Jul ०९, २०२२ १५:४२ Asia/Kolkata

आज ज़िलहिज्जा महीने की 10 तारीख है। हाजी हज संस्कार के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं।

आज वे महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कुर्बानी कर रहे हैं। यही नहीं जो लोग हज करने के लिए मक्का नहीं गये हैं परंतु आज के दिन वे भी कुर्बानी करते और कुर्बानी के मांस को गरीबों, दरिद्रों और ज़रूरतमंद लोगों में बांटते हैं। बहुत से गरीब कुर्बानी के दिन की प्रतीक्षा में रहते हैं। आज बहुत से लोग महान ईश्वर की प्रसन्ता प्राप्त करने और दूसरों को खुशी देने के लिए कुर्बानी कराते और एक दूसरे को ईदे कुर्बान की बधाई देते हैं। विश्व के मुसलमान लगभग एक हफ्ते तक ईदे कुर्बान की खुशी और जश्न मनाते हैं।

ज़िलहिज्जा महीने की 10 तारीख को वे अच्छे कपड़े पहनते हैं। आज के धार्मिक कार्यों विशेष कर ईद की नमाज़ पढ़ने के बाद एक दूसरे से मिलने जाते हैं। यद्यपि कुर्बानी कराना हज संस्कार के अनिवार्य कार्यो में से है और यह हाजियों के लिए अनिवार्य है परंतु दुनिया के बहुत से वे मुसलमान भी कुर्बानी कराते हैं जो हज पर नहीं गये होते हैं। कुर्बानी वास्तव में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उस परम्परा की याद दिलाती है जिसमें वह महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अपने प्राणप्रिय बेटे को कुर्बान करने के लिए ले गये थे परंतु उनके बेटे के स्थान पर महान ईश्वर ने भेड़ा भेज दिया था और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हज़रत इस्माईल के स्थान पर उसकी कुर्बान की थी। सारांश यह कि हज़रत इब्राहीम की उसी कुर्बानी की याद में पूरी दुनिया के मुसलमान कुर्बानी करते हैं।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने पालनहार की प्रसन्नता के लिए अपने प्राणप्रिय बेटे को भी कुर्बान करने के लिए तैयार थे और उन्होंने अपने अमल से दिखा दिया कि वे अपने रचयिता की प्रसन्नता के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर सकते हैं और वह ईश्वरीय परीक्षा में सफल हो गये। वास्तव में जिस इंसान का दिल अपने पालनहार के प्रेम से ओत-प्रोत हो या जिसका पूरा अस्तित्व ही अपने पालनहार और रचयिता के प्रेम के सागर में डूबा हो तो वह बड़ी से बड़ी कुर्बानी दे सकता है और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जिस कुर्बानी व परित्याग का परिचय दिया उससे सिद्ध हो गया कि उनका पूरा अस्तित्व अपने पालनहार के प्रेम के सागर में डूबा हुआ था। यह अपने पालनहार से प्रेम का ही नतीजा था जिसकी वजह से उन्होंने इतनी बड़ी कुर्बानी दी।

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जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम हज़रत इस्माईल को ज़िब्ह करने के लिए ले गये थे तो हज़रत इस्माईल ज़रा भी परेशान नहीं थे और उन्होंने अपने बूढ़े बाप से कहा कि हे बाबा आपको जो आदेश मिला है उसे अंजाम दीजिये। आप मुझे धैर्य करने वालों में पायेंगे। हज़रत इब्राहीम ने जब अपने प्राणप्रिय बेटे हज़रत इस्माईल को कुर्बान करने के लिए ज़मीन पर लिटाया और उनकी गर्दन पर छुरी फेरने के लिए तैयार हुए तो महान ईश्वर ने उनकी प्रशंसा की और हज़रत इस्माईल की जगह कुर्बानी के लिए एक भेड़ा भेज दिया और फरमाया हे इब्राहीम जो कुछ तुम से सपने में अंजाम देने के लिए कहा गया था उसे तुमने कर दिखाया। हम इस प्रकार भला काम करने वालों को प्रतिदान देते हैं और सच में यह खुली परीक्षा थी हमने बड़ी कुर्बानी को उन पर क़ुर्बान कर दिया और बाद वाली जातियों व राष्ट्रों में उनके नाम को बाक़ी रखेंगे, इब्राहीम पर सलाम हो वह हमारे नेक बंदों में से थे।

ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई कहते हैं कि ईदे कुरबान में एक बहुत बड़ा ईश्वरीय राज़ पोशीदा है। वह ईश्वर के चुने हुए पैग़म्बर द्वारा त्याग है। अपनी जान कुर्बान करने से बढ़कर अपने प्राणप्रिय को कुर्बान करना है। वह अपने हाथों से अपने प्राणप्रिय को कुर्बान कर रहे थे। यह त्याग उन मोमिनों के लिए आदर्श है जो सच्चाई और वास्तविकता के मार्ग को तय करना चाहते हैं, यह कुर्बानी सफलता और ईश्वरीय परीक्षा की प्रतीक है। ईश्वरीय परीक्षा एक प्रकार से बंदगी की परीक्षा है। परीक्षा में हमेशा एक त्याग व परित्याग होता है। कभी जान या माल का त्याग होता है, कभी उस बात से त्याग देना पड़ता है, नज़रअंदाज़ करना पड़ता है जिसे कोई कहे होता है अगर इंसान त्याग कर सकता है तो करके अपने गंतव्य तक पहुंचता है परंतु अगर अपनी आंतरिक इच्छाओं पर नियंत्रण न कर पाने की वजह से त्याग नहीं कर पाता है तो रह जाता है, परीक्षा में सफल नहीं हो पाता है। वास्तव में परीक्षा गंतव्य की ओर एक कदम है। हमारा और आपका जो इम्तेहान होगा उसका अर्थ यह है कि अगर हम इसमें सफल हो गये तो जीवन के नये चरण में पहुंच जायेंगे। इस संबंध में एक राष्ट्र या एक व्यक्ति में कोई अंतर नहीं है। उस दिन परीक्षा में पास होने की वजह से ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम की प्रशंसा की और एक बड़ा भेड़ा भेजा ताकि वह अपने बेटे के स्थान पर उसकी कुर्बानी करें और यह हज संस्कार में आगामी पीढ़ियों के लिए एक परंपरा हो गयी। ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम के नाम को भावी पीढ़ियों के लिए अमर कर दिया, उनके अमल को स्वीकार किया और यह बहुत बड़ी खुशखबरी व सफलता है जिसे अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम को दी।

रिवायत में है कि जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम ने अपने बेटे को ज़िब्ह करने के लिए गर्दन पर छुरी रखी तो हज़रत जीबरईल ने कहा अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर, ला एलाहा इल्लल्लाहो व अल्लाहो अकबर। उसी वक्त हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने भी कहा  اللَّه اکبر و अलहम्मदो लिल्लाह  यह वह आवाज़ व नारा है जिसे ईदे कुर्बान के दिन हाजी और दूसरे मुसलमान बारबार कहते हैं। 

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यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि इंसान के अंदर अहंकार ऐसी नैतिक बीमारी है जो बहुत सी बीमारियों की जड़ है। अहंकार वह बीमारी है जो सत्य को स्वीकार करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। अहंकार वह बीमारी है जिसकी वजह से शैतान ने हज़रत आदम का सज्दा नहीं किया और वह स्वंय को हज़रत आदम से श्रेष्ठ समझता था यहां तक कि महान ईश्वर ने उसे अहंकारी बताया और उसे अपनी बारगाह से निकाल दिया और प्रलय के दिन तक उस पर लानत होती रहेगी।

इस्लाम का जब उदय हुआ था तो बहुत से अरबों को यह पता था कि इस्लाम सच्चा धर्म है और पैग़म्बरे इस्लाम उसके सच्चे दूत हैं फिर भी अहंकार की वजह से वह ईमान नहीं लाये। अहंकार एक ऐसी नैतिक बीमारी है जिसे अहंकारी अपने लिए पसंद तो करता है किन्तु वह इस बात को बिल्कुल पसंद नहीं करता कि दूसरे उसके साथ अहंकार से पेश आयें। अहंकारी को कोई भी इंसान पसंद नहीं करता है। जो अहंकारी होता है लोगों के दिलों में उसका कोई स्थान नहीं होता, लोग उससे कतराते हैं। अहंकार के मुकाबले में विनम्रता है और विनम्रता वह नैतिक आभूषण है जिसे हर इंसान यहां तक कि अहंकारी भी पसंद करता है। विनम्र और सुशील व्यक्ति को हर इंसान पसंद करता है। दूसरे शब्दों में मीठी ज़बान और नम्र इंसान को हर व्यक्ति पसंद करता है। जो इंसान महान ईश्वर का सामिप्त प्राप्त करना चाहता है उसे चाहिये कि अपने अंदर से अहंकार के वृद्क्ष को काट दे। जो इंसान अपने अंदर से अहंकार के वृक्ष को काट देगा तो उसके अंदर सदगुणों के पौधे उगेंगे जिससे न केवल उसे बल्कि दूसरों को भी आराम व शांति मिलेगी।

आम तौर पर हर इंसान किसी न किसी से लगाव रखता और प्रेम करता है। कुछ लोग हैं जिन्हें पैसे से बहुत प्रेम है, कुछ लोग हैं जिन्हें पद और शोहरत बहुत पसंद है और इसी प्रकार कुछ लोग हैं जिन्हें समाज के दूसरे लोगों पर वर्चस्व जमाने में बहुत आनंद आता है। सारांश यह कि हर इंसान किसी न किसी चीज़ से लगाव रखता व पसंद करता है। इस आधार पर हर इंसान को चाहिये कि वह अपने अंदर देखे कि वह किस चीज़ को अधिक पसंद करता है और जिस चीज़ को सबसे अधिक पसंद करता, उसे दोस्त रखता है उसी चीज़ को महान ईश्वर की राह में कुर्बान करना चाहिये। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि तुम कदापि नेकी नहीं प्राप्त कर सकते मगर यह कि उस चीज़ को ईश्वर की राह में खर्च करो जिसे तुम पसंद करते हो।

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ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई कहते हैं" ईदे क़ुर्बान में एक बहुत बड़ा रहस्य निहित है। उस दिन ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम ने बलिदान दिया। जान से बढ़कर कुर्बानी दी। वह अपने हाथों से अपने प्राणप्रिय बेटे को कुर्बान करने के लिए ले जाते हैं। वह भी उस जवान बेटे को जिसे महान ईश्वर ने वर्षों की प्रतीक्षा के बाद बुढ़ापे में उन्हें दिया था और हज़रत इब्राहीम ने कहा था कि प्रशंसा है उस ईश्वर की जिसने हमें बुढ़ापे में इस्माईल और इस्हाक़ को प्रदान किया। हज़रत इब्राहीम को काफी समय की प्रतीक्षा के बाद महान ईश्वर ने उन्हें दो बेटे प्रदान किये थे और उसके बाद उन्हें दूसरी संतान की प्रतीक्षा भी नहीं थी। इस प्रकार की हालत में हज़रत इब्राहीम ने अपने प्राणप्रिय बेटे को महान ईश्वर की राह और उसके प्रेम में कुर्बानी दी और ईश्वरीय परीक्षा में सफल हुए।

ईदे क़ुर्बान हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल द्वारा दी गयी महान क़ुर्बानी की याद दिलाता है। पवित्र कुरआन के सूरे साफ्फ़ात में हम पढ़ते हैं कि हज़रत इब्राहीम ने स्वप्न में देखा कि वह अपने बेटे हज़रत इस्माईल को महान ईश्वर की राह में ज़िब्ह कर रहे हैं। रोचक बात यह है कि विवाह के काफी वर्षों के बाद हज़रत इस्माईल पैदा हुए थे और वर्षों बाद हज़रत इब्राहीम को पुत्र होने के आनंद का आभास हो रहा था। फिर भी वह पूरी निष्ठा के साथ हज़रत इस्माईल को उस जगह पर ले जाते हैं जहां कुर्बानी करनी थी। अलबत्ता महान व कृपालु ईश्वर का उद्देश्य केवल हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की परीक्षा लेना था और वह परीक्षा में पूरी तरह कामयाब हो गये। शैतान ने बाप- बेटे को अपने निर्णय से पीछे हटाने के लिए बड़ी कोशिश की परंतु वह अपने लक्ष्य में कामयाब न हो सका। जब भी शैतान हज़रत इब्राहीम को बहकाना चाहता था तो वह पत्थर मार कर उसे दूर भगाते थे।

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बहरहाल ईदे क़ुर्बान हज संस्कार का अंतिम व सुन्दर अमल है जिसे हाजी महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए अंजाम देते हैं और दुनिया के समस्त मुसलमान इस अवसर पर खुशी मनाते हैं।

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