Jan ०७, २०२० १७:०१ Asia/Kolkata

ईरान का इतिहास शूरवीर युवाओं और पुरुषों से भरा पड़ा है।

ईरान का इतिहास शूरवीर युवाओं और पुरुषों से भरा पड़ा है। यह केवल किताबों और काल्पनिक कहानियों में नहीं है बल्कि वास्तव में ईरान शूरवीर युवाओं और नायकों व महानायकों की धरती है। रज़ा शाह पहलवी और उसके पिता के काल में होने वाले संघर्ष, ईरान की इस्लामी क्रांति के दौरान होने वाले संघर्ष और इराक द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध के दौरान एसे  महान पुरुष और महिलाएं सामने आये हैं जिनके संघर्षों और उनकी यादों को ईरानी कभी भी नहीं भुला सकते। ऐसी महान हस्तियां आदर्श हैं चाहे उन्हें  व्यक्तिगत और सामाजिक जिस दृष्टि से भी देखें।

ऐसी महान हस्तियों पर हमारा सलाम हो जिन्होंने न्याय के लिए अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष को अपने जीवन का आधार बनाया और सच्चाई के रास्ते में और इस्लामी मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में प्रयास किया और उनके लहू बहाये गये। यह परम्परा रही है कि जो लोग सत्य के मार्ग में संघर्ष करते हैं अत्याचारी उनके मार्ग की बाधा बनते हैं और वे सत्य की राह में विभिन्न प्रकार की रुकावटें खड़ी करते हैं। जैसाकि हम सृष्टि के आरंभ से देख रहे हैं कि पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों ने न्याय, प्रेम और शांति जैसे विषयों की ओर लोगों को आमंत्रित किया परंतु समय के अत्याचारियों ने उनके मार्ग में रुकावटें उत्पन्न कीं और उनमें से बहुत से पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों को शहीद किया।

 

शहीद , वास्तव में न्याय की स्थापना और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करता है। अतः शहीदों को मानवाधिकार के नायक की संज्ञा देनी चाहिये। शहीद उच्च विचार और ऊंची आकांक्षा के स्वामी होते हैं और वे महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कार्य करते हैं परंतु उनके मध्य सब समान नहीं होते हैं बल्कि कुछ को कुछ पर श्रेष्ठता होती है। शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी ईरानी थे परंतु उन्होंने ईरान के अलावा सीरिया, लेबनान और इराक जैसे राष्ट्रों के लिए भी प्रयास किया। वह बहुत ही साधारण स्वयं सेवी थे उन्होंने अपना सारा ध्यान परलोक पर केन्द्रित कर रखा था। वह बहुत अच्छी तरह जानते थे कि अच्छा कार्य करने के लिए संसार और सांसारिक जीवन एक मौक़ा है और दुनिया से दिल लगाना परलोक के मार्ग की बहुत बड़ी रुकावट है। उन्होंने स्वर्गीय इमाम खुमैनी के सदाचरण से यह भी सीख ली थी कि रुढ़िवाद और कुफ्र भी सच्चाई के रास्ते की बाधा हैं इसलिए उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण भाग को रुढ़िवादियों और आतंकवादी गुट दाइश के कुफ्र से मुकाबले से विशेष कर दिया था।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई इस समय स्वर्गीय इमाम खुमैनी के उत्तराधिकारी हैं और विश्व की साम्राज्यवादी और वर्चस्ववादी शक्तियां अपने अवैध हितों के मार्ग की रुकावट के रूप में उन्हें देखती हैं और वह ईरानी राष्ट्र का नेतृत्व कर रहे हैं और एकता के लिए दुनिया के अत्याचारग्रस्त और पीड़ित राष्ट्रों का आह्वान कर रहे हैं और यह वह चीज़ है जो विश्व वर्चस्वादियों को लेशमात्र भी पसंद नहीं है। स्वर्गीय इमाम खुमैनी और उनके उत्तराधिकारी आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने अपने सफल नेतृत्व से सिद्ध कर दिया है कि वे अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों के आदर्श हैं और साम्राज्यवादियों से मुकाबले के लिए हज़ारों नहीं बल्कि लाखों लोगों का प्रशिक्षण कर दिया है जिनमें से एक शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी थे। शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी जहां बहादुरी, विनम्रता और स्वभिमान जैसी विशेषता के स्वामी थे वहीं एक ऐसी भी विशेषता थी जो सर्वविदित थी और वह यह थी कि वह अपने समय के वरिष्ठतम धार्मिक नेतृत्व का पूरी निष्ठा के साथ अनुसरण करते थे। जब नेतृत्व की बागडोर स्वर्गीय इमाम खुमैनी के हाथों में थी तब और अब जब नेतृत्व की ज़िम्मेदारी इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के हाथ में है। ईरान की इस्लामी क्रांति को सफल हुए 41 वर्षों का समय बीत रहा है परंतु एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जहां जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी ने वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व का उल्लंघन किया हो। दूसरे शब्दों में जिस चीज़ ने शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी को विश्व के पीड़ित लोगों के दिलों में प्रियतम बना रखा है वह उनकी यही विशेषता थी और उनकी यह विशेषता हम सबके लिए बहुत बड़ा पाठ है। जो भी इज़्ज़त, मान- सम्मान और लोकप्रियता चाहता है उसे इस बिन्दु का ध्यान रखना चाहिये यानी वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व का अनुपालन और शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी ने 41 वर्षों के दौरान इस चीज़ का बहुत अच्छी तरह अमल किया।

सैनिकों का मनोबल और उत्साह बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के पुरस्कार दिये जाते हैं। सबसे बड़े सैन्य पुरस्कार का नाम “ज़ुल फेक़ार” है जिससे शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी को सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार महान ईश्वर की राह में वर्षों के उनके अनथक प्रयासों के कारण दिया गया। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि यह पुरस्कार शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी के सतत प्रयासों का वास्तविक परिणाम नहीं है बल्कि यह तो मात्र उनके प्रयासों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक चिन्ह है उनके प्रयासों का वास्तविक प्रतिदान महान ईश्वर की ओर से वादा किया गया स्वर्ग है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन में कहता है कि बेशक ईश्वर ने उन मोमिनों की जानों और उनके मालों को ख़रीद लिया है और उसके बदले में स्वर्ग है जो उसकी राह में मारते और मारे जाते हैं।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ईश्वर की कृपा से आप सबने यह प्रयास किया है। महान ईश्वर इस हमारे प्रियतम भाई जनरल श्री सुलैमान क़ासिमी को सामर्थ्य प्रदान किया है। इन्होंने बारमबार अपनी जान को जोखिम में डाला और ईश्वर की राह में निष्ठापूर्वक प्रयास किया। इंशा अल्लाह महान ईश्वर इन्हें इनके प्रयासों का बदला दे और कृपा करे और इनके जीवन को मुक्ति प्रदान करे और उन्हें शहादत नसीब करे। अलबत्ता अभी नहीं। अभी इस्लामी गणतंत्र को इनसे वर्षों काम है किन्तु इंशा अल्लाह अंत में इन्हें शहादत नसीब होगी। इंशा अल्लाह आपको मुबारक हो।"

शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी विचित्र व्यक्तित्व के स्वामी थे। वह बहुत कृपालु और रहम दिल थे। इसी प्रकार वह कठिन परिश्रमी, मुजाहिद, विद्वान और सीखने वाले, लोगों से प्रेम करने वाले, राजनेता और वरिष्ठतम धार्मिक नेतृत्व का अनुसरण करने वाले थे। उनकी शहादत की ख़बर सुनकर पूरे विश्व में शोक की लहर दौड़ गयी। शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत पर इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने जो शोक संदेश दिया उसमें उन्होंने शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत की उपमा हज़रत अली अलैहिस्सलाम के निष्ठावान कमांडर मालिके अश्तर की शहादत से दी और बहुत ही शोक के साथ कहा" जान लो मालिक बिन हारिस का समय पूरा हो गया और उन्होंने अपने वचन को पूरा कर दिया और वह अपने पालनहार से मुलाकात के लिए गये। ईश्वर मालिके अश्तर पर दया करे, अगर वह पहाड़ होते तो उसका ऐसा शिखर होता जिस तक पहुंचा नहीं जा सकता। अगर वह पत्थर होते तो पत्थर की कड़ी चट्टान होते। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की प्रसिद्ध पुस्तक नहजुल बलाग़ा का एक मशहूर व्याख्याकार इब्ने अबिल हदीद कहता है” मेरी जान की क़सम, मालिके अश्तर इस प्रशंसा के पात्र थे। वह बहादुर, बलवान, दानी, सेनापति, विनम्र और शायर थे और नर्म और सख्त दोनों थे। जब वह क्रोधित होते थे तो सख्त होते थे और जब नर्म होते थे तो नर्मी और शालीनता का व्यवहार करते थे।"

 

शहादत जनरल क़ासिम सुलैमानी की हार्दिक आकांक्षा थी। उनका और उनके साथियों का बहुत अच्छा अंत हुआ। इससे अच्छा नहीं हो सकता था। बहुत से लोगों ने देखा है कि वह शहीद अहमद काज़िमी और शहीद एमाद मोग़निया के वियोग में किस प्रकार लगातार रोते थे। बहुत से लोगों ने यह भी देखा है कि उन्होंने किस प्रकार इन शहीदों के शवों से विदा ली थी। वह यह कार्य पूरी निष्ठा और दिल से करते थे और सूई की नोक के बराबर भी उनमें दिखावा नहीं होता था। उन्होंने हर उस चीज़ से दूरी कर ली थी जो संभव था कि किसी प्रकार से उनके प्रसिद्धि का कारण बनती। उनकी सफलता में उनकी इस विशेषता की बहुत भूमिका रही है। उन्होंने लेबनान, सीरिया और इराक में भी सेवाएं अंजाम दी हैं। वह शहीद की परिभाषा इस प्रकार करते हैं” जो शहीद नहीं होगा वह शहीद नहीं होगा। वास्तव में शहीद होने की शर्त शहीद होना है। अगर आज किसी के व्यवहार से शहादत की सुगंध आ रही है तो वह शहीद होगा। समस्त शहीदों में यह विशेषता पाई जाती है। शहीद होने वाला इंसान महान ईश्वर की याद में लीन हो जाता है और हर प्रकार के अहंकार को स्वयं से दूर कर लेता है, अंधेरे के पर्दों से पार करके महान ईश्वर की बारगाह में पहुंच जाता है। शहीदों ने हर चीज़ से पलायन कर लिया है यानी पत्नी, संतान, धन- दौलत आदि सब कुछ को महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने और उसकी बारगाह में पहुंचने के लिए त्याग दिया है। यह वह पलायन है जो अगर किसी इंसान में हो तो उसे शहादत का पुण्य मिलेगा यद्यपि वह शहीद भी न हो। धन- दौलत हासिल कर लेना बुद्धिमानी नहीं है बल्कि बुद्धिमानी यह है कि इंसान अपने अंदर उन विशेषताओं को सुरक्षित रखे जो उसे शहादत तक पहुंचा सकती हैं और जिस इंसान के अंदर यह विशेषता होगी वह ज़िन्दा शहीद होगा।

शहीद जनरल सुलैमानी शुक्रवार की सुबह तीन जनवरी को अपनी पुरानी व दिली आकांक्षा को पहुंचे। कितने अच्छे तरीक़े से उन्होंने अपना रास्ता समझा। उन्होंने बहुत अच्छी तरह से समझा कि लोक, परलोक की खेती है और प्रतिरोध की खेती बहुत कठिन खेती है और उसमें शहादत का लाभ सर्वोपरि है जब ईश्वर ही ग्राहक हो तो डर किस बात का।

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