Nov २९, २०२१ ११:०९ Asia/Kolkata
  • एड्स की तबाही से बचने के उपाय क्या हैं, सबसे पहले एड्स का केस कहां मिला, जानिए एड्स के बारे में महत्वपूर्ण चीज़ें....

विश्व एड्स दिवस या 'World Aids Day' हर साल पहली दिसम्बर  को मनाया जाता है।

विश्व एड्स दिवस  का उद्देश्य एचआईवी संक्रमण की वजह से होने वाली बीमारी एड्स के बारे में जागरुकता बढ़ाना है। एड्स (Aids) वर्तमान युग की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। यूनीसेफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक 37.9 मिलियन लोग HIV के शिकार हो चुके हैं। दुनिया में रोज़ाना हर दिन 980 बच्चों एचआईवी वायरस के संक्रमित होते हैं, जिनमें से 320 की मौत हो जाती है।

विश्व एड्स दिवस या 'World Aids Day' सबसे पहले अगस्त 1987 में जेम्स डब्ल्यू बुन और थॉमस नेटर नाम के व्यक्ति ने मनाया था। जेम्स डब्ल्यू बुन और थॉमस नेटर विश्व स्वास्थ्य संगठन में एड्स पर ग्लोबल कार्यक्रम 'WHO' के लिए अधिकारियों के रूप में स्विट्ज़रलैंड के शहर जिनेवा में नियुक्त थे। जेम्स डब्ल्यू बुन और थॉमस नेटर ने WHO के ग्लोबल प्रोग्राम ऑन एड्स के डायरेक्टर जोनाथन मान के सामने विश्व एड्स दिवस मनाने का सुझाव रखा। जोनाथन को विश्व एड्स दिवस 'World Aids Day' मनाने का विचार अच्छा लगा और उन्होंने पहली दिसम्बर 1988 को विश्व एड्स डे मनाने के लिए चुना। बता दें कि आठ सरकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य दिवसों में विश्व एड्स दिवस शामिल है।

दुनियाभर में हर साल एचआईवी संक्रमण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए पहली दिसम्बर को वर्ल्ड एड्स डे मनाया जाता है। हर साल विश्व एड्स दिवस की थीम अलग-अलग रखी जाती है। एड्स एक ख़तरनाक बीमारी है। एड्स की बीमारी का काफ़ी देर बाद पता चलता है और मरीज़ भी एचआईवी टेस्ट के प्रति सजग नहीं रहते, इसलिए अन्य बीमारी का भ्रम बना रहता है। इस गंभीर समस्या से बचाव का सबसे पहला चरण एड्स के लक्षण यानी "Symptoms Of AIDS" पहचानना है। एड्स का फ़ुलफ़ार्म 'एक्वायर्ड इम्यूनो डिफिशिएंसी सिंड्रोम' (Acquired Immunodeficiency Syndrome) होता है। शुरुआती दौर में विश्व एड्स दिवस (Aids Day) को सिर्फ बच्चों और युवाओं से ही जोड़कर देखा जाता था।

 

विश्व एड्स दिवस के लिए हर साल नया थीम या नारा दिया जाता है और इस साल का नारा है असमानता ख़त्म करो, एड्स ख़त्म करो और महामारी ख़त्म करो (End Inequalities. End AIDS. End Pandemics)। पिछले साल की थीम थी एचआईवी महामारी समाप्त करना, लचीलापन और प्रभाव। 1959 में अफ्रीका के कॉन्गो में एड्स का पहला मामला सामने आया था, जिसमें कि एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। जब उसके रक्त की जांच की गई तो पुष्टि हुई कि उसे एड्स है। 1980 की शुरुआत में यह बीमारी सामने आई, जिसके बाद अबतक पूरी दुनिया में लाखों की तादाद में लोग इस बीमारी से जान गंवा चुके हैं।

नवम्बर 1990 को लाइफ़ नामक पत्रिका ने डेविड नामक एक युवा की फ़ोटो प्रकाशित की थी, उसका बदन कमज़ोर और लकड़ी की तरह सूखा हुआ था, वह अपनी मौत की घड़ियां गिन रहा था और उसके परिजन के आसपास खड़े रो रहे थे। इस फ़ोटो ने दुनिया को झिंझोड़कर रख दिया था और उसके बाद से दुनिया वाले इस ख़तरनाक बीमारी की ओर ध्यान देने लगे। डेविड अमरीका के ओहायो राज्य के छोटे के क़स्बे में पैदा हुआ था और वहीं पर वह बड़ा हुआ, 18 साल की उम्र के अंतिम पड़ाव में उसे पता चला कि वह एचआईवी से संक्रमित है।

बताया जाता है कि जिस दिन डेविड का निधन हुआ, उस दिन उसकी मां हास्पिटल आई थीं और उन्होंने फ़ैरर से कहा था कि उनके बेटे के साथ उनकी अलविदाई की एक यादगार तस्वीर ले और इस शर्त के साथ कि डेविड की इस तस्वीर में वित्तीय पहलू न हो। यादगार फ़ोटो तो ले ली गयी और उसके बाद यह तस्वीर हज़ार समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपी और पूरी दुनिया में इस पर अनेक तरह के कार्यक्रम बने।

फ़ैरर की तस्वीर को दुनिया के सामने आने को तीन दश्क हो गये और तब से लेकर आजतक इस तस्वीर ने एड्स की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने में अहम भूमिका अदा की है। हर साल दुनिया भर के संगठन और व्यक्ति एचआईवी महामारी की ओर ध्यान दिलाते हैं, एचआईवी जागरूकता और ज्ञान को बढ़ाने के लिए प्रयास करते हैं, एचआईवी के कलंक के ख़िलाफ़ बोलते हैं और बढ़ती प्रतिक्रिया को रोकने के लिए कदम उठाते हैं।

 

इन वर्षों के दौरान दुनिया के बहुत से देशों ने एड्स के बारे में लोगों के विचारों को परिवर्तित किया है। वर्षों तक इस बीमारी का इन्कार किया जाता रहा और इसको छिपाने की कोशिश की जाती रही लेकिन छिपाने और इन्कार से बीमारी ख़त्म नहीं होती। जब दुनिया इस तरफ़ विशेष रूप से ध्यान देने लगी तो एड्स की बीमारी के उपचार में प्रगति भी हासिल हुई। वर्ल्ड एड्स डे मनाने का उद्देश्य एचआईवी संक्रमण की वजह से होने वाली महामारी एड्स के बारे में हर उम्र के लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना है। एड्स वर्तमान युग की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है।

अब सवाल यह पैदा होता कि एचआईवी या एड्स क्या है?

एचआईवी एक प्रकार के जानलेवा इंफेक्शन से होने वाली गंभीर बीमारी है, जिसे मेडिकल भाषा में ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानि एचआईवी के नाम से जाना जाता है। जबकि लोग इसे आम बोलचाल में एड्स यानि एक्वायर्ड इम्यून डेफिशिएंसी सिंड्रोम के नाम से जानते हैं। इस रोग में जानलेवा इंफेक्शन व्यक्ति के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता या (इम्यून सिस्टम) पर हमला करता है, जिसकी वजह से शरीर सामान्य बीमारियों से लड़ने में भी अक्षम होने लगता है।

एड्स ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियेंसी (एचआईवी) वायरस के संक्रमण के कारण होने वाला महामारी का रोग है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने साल 1995 में विश्व एड्स दिवस के लिए एक आधिकारिक घोषणा की थी, जिसके बाद से दुनिया भर में विश्व एड्स दिवस मनाया जाने लगा। एड्स एक ऐसी बीमारी है जिसमें इंसान की संक्रमण से लड़ने की शरीर की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। इतने सालों बाद भी अबतक एड्स का कोई प्रभावी इलाज नहीं है। अब यह सवाल पैदा होता है कि इस ख़तरनाक बीमारी की रोकथाम के लिए क्या किया जाए? इस बारे में डाक्टर्स और शोधकर्ताओं ने अनेक रास्ते बयान किए है, इन सब में सबसे महत्वपूर्ण रास्ता सूचनाओं का अदान प्रदान और मीडिया पर भरोसा करना है।

एचआईवी एड्स से पूरे दुनिया के लोग लोग परेशान हैं, इसका कारण यह है कि दरअसल ये एक बेहद गंभीर और लगभग ला इलाज बीमारी है लेकिन कई बार समय से पता चल जाने या बीमारी के ज़्यादा न बढ़ने पर पता चलने से इस पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। इसके उपचार के लिए हम अंग्रेजी दवाइयों के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवाइयों का भी इस्तेमाल करके राहत पा सकते हैं यानी आयुर्वेदिक औषधि से भी एचआईवी या एड्स की चिकित्सा की जा सकती है। यह बात इस विषय पर हुये कई शोधों और आयुर्वेदिक औषधियों के पूर्ण विशलेषण के बाद ही पता चला है। एचआईवी की स्थिति में शतावर व सफेद मुसली के सम्यक प्रयोग से सहयोग मिल सकता है लेकिन एचआईवी से बचने के लिए सबसे अधिक संयम व सदाचार के पालन पर जोर दिया जाना चाहिए। प्रभावित मरीज़ों पर आयुर्वेदिक औषधि के परीक्षण, विश्लेषण व संरक्षण पर बल दिया जाना चाहिए।

 

दोस्तो एड्स ऐसी बीमारी है जिसके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और यहां तक कि सुरक्षा आयाम होते हैं और दुनिया के बहुत से देशों में इसकी रोकथाम और इसके प्रति लोगों को जागरूक करने में मीडिया अहम भूमिका अदा कर रही है। वैज्ञानिक साक्ष्यों से पता चलता है कि इस ख़तरनाक बीमारी के बारे में जानकारियो को आम करने और इसके बारे में प्रशिक्षण से इस ख़तरनाक बीमारी को समाज में फैलने से रोका जा सकता है और समाज को इस ख़तरनाक और ला इलाज बीमारी से सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रिंग मीडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया तक सारे संचार माध्यमों को इस बीमारी से लड़ने में लगाया जा सकता है ताकि यह मीडिया विभाग अपने अपने स्तर पर अपने अपने संबोधकों को इस ख़तरनाक और ला इलाज बीमारी के बारे में बताएं और उनके पास जो भी सूचनाएं और जानकारी हैं उन्हें अपने पाठक, दर्शकों और श्रोताओ के हवाले करे। आज यह बात पूरी दुनिया के लिए साबित हो चुकी है कि दुनिया का हर वह व्यक्ति जो एड्स का शिकार हो सकता है उससे प्रशिक्षण और जानकारी की ज़रूरत है, सिर्फ़ जवान और दूषित व संक्रमित सीरिंज के प्रयोग से ही एड्स का शिकार नहीं हुआ जा सकता बल्कि इस ख़तरनाक वायरस ने समाज के एक बड़े हिस्से को जकड़ रखा है।

इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि 80 के दश्क में ख़तरनाक और ला इलाज बीमारी से डराने की लहर और इन ख़बरों के मीडिया पर आने की वजह से अमरीका और यूरोप में यह मुद्दा एक डरावना सपना बन गया था जिसकी एक वजह यह थी कि इस मुद्दे को सीमा से ज़्यादा ही बढ़ा चढ़ा दिया गया था। दोस्तो हम सबको याद कि दो साल पहले दुनिया को कोरोना नामक एक महामारी का सामना हुआ जो अब तक जारी है। इस महामारी ने दुनिया को तहस नहस करके रख दिया और पूरी दुनिया के लोग बुरी तरह प्रभावित हुए।

कोरोना महामारी के आरंभ में पूरी दुनिया डरी हुई थी और किसी को भी यह पता नहीं था कि क्या होने वाला है। इसका एक कारण यह था कि हम इस बीमारी के बारे में अज्ञान थे और उसके विभिन्न पहलूओं पर हमारी नज़र नहीं थी लेकिन धीरे धीरे जब इस महामारी के बारे में लोग जानने लगे, मेडिकल प्रोटोकोल पर अमल करने लगे तो यह महामारी भी एक आम बात बन गयी और अब लोग इसके साथ ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं, इसी तरह एड्स की बीमारी भी है, इस ला इलाज बीमारी से बचने का सबसे बेहतरीन रास्ता सावधानी और समझदारी है।

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