Jan ०८, २०२० १५:१३ Asia/Kolkata

ईरान का इतिहास शूरवीर युवाओं और पुरुषों से भरा पड़ा है।

यह केवल किताबों और काल्पनिक कहानियों में नहीं है बल्कि वास्तव में ईरान शूरवीर युवाओं और नायकों व महानायकों की धरती है। इन्हीं महानायकों में से एक जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी हैं।

एक दूसरे संघर्षकर्ता हाज कमाल हैं। एक बार वह अपने चेहरे पर हाथ मलते और मुस्कुरा कर कहते हैं और बड़े आश्चर्य से स्वयं से पूछते हैं" जनरल क़ासिम सुलैमानी के बारे में मेरा क्या दृष्टिकोण है? वह अपने सवाल का जवाब खुद ही देते और कहते हैं" जनरल क़ासिम सुलैमानी के बारे में दृष्टिकोण रखने की ज़रूरत नहीं है। वर्ष 1376 हिजरी शमसी में ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के आदेश से इस्लामी क्रांति के संरक्षक बल सिपाहे पासदान आईआरजीसी के क़ुद्स ब्रिगेड के कमांडर नियुक्त हुए। कुद्स ब्रिगेड के बहुत से संघर्षकर्ता इस बात से क्षुब्ध थे। वे सोच रहे थे कि अब जनरल क़ासिम सुलैमानी को कम देख पायेंगे परंतु जनरल क़ासिम सुलैमानी के निकटवर्ती संघर्षकर्ता अच्छी तरह जानते थे कि जनरल  क़ासिम सुलैमानी एसे नहीं हैं जो बदल जायेंगे और हुआ भी एसा ही। एक साल में दो- तीन बार जनरल क़ासिम सुलैमानी से मुलाकात करते और उनके साथ बैठते थे। इस अवधि में जनरल सुलैमानी ने किसी को भी अपदस्थ नहीं किया।

 

हाज कमाल क़ुद्स ब्रिगेड के एक पुराने संघर्षकर्ता थे। उनकी गणना किरमान के प्राचीन संघर्षताओं और जनरल क़ासिम सुलैमानी के निकटवर्ती दोस्तों में होती थी। आजकल बहुत से संघर्षकर्ताओं का दिल रणक्षेत्र का हो रहा है और अपने पुराने दोस्तों की बात कर रहे हैं। एसा लग रहा है कि जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत से इस्लामी क्रांति की पुरानी यादें और इसी प्रकार आठ वर्षीय पवित्र प्रतिरक्षा के काल की सबको याद आ गयी है। एसा लग रहा है कि इस्लाम की रगों में दोबारा लहू डाल दिया गया है और सभी लोग इस्लाम की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए हैं।    

जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी एक साल में दो बार अपने घर में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभा आयोजित कराते थे। एक अय्याम फातेमिया अर्थात फातेमिया के दिनों में और दूसरे रमज़ान के पवित्र महीने में। इन शोक सभाओं में पवित्र प्रतिरक्षा के काल के संघर्षकर्ता एकत्रित होते थे। एक संघर्षकर्ता कमांडर मोहम्मद शाह मुरादी हैं जो पवित्र प्रतिरक्षा काल के जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी के दोस्त हैं। पिछले शुक्रवार को जब उन्होंने जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत की ख़बर सुनी तो उनकी अजीब हालत हो गयी। वह कहते हैं” यही इस साल रमज़ान का पवित्र महीना था जब आखिरी बार मैंने जनरल क़ासिम सुलैमानी को देखा था। उन्होंने हमारे लिए नहजुल बलाग़ा की कुछ बातें बयान कीं और नैतिक शिक्षाओं को याद दिलाया। कुछ सीरिया और इराक में होने वाली लड़ाइयों के बारे में बताया परंतु बहुत संक्षेप में बताया किन्तु क्षेत्र की स्थिति की बहुत अच्छी समीक्षा व विश्लेषण किया। इसके बाद अतीत की भांति पुराने संघर्षकर्ताओं ने एक दूसरे से बात की और हम अपने घर लौट आये। एक साल में दो बार जनरल क़ासिम सुलैमानी को देखते थे परंतु अब एसा लगता है कि मैं अनाथ हो गया हूं।

जनरल क़ासिम सुलैमानी ने जो सैनिक काम किया शायद उस वजह से बहुत से लोग उन्हें जानते हैं परंतु जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी एक सामान्य व सांस्कृतिक व्यक्ति थे। उनके पास शहीदों की बहुत अधिक यादगार बातें थीं और वह सांस्कृतिक कार्यों में अग्रणी थे और कहा जा सकता है कि जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी आईआरजीसी के सबसे अधिक सांस्कृतिक व्यक्ति थे। शहीद होने वाले संघर्षकर्ताओं के परिजन और उनके बच्चे जब जनरल शहीद कासिम सुलैमानी को देखते थे तो उन्हें बहुत सुकून व शांति मिलती थी।  

जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी बहुत सारी घटनाओं की जीवंत यादगार थे। उन्होंने प्रेम को अर्थ प्रदान किया और उसे दिशा दी। इस बात को सभी जानते थे कि जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी के आने पर कार्यक्रम और वहां मौजूद लोगों में हलचल मच जाती थी एसा लगता था जैसे हर किसी ने अपने बाप को देखा है। वह इतने मिलनसार थे कि जो बच्चे आराम से बैठे थे अब वे बड़ों की बात न तो सुन रहे थे और न ही अपनी पर थे। उस दिन भी संयोग से यही हुआ जबकि जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी हाल के अंतिम भाग से दाखिल हुए और धीरे से एक कुर्सी पर बैठ गये परंतु बच्चों में से एक ने उन्हें देख लिया और चिल्ला कर कहा हाज कासिम सलाम। पूरे हाल में सलाम और सलवात की आवाज़ गूंज गई। अब कोई भी यह नहीं सुन रहा है कि वक्ता क्या कह रहा है। जब इस प्रकार की स्थिति हो गयी तो वक्ता ने जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी से प्रार्थना की कि वे आगे आयें। बच्चे किसी बात का अवसर ही नहीं दे रहे थे, वे जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी से बात करना और उनके साथ फोटो ख़ींचाना चाह रहे थे। सच में शहीद होने वाले संघर्षकर्ताओं के परिजन इस बात के आदी हो गये थे कि किसी प्रकार के तामझाम के बिना जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी से अपने दिल की बात करें। जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी पवित्र रौज़ों की रक्षा में शहीद होने वाले संघर्षकर्ताओं के परिजनों से मुलाकात का कार्यक्रम आम तौर पर खुशी के दिनों में करते थे ताकि शहीद होने वालों के बच्चे खुशहाल हो सकें और इस बात को सब बहुत अच्छी तरह जानते थे।

शहीद अंसारी की धर्मपत्नी फातेमा जाफ़री हैं। वह जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी की याद में आयोजित शोक सभा में कहती हैं” आज रात को हम सब एकत्रित हुए हैं ठीक एक बड़े परिवार की तरह जिसका पिता दुनिया से चला गया हो। शायद एक दूसरे के साथ बैठने से हमारे बच्चों और परिवारों को थोड़ा आराम हो जाये। हम एक दूसरे की पीड़ा अच्छी तरह समझते हैं। यद्यपि शहादत उनकी हार्दिक आकांक्षा थी परंतु हमारे बच्चों ने दोबारा रो दिया। छोटे बच्चे अपनी मांओं की चादर से लिपट कर रोये और बड़ों ने अपने संघर्षकर्ता साथियों से अपने संबंधों को और मज़बूत कर लिया।

इस्लाम धर्म में अनाथ से प्रेमपूर्ण व्यवहार पर बहुत बल दिया गया है। स्वर्ग में जाने की एक शर्त अनाथों के साथ मधुर बर्ताव है। इसी प्रकार अनाथों पर अत्याचार करने और उनकी धन- सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने या खाने से बहुत कड़ाई से मना किया गया है और जो व्यक्ति उन पर अत्याचार करेगा या उनकी धन- सम्पत्ति को खायेगा महान ईश्वर ने परलोक में एसे व्यक्ति के लिए कड़ा दंड तैयार कर रखा है। हर इंसान में प्रेम उसके मानवीय विकास में प्रगति का कारण बनता है और प्रेम की ज़रूरत का एहसास बच्चों में अधिक होता है। माता- पिता वे व्यक्ति होते हैं जो सबसे अच्छे ढंग से इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं। जो बच्चा बचपने में ही इस अनुकंपा से वंचित हो जाये वह दूसरों की अपेक्षा अधिक प्रेम की आवश्कता का आभास करता है। जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी बहुत अच्छे मनोवैज्ञानिक भी थे वह अनाथ बच्चों विशेषकर शहीदों के बच्चों की इस आवश्कता को दूर करने का प्रयास करते थे। बच्चों को गोद में लेते थे अपने हाथ से उन्हें खाना खिलाते थे। उनके सिरों पर प्रेम और स्नेह का हाथ फिराते थे। शहीदों के बच्चों की मुस्कान से उन्हें खुशी होती थी। वह इतने अधिक मिलनसार थे कि एक शहीद का बच्चा जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी को नमाज़ की हालत में फूल की एक शाख देता है और वह उसे ले लेते हैं। मानो उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम का यह कथन बहुत अच्छी तरह सुन रखा था जिसमें आप फरमाते हैं” जब अनाथ रोता है तो ईश्वर का अर्श थर्रा उठता है उस वक्त ईश्वर कहता है किसने मेरे बंदे को जिसके माता- पिता को हमने बचपने में ही उससे ले लिया, रुलाया है? मेरी इज़्ज़त और जलाल की क़सम जो भी उसे चुप करायेगा मैं स्वर्ग उस पर अनिवार्य कर दूंगा।

जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी न केवल ईरानी लोगों में लोकप्रिय थे बल्कि क्षेत्र और विश्व में लोकप्रिय थे। उनकी शहादत के बाद उनके समर्थन में और उनसे समरसता व्यक्त करने के लिए पूरी दुनिया में जो प्रदर्शन हुए और हो रहे हैं उसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी ने महान ईश्वर की प्रसन्नता की राह में जेहाद को अपनी जीवन शैली बना रखा था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" जेहाद स्वर्ग का एक दरवाज़ा है जिसे ईश्वर ने अपने विशेष बंदों के लिए खोल दिया है।

 

जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी ने बारमबार लेबनान, सीरिया और इराक में अमेरिका और इस्राईल के षडयंत्रों को विफल बनाया। इराक में शीया- सुन्नी मुसलमानों को एकजुट करने में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सुन्नी मुसलमानों की सहायता की जिसके परिणाम में इराक में अतिग्रहणकारियों के मुकाबले में राजनीतिक स्थिरता और मज़बूती अस्तित्व में आयी और जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी पिछले सप्ताह इसी महत्वपूर्ण उद्देश्य से इराक जा रहे थे कि अमेरिका ने आतंकवादी हमला करके उन्हें और इराक के स्वयं सेवी बल हश्दुश्शाबी के डिप्टी कमांडर अबू मेहदी अलमोहिन्दिस और उनके दूसरे आठ साथियों को शहीद कर दिया। अमेरिका के इस आतंकवादी कृत्य के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि वह न केवल आतंकवाद से मुकाबला नहीं करता है बल्कि आतंकवादियों की सहायता भी करता है और वह आतंकवादियों का जन्मदाता और अन्नदाता है। सालों से वह इराक और सीरिया में आतंकवादी गुटों से मुकाबले का दावा करता है परंतु आज तक उसने एसा कोई हमला नहीं किया जिससे वास्तव में आतंकवादी गुटों को कोई नुकसान पहुंचा हो। यही नहीं इस बात के पुष्ट प्रमाण मौजूद हैं कि उसने आतंकवादी गुटों को हथियार दिये हैं और उनका सैन्य प्रशिक्षण किया है। सीरिया में गिरफ्तार होने वाले बहुत से आतंकवादियों के पास से अमेरिका निर्मित हथियार मिले हैं जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह आतंकवादियों की सहायता करता है। यही नहीं आतंकवादी गुट दाइश और दूसरे आतंकवादी गुटों ने इराक और सीरिया में अनगिनत जघन्य अपराध किये हैं परंतु अमेरिका और मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाले देशों व सरकारों ने कभी भी उनकी भर्त्सना तक नहीं की।

सीरिया और इराक में अमेरिकी षडयंत्रों को विफल बनाने और आतंकवादी गुटों का सफाया करने में जनरल सुलैमानी ने जो भूमिका निभाई है उसे भुलाया नहीं जा सकता। जनरल शहीद क़ासिम सुलैमानी रणक्षेत्र में होते थे परंतु कभी भी उन्होंने सैनिक वर्दी नहीं पहनी। क्योंकि उन्होंने हर उस चीज़ को त्याग दिया था जो उनकी पहचान और प्रसिद्धि का कारण बनती।

बहरहाल मंगलवार को जनरल क़ासिम सुलैमानी को उनके पैतृक नगर किरमान में दफ्न कर दिया गया और उनके दफ्न समारोह में लाखों लोगों ने सजल नेत्रों के साथ उन्हें विदा किया।

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