीं थे उन्होंने अपनी ३४ की वर्ष पूरी  आयु में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को जो उनके भाई थे , पैग़म्बरे इस्लाम के पुत्र और स्वामी कह कर संबोधित किया। त्याग व बलिदान व वफादारी हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व के सब से महत्वपूर्ण आयाम हैं जिनकी चरमसीमा का प्रदर्शन उन्होंने कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महान आन्दोलन के दौरान किया। यहां तक कि आशूरा की महान घटना में हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम का नाम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के नाम के साथ जुड़ गया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की छोटी सी सेना के इस वीर व साहसी सेनापति ने रणक्षेत्र में वीरता व साहस के साथ ही साथ शिष्टाचार व नैतिकता का एसा उदाहरण पेश किया जो आज भी कर्बला की अमर घटना के अटूट अंश के रूप में याद किया जाता है।

 

 हज़रत अब्बास ने युद्ध के मध्य जब देखा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बच्चे प्यासे हैं तो उनके लिए पानी लाने वे अकेले की शत्रु की सेना में घुस गये और उनके घेरे को तोड़ते हुए फुरात नदी में  प्रविष्ट हो गये । वे स्वंय भी कई दिनों से प्यासे थे फुरात नदी का शीतल जल , कर्बला की तपते रेगिस्तान में उन के क़दमों में बह रहा था उन्हों ने चुल्लू में पानी उठाया किंतु इमाम हुसैन और उनके बच्चों की प्यास याद करके उसे नदी में फेंक दिया । अपनी छागल पानी से भरी और घोड़े पर सवार होकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों के शिविरों की ओर बढ़ने लगे किंतु मार्ग में यज़ीद के असंख्य सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया और वे प्यासे बच्चों के लिए पानी ले जाते समय  शहीद हो गये। इमाम हुसैन ने उन्हें तलवार उठाने की अनुमति नहीं दी थी और वे केवल एक भाला लेकर रणक्षेत्र में गये थे।

कहते हैं कि हज़रत अब्बास को यदि युद्ध की अनुमति मिली होती तो कर्बला की घटना का रुख कुछ और होता। हज़रत अब्बास बहुत साहसी और रण कौशल में अरब जगत में प्रख्यात थे। उन्होंने कर्बला से पहले अपने पिता हज़रत अली के साथ युद्ध में अपना रण कौशल दिखाया था और लोगों को पता था कि वह अकेले ही किस प्रकार से युद्ध का नक्शा बदल सकते हैं लेकिन कर्बला में यदि उन्हें तलवार उठाने की अनुमति मिल जाती तो फिर यह युद्ध सत्ता के लिए दो शहज़ादों के युद्ध में बदल जाता और सत्य व असत्य के मध्य लकीर खींचने वाली घटना के रूप में कर्बला को कोई याद नहीं रखता।

 

कर्बला की घटना में हज़रत अब्बास की भूमिका इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि वह सक्षम थे और युद्ध का परिणाम बदल सकते थे। उनकी वीरता और साहस अरब जगत में इतना प्रसिद्ध था कि कर्बला के मैदान में उन्हें उनके भाई इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अलग करने की भी कोशिश की गयी। कर्बला का अत्याधिक क्रूर और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हत्यारे, शिम्र बिन ज़िलजौशन ने " अब्दुबल्लाह बिन अबी महल" नामक एक व्यक्ति को कूफे के शासक उबैदुल्लाह बिन ज़्याद के पास भेजा ताकि वह हज़रत अब्बास के लिए सुरक्षा पत्र ले आए। हज़रत अब्बास की माता, " अब्दुबल्लाह बिन अबी महल की फूफी लगती थीं। वह हज़रत अब्बास के लिए सुरक्षा पत्र ले आया और शिम्र ने वह पत्र अपने दास, " करमान" के हाथ यज़ीदी सेना के सेनापति उमर सअद के पास भेजा और उसे यह पत्र दिखाया किंतु उमर सअद यह पत्र देख कर गुस्से में आ गया और उसने शिम्र को डांटा। वास्तव में उमर सअद का प्रयास था कि मामला बिना युद्ध के खत्म हो जाए वह इमाम हुसैन से युद्ध नहीं करना चाहता था किंतु यज़ीदी सेना की कमान से हाथ भी नहीं धोना चाहता था। सुरक्षा पत्र के अर्थ था कि जिसके लिए सुरक्षा पत्र है उसके अलावा बाकी लोगों से युद्ध किया जाएगा लेकिन शिम्र का युद्ध पर आग्रह था और वह इसी बहाने यज़ीदी सेना की कमान अपने हाथ में लेने का प्रयास कर रहा था।

शिम्र ने उमर सअद से पूछा कि बता अब क्या करेगा? शासक के आदेश का पालन करेगा या सेना की कमान मेरे हवाले करेगा? उमर सअद ने कहा नहीं , सेना की कमान तेरे हाथ में नहीं दूंगा तू पैदल सैनिकों का नेतृत्व कर। शिम्र खुश हो गया और सुरक्षा पत्र लेकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शिविरों की तरफ बढ़ गया। वहां पहुंच कर उसने ज़ोर से आवाज़ लगायी कि मेरे भांजे कहां हैं? हज़रत अब्बास और उनके भाईयों ने उसका कोई जवाब नहीं दिया तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि उसका जवाब दो भले ही वह भ्रष्ट है। हज़रत अब्बास अपने भाइयों के साथ आगे बढ़े और उसके पास पहुंच कर कहा ईश्वर की धिक्कार हो तुझ पर और तेरे सुरक्षा पत्र पर! तू हमारे लिए सुरक्षा पत्र लाया है और पैगम्बरे इस्लाम के नवासे असुरक्षित हैं?  शिम्र अपना सा मुंह लेकर वापस लौट गया।

 

कर्बला की घटना में जिस तरह से इमाम हुसैन के बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा, हज़रत अब्बास की  वफादारी, वीरता और संयम भी याद रखा जाएगा। ताक़त और वीरता जितनी अधिक हो, धैर्य व संयम उतना ही कठिन होता है किंतु हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम ने कर्बला की घटना में असीम साहस, रणकौशल और शक्ति व सामर्थ के साथ असीम धैर्य व संयम व सहनशीलता का प्रदर्शन करके यह दिखा दिया कि ईश्वर पर ईमान व आस्था रखने वाले, ईश्वरीय आदेशों और उसके दूतों के इशारों पर किस तरह से नतमतस्तक होते हैं। आज भी इराक़ के कर्बला नगर में फुरात नदी के किनारे हज़रत अब्बास का रौज़ा वफादारी व साहस व असीम दुखों व पीड़ा का प्रतीक है जहां हर साल पूरी दुनिया से दसियों लाख लोग, इस महापुरुष के त्याग व बलिदान को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने कर्बला जाते हैं। (Q.A.)  

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